लघुकथा के विविध आयाम (कथ्य एवं शिल्प)-3 / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना!

अपने देश में हर दूसरा आदमी ज्ञानी, मानवतावादी, सभी इंसान बराबर हैं, सबका ईश्वर एक है, सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए, जनहित सर्वोपरि आदि-आदि का उपदेश देने के लिए पाण्डित्यपूर्ण मुद्रा में दिखाई देगा। जब यह काम व्यक्ति को स्वयं करना पड़े, तब वह सब कुछ भूलने के लिए बाध्य है। न्याय का जाप करने वाले अन्याय का साथ देने के लिए सदैव कमर कसकर तैयार रहेंगे। सारा काम सुविधा और लाभ-हानि के गणित पर टिका है।

जिसके पास बड़ा पद है, उसके सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सब अपना कार्य सिद्ध करने की होड़ में लग जाएँगे। पद की शक्ति उस व्यक्ति से होते हुए, उसके आभामण्डल से घिरे सब लोगों की शक्ति बन जाएगी। सामाजिक पद पर आरूढ़ नेता, अभिनेता, अफ़सर, सबकी मनोवृत्ति पद के अनुसार बदल जाएगी।

जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्विज उच्यते।

वेदपाठात् भवेत् विप्रः, ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः॥ स्कन्दपुराण

ब्रह्मा द्वारा नारद को बताया गया है कि जन्म से प्रत्येक मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज (दूसरा जन्म) होता है, यानी यज्ञोपवीत संस्कार के समय व्यक्ति की तब तक की गतिविधियों को देखकर, उसे द्विज-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के रूप में निर्धारित किया जाता था। वेद के पठन-पाठन से विप्र (विद्वान्) का निर्धारण होता था और जो ब्रह्म को जानने के लिए कर्मरत रहता है, वही ब्राह्मण कहलाता है। यह विभाजन कर्म के अनुसार था, न कि जन्म के अनुसार। गीता में भी भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा है-

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ [भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 41]

हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों और शूद्रों को कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा (जन्म से नहीं) ही विभक्त किया गया है।

यहाँ एक दम सीधी बात यह है कि अपने कर्मानुसार प्राप्त गुणों से स्थिति बदली भी जा सकती है।

शक्ति प्राप्त होने पर कोई किसी पद को नहीं छोड़ना चाहता। कोई नेता बन गया, तो उसके पुत्र-पौत्र योग्य हों या अयोग्य, वे ही सत्ता पर काबिज रहें। उच्च पद पर बैठा व्यक्ति, जनहित का जाप करके, अपने और अपनी पीढ़ी के लिए एक सुरक्षित गलियारा बना लेता है। नाम बताने की आवश्यकता नहीं, कुछ परिवार बरसों से यही धन्धा करके जन सामान्य को कल्याण करने और सुखी बनाने की मृगमरीचिका में भटका रहे हैं। सामान्य जन भ्रम की उसी मीलों-मील फैली तपन-भरी मरुभूमि में भूखा-प्यासा भटक रहा है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि साहित्य, कला या सामाजिक जीवन में कोई भी व्यक्ति हो, वह विशिष्ट बना रहना चाहता है। धनोपार्जन का सारा भवन उस अकिंचन पर टिका है, जो रात-दिन मेहनत करके पूरी व्यवस्था के लिए नींव का काम करता है।

अपनी बात दफ़्तर से शुरू करता हूँ-अपराजिता जग्गी की लघुकथा 'तापमान गिर गया' के साहब को देखिए-"उफ़ कितनी गर्मी है!" साहब माथे का पसीना पोंछते हुए बोले।

फिर घंटी बजाकर बनवारी को एयर कंडीशनर का तापमान कम करने का हुक्म जारी किया। भरी दोपहरी में नीचे जाकर एक आइसक्रीम लाने का आदेश भी साथ ही दे दिया।

सारा काम करने पर बनवारी ने, जहाँ चपरासी बैठते हैं, वहाँ कूलर लगवाने के लिए निवेदन किया किया। बाबू ने फाइल भेजी है। साहब ने बनवारी को कहकर बाबू को बुलाया और डाँट पिलाई-हमसे पूछे बिना कूलर की फाइल क्यों भेजी आपने। आज कूलर माँग रहें हैं, तो कल एयर कंडीशनर भी माँगेंगे। "

बड़े बाबू डाँट खाकर चुपचाप लौट गए। बनवारी सबको बता रहा है कि कूलर जल्द लग जाएगा।

दफ़्तर में काम करने वालों की स्थिति क्या होती है, इसे अर्चना राय की 'गुमनाम' लघुकथा से समझा जा सकता है। सिर्फ़ ईमानदारी से काम करना ही इनका दायित्व होता है। पैंतीस साल की सेवा के बाद रिटायर होने वाले रमेश को पिता के मर जाने पर चपरासी के रूप में अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। वह महीने के आखिरी दिन पगार लेने आता। महीने के बाकी दिन बड़े साहब के बंगले पर घर-बाहर के सारे काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाता था।

अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी तंद्रा भंग हुई और वह अतीत से वर्तमान में लौट आया।

"अब हमारे बड़े साहब रमेश के लिए दो शब्द कहेंगे।"-उद्घोषक के कहने के साथ, बड़े साहब ने मोबाइल पर बात जल्दी खत्म कर, माइक को हाथ में लेकर कहना शुरू किया।

"दिनेश हमारे लिए महज कामगार ही नहीं; बल्कि हमारे घर का सदस्य रहा है।"-सुनकर सारा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा, तो वहीं दूसरी ओर रमेश को झटका-सा लगा।

"दिनेश हमारे लिए तन-मन से पूरी तरह समर्पित रहा है और हर जिम्मेदारी को निष्ठा से निभाता रहा है।"-बड़े साहब ने कहना जारी रखा।

सुनकर रमेश की आँखों में सैलाब उमड़ आया, जिसे वह रोक न सका और "साब जी, ...आज तो आप कम से कम मुझे मेरे असली नाम से पुकार लेते।" घरघराती आवाज में कह रमेश फफक-फफक कर रो पड़ा।

दफ़्तर के लोगों से अपने घर के काम कराना अधिकारियों का मौलिक अधिकार बन गया है। ऐसे कर्मचारियों के प्रति इनके मन में अपनत्व या मानवीय सम्बन्धों की कोई ऊष्मा नहीं होती। इनका सम्बन्ध केवल यान्त्रिक होता है। जिसमें संवेदना का कोई भाव नहीं होता। अंग्रेज़ों से यह कोढ़ भारत की अफ़सरशाही में भी लग गया है। अनैतिक तो इसको कोई समझता ही नहीं। रोज़मर्रा सेवाभाव से समर्पित कर्मचारियों की पहचान व्यक्ति की न होकर, केवल बेगार करने वाले अनजाने व्यक्ति की तरह की होती है। उन्हें व्यक्ति का नाम याद रखने की ज़हमत भी नहीं उठानी पड़ती। ये कामगार, सेवा करके भी निष्ठुर शोषक प्रणाली में गुमनाम ही रह जाते हैं। 'रमेश को दिनेश के नाम से पुकारना' केवल क्षण भर की घटना नहीं है, जिसको अर्चना राय ने लघुकथा बना दिया है। इस घटना की तह में जो सोच अन्तर्निहित है, शोषण और संवेदनहीनता का जो वट वृक्ष पनपा है, उसकी जड़ें लम्बे समय से गहरे उतरी हुई हैं।

दफ़्तरी व्यवस्था की औपचारिकताएँ और भ्रष्टाचार समाज को अपनी गुंजलक में जकड़े हुए हैं। 'हिमांशु' की 'एजेण्डा' लघुकथा में इसे देख सकते हैं।

घटना को कागज़ों पर उतारकर, बिना किसी संवेदना के, उसे किसी प्रयोग का पुर्ज़ा बनाना, किसी निर्धारित साँचे में रखकर बिना किसी अनुभूति के लघुकथा बनाने का असम्पृक्त प्रयास करना 'कथा' नहीं है। 'घटना / घटनाएँ' केवल सूत्र हैं, कथा नहीं। शिल्प के सायास 'प्रयोग' संवेदना के बिना निष्प्राण वाग्जाल हैं। सजग रचनाकारों को इनसे बचना चाहिए। कच्चे बर्तन में पानी भरने का जो परिणाम होता है, उसी प्रकार प्रयासपूर्वक कथ्यविहीन घटनाएँ लिखने का होता है। इस तरह का लेखन न पहले परिपक्व लघुकथा के दायरे में आता था और न आज।

दफ़्तर का जंजाल एक ऐसा चक्रव्यूह है, जो इसमें घिर गया, तिकड़म के अन्तिम द्वार पर मरना ही उसकी नियति है। देश में चाहे जितना बड़ा परिवर्तन हो जाए, हमारे ये लूट-खसोट के अड्डे कम नहीं होंगे। आज़ादी के बाद भौगोलिक सीमाएँ बदलीं और भी बहुत कुछ बदला, लेकिन अमरबेल बन हरे-भरे समाज को चूसकर नष्ट करने वाले शोषक नहीं बदले। कमलेश भारतीय की लघुकथा 'कितना बड़ा दुख' में नीचे के बाबुओं को सौ-सौ रुपये दे दिए गए, ताकि कोई आपत्ति न लगे। इसके बाद पाँच हज़ार रुपये और देने के लिए प्रॉपर्टी डीलर ने कहा, तो पैसा न देकर उसने सीधे तहसीलदार से मिलने फैसला किया।

पत्रकार का विजिटिंग कार्ड देखकर तहसीलदार ने चाय भी पिलाई और तुरन्त कार्य करने का आदेश दिया। पत्रकार जब कागज़ लेकर अगली विण्डो पर गया, तो वहाँ बैठी महिला ने 'आज साहब को पता नहीं क्या हो गया है? यह दूसरी रजिस्ट्री है, जो मुफ़्त में की जा रही है।' कहकर माथा पीट लिया।

लुटने वाले के दुःख से बड़ा लूटने वाले का दुःख है कि आखिर मुफ़्त में काम क्यों कर दिया। सरकारी नौकरी का अर्थ लूट की छूट का पर्याय हो गया है। पत्रकार को डर के मारे छूट दी गई, न कि किसी ईमानदारी के कारण। जनसामान्य को हलाल होना ही है।

समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जो सुविधाओं से सदा वंचित रहा है। इसे सर्वहारा वर्ग कह सकते हैं। इसके आगे एक वर्ग वह भी है, जो स्टेटस (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक) , कार्य के स्तर, साधनविहीनता, जातिवाद की उपेक्षा आदि के कारण शोषित और उपेक्षित होता रहता है।

साधनविहीनता से अभिशप्त व्यक्ति, संघर्षों में यह सोचकर हार नहीं मानता कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि उसके दिन फिरेंगे, लेकिन ऐसा हरबार होता नहीं। अशोक भाटिया की लघुकथा 'पीढ़ी-दर-पीढ़ी' ऐसी ही लघुकथा है। इस रचना के कुछ संवाद देखिए-

उसके पिता ने उसे पढ़ाया नहीं था।

उसने सोचा—मैं अपने बच्चों को जरूर पढ़ाऊँगा।

उसने अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाया।

इसके बाद स्कूल-ड्रेस, फ़ीस और किताबों की-की माँग की गई। किताबें नहीं थीं, तो पाठ याद नहीं हुआ तो सज़ा, ड्रेस भी नहीं थी, फ़ीस भी नहीं दे सका, तो नाम कट गया। स्कूल जाना भी बन्द। 'जब वह बड़ा हुआ, तो उसने सोचा-मैं अपने बच्चों को ज़रूर पढ़ाऊँगा।' यह करोड़ों वंचितों की नियति है। दूसरी ओर वह वर्ग है, जो इनकी सारी सुविधाओं पर डाका डालकर भी समाज में आदरणीय बना रहता है।

यह हाड-मांस का इंसान द्रवित नहीं होता। केवल जीवन-यापन के लिए संघर्ष करनेवाले अभावग्रस्त व्यक्ति के प्रति किसी की सहानुभूति हो या न हो, निर्जीव कोयले की अनुभूति मन को मथ देती है। आनन्द हर्षुल की प्रयोगवादी लघुकथा 'कोयले की इच्छा' पाठक को भीतर तक झकझोर देती है। कथा की कुछ पंक्तियाँ देखिए-

'धोबी, पॉलीथिन की थैली में, कोयला लेकर अपने घर के भीतर घुसा, धोबी की बच्ची ने, कोयले को सिंघाड़ा समझा। बच्ची कूदने लगी-ताली बजा-बजाकर कि बाबू सिंघाड़ा लाए-बाबू सिंघाड़ा लाए-खुश बच्ची की, खुश-खुश उड़ती ताली, ताल की आवाज से, धोबी का घर भर गया।'

आज पैसे कम होने के कारण धोबी पॉलीथिन की थैली में दो किलो कोयला लाया था। पॉलीथिन की पारदर्शिता से कोयले को सिंघाड़ा समझ खुश होकर कूद रही थी।

बच्ची को इस तरह खुश देखकर पहली बार कोयले के भीतर सिंघाड़ा होने की इच्छा जागी।

यह लघुकथा की शक्ति और सामर्थ्य है कि छोटे से कलेवर में आनन्द हर्षुल ने विवशता का सागर समेट दिया और निर्जीव कोयले के भीतर बच्ची की खुशी के लिए काया-परिवर्तन की लालसा जगा दी।

डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय की लघुकथा-'किसान की रोटी' वंचित वर्ग की विवशता का जीता-जागता चित्र है। अन्नदाता किसान खून-पसीने की कमाई से जो रोटी कमाता है, वह भाग जाती है तथा उसके पेट तक न पहुँचकर भूल-भुलैया से होती हुई पूँजीपति की तिजोरी में कैद हो जाती है। व्यवस्था इसे सुरक्षित स्थिति मानती है। किसान जब शिकायत करता है, तो थानेदार किसान को धमकाकर कहता है-"रोटी के लिए सेठ की तिजोरी से अच्छी जगह और कहाँ मिल सकती है? वहाँ है, तो सचमुच सुरक्षित है। क्यों बे किसान, अब तक तूने रोटी अपने पास रखी ही क्यों थी? कर दूँ तुम्हारा चालान, नाजायज चीज रखने के जुर्म में?"

किसान ने थानेदार के पैर पकड़ लिये, "माई-बाप! इस बार तो माफ कर दो। आगे से ऐसी गलती नहीं करूँगा।"

किसानों से सस्ते भाव में फसल खरीदकर उसे महँगे भाव में बेचने वाले मालामाल हो रहे हैं। मेहनत करने वाला किसान अभावग्रस्त होकर जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं कर पा रहा है। राजनीति में पलते हुए सफ़ेदपोश डाकू आम आदमी का कौर छीनकर उससे काला धन कमा रहे हैं। बेशर्मी तो यहाँ तक बढ़ गई है कि यदि कोई व्यवस्था उन पर कार्यवाही करती है, तो वे स्वयं को पीड़ित बताने में भी शर्म महसूस नहीं करते। व्यापार, दुकानदारी या कोई संस्थान चलाना अर्थार्जन के कार्य हैं, रहे होंगे कभी। जिनकी एक भी फ़ैक्टरी नहीं, कोई नियमित व्यवसाय नहीं, उनके पास अरबों की अकूत सम्पत्ति का होना अपराध ही नहीं, लोकतन्त्र और न्याय-तन्त्र का उपहास भी है।

डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय ने व्यंजना के माध्यम से इस लघुकथा को निखारा है। अल्पतम शब्दों में पूरे कथ्य को तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया गया है। 'किसान की रोटी' का भाग जाना, जैसे प्रयोग लेखकीय क्षमता सिद्ध करते हैं। यहाँ एक बात लघुकथा के विषय में कहना समीचीन होगा-अपराजिता जग्गी, अर्चना राय, कमलेश भारतीय और अशोक भाटिया की लघुकथाएँ कथ्य का सूत्र नहीं छोड़ती हैं। चारों का कथ्यों में आया एक भी शब्द अनावश्यक नहीं। हर संवाद कसा हुआ है। आनन्द हर्षुल और डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय की लघुकथाएँ प्रयोग को सिद्ध करने के लिए प्रयासपूर्वक माथापच्ची करके लिखी हुई रचनाएँ नहीं हैं; बल्कि इनमें कथ्य को तीव्रता प्रदान करने वाला प्रयोग सहज एवं स्फूर्त है।

छोटा-मोटा काम करके जीविका चलाना कठिन ही नहीं, चुनौतीपूर्ण भी है। शोषित और वंचित व्यक्ति सन्ताप झेलने के लिए ही बना है। शोषक अनेक रूप धारण करके ईश्वर की तरह सर्वव्यापक है। पवन जैन ने 'एक टोकरी सब्जी' के माध्यम से सब्जी बेचने वाली की जिस विवशता को चित्रित किया है, वह सड़कों-गलियों में लगने वाले छोटे-छोटे दुकानदारों की व्यथा-कथा है। बाज़ार तक पहुँचने तक की शोषण-कथा विभिन्न चरणों में इस प्रकार घटित होती है-

1-पेसेंजर ट्रेन में टोकरी से झाँकती ककड़ी को निकालते हुए रेलवे पुलिस के सिपाही ने पूछा "यह किसकी टोकरी है?"

2-फुटपाथ पर टोकरी रखकर बैठने को हुई कि पीछे से आवाज गूँजी: "ऐ बाई! इधर कहाँ बैठ रही, मेरी दुकान के सामने?" सवा किलो ककड़ी को एक किलो तुलवाकर, 'अभी देते हैं' का आश्वासन देकर वापिस अपनी दुकान जमाने में लग गया।

3-एक अधेड़ नजरों से उसका जायजा लेने लगे और छोटी ककड़ी उठाकर मुँह में डालते हुए "ककड़ी क्या भाव? ताजी है ..., नई आई हो...!" प्रश्नों को उछाल दिया।

4-"ये लो बाई बैठकी की रसीद।"-नगरपालिका कर्मचारी ने रसीद बढ़ाते हुए कहा।

"अभी बोहनी तक नहीं हुई।" कहने पर उसने भी नरमी दिखाई, "थैली में आधा किलो ककड़ी डाल दे, अभी आते हैं, तब तक फुटकर रखना।"

यही नहीं-1-ग्राहकों के मोल-भाव, जुमले और नसीहते सुनते–सुनते टोकरी खाली होने लगी।

2-दिनभर की धूप से सब्जी को तो बचाए रखा, लेकिन 'लिजलिजी छुअन और टटोलती नजरों की जलन से' कुम्हला गई।

3-पेट भर भोजन करके नहीं; बल्कि-पेट में दो समोसे डालकर सपनों की डोर पकड़े वापसी को शाम की गाड़ी में सवार हो गई।

4-रोटी की जुगाड़ में की गई जद्दोजहद के लिए "किसानों को सीधे खरीदार से जुड़ना चाहिए, किसानों को लागत मूल्य का दो गुना मिलना चाहिए, छोटे किसानों से मोलभाव नहीं करना चाहिए... ।" ये नारे बेमानी सिद्ध हुए हैं।

शोषण केवल सब्जी तक ही सीमित नहीं। सब्जियों के अतिरिक्त जो शोषण हुआ, जो बेमोल बिक गया, उसे बताना कठिन है।

सहृदय पाठक इस लघुकथा के प्रत्येक वाक्य के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेगा। समवेदना की यह शक्ति इस लघुकथा का प्राणतत्त्व है। इस तरह के रचनाकर्म के लिए पहले कथ्य को गहन अनुभूति की धीमी-धीमी आँच में तपाना पड़ता है। पहले दिन की शाम से लेकर बाज़ार से लौटने तक की छोटी-छोटी घटनाओं का ताना-बाना कथ्य को जीवन्त और अनुभूत सत्य का आकार देता है। प्रयासपूर्व गढ़ी हुई घटनाओं को या सुनी-सुनाई बातों को लिख देना, लघुकथा नहीं है। लघुकथाकारों की एक बेलगाम भीड़ इसी महायज्ञ में लगी हुई है। अपच का वमन कर देना, लघुकथा नहीं। निष्प्राण घटनाओं को कोई शीर्षक देकर लिख देना, मन की भड़ास हो सकती है, लघुकथा नहीं। छोटी-छोटी सामान्य घटनाएँ एक दूसरे से जुड़कर किस प्रकार प्रभावी कथ्य बनती हैं, इस लघुकथा से सीखना चाहिए।

कुलीन वर्ग में ऐसे बहुत मिल जाएँगे, जो धन, पद, पुरस्कार या प्रतिष्ठा पाने के लिए कितना भी नीचे गिर सकते हैं। आशा से अधिक मिल जाने पर भी उनकी लिप्सा का अन्त नहीं। सभी क्षेत्रों पर दृष्टिपात करके देख लीजिए, अकूत धन मिल जाने पर भी अनैतिक साधनों से धनकुबेर बनने की होड़-सी लगी है। इस होड़ में मन का चैन और आँखों की नींद भी गँवानी पड़ जाए, तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भोजन ठीक से भले ही हज़म न हो, गरीबों की पाई-पाई चट करके आने वाली पीढ़ियों के लिए नोटों का पहाड़ खड़ा करने में कुछ लोग पीछे नहीं। जीवन की विषम परिस्थितियों में केवल दो जून की रोटी का कठिनता से जुगाड़ हो जाए, तो समझो बहुत कुछ हो गया। इतने पर भी यदि कोई शोषित और वंचित होकर भी अपना स्वाभिमान बचाए रखता है, न धैर्य खोता है, न स्वाभिमान, तो समझ लीजिए, यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

रामकरन की दो लघुकथाएँ 'हार' और 'काँटा' इसका जीता जागता उदाहरण हैं। हार के जिस मोची के 'पास दो पॉलिश की डिब्बी थी–एक काली, दूसरी लाल, एक निहाई, कैंची और कुछ चमरौधे बस।' उसका स्वाभिमान देखिए, वह केवल सैंडल के तल्ले को सिल सकता है, चिपकाने का साधन उसके पास नहीं; इसलिए वह दूसरे मोची के पास जाने का इशारा करता है। मोची को पचास रुपये देकर वह चिपकाने वाला गोंद मँगा लेता है। मोची ने उस दिन उन्नीस रुपये कमाए। उसी में घर चला लेता है। राशन कार्ड पर अनाज मिल जाता है। दो किलो आलू दो दिन काम आ जाता है। बच्चों की पढ़ाई भी हो जाती है; क्योंकि "फीस नहीं देना पड़ता। सरकारी में हैं। खाना भी मिलता है।" सामने वाला भाई फल खिला देता है। सैंडल ठीक कराने वाला बार-बार कुछ न कुछ पूछकर उसको हीनताग्रस्त करके पराजित करना चाहता है।

मोची न गुस्सा करता है, न झुँझलाता है, न उसके मन में कोई असंतोष था। अभाव के बीच भी मोची शान्त और वह साधन सम्पन्न होने पर भी उद्विग्न। "कितना दूँ?" पूछने पर वह बोला–"जो मर्जी।"

'जो मर्जी' कहकर मोची ने जैसे उसको धोबी पाट मारकर चित्त कर दिया हो।

रामकरन की 'काँटा' में भी सर्वहारा के स्वाभिमान को उकेरा गया है।

बारहों महीने व्यस्त रहकर काम करने वाला किसान, पाँच बीघे के खेत में काम करता है। नपे-तुले संवादों से कथा आगे बढ़ती है।

" खाने भर का अनाज हो जाता है। बेचने के लिए नहीं बचता। खेत भी गल्ले पर है, यानी खेत भी उस खेतिहर का नहीं।

किसी पाटीदार के पास भी अपना खेत नहीं। फिर भी सब किसान हैं, खेती करते हैं। जब नाम पर खेत नहीं, तो सरकारी अनुदान भी नहीं मिलता। सवाल-दर सवाल किसान बताता है कि उसके परदादा के पास भी खेत नहीं था। भगवान ने कुछ को दिया है, उनको नहीं दिया।

"भगवान ने आपको क्यों नहीं दिया?" का उत्तर दिया-"अब नहीं दिया, तो नहीं दिया। क्यों नहीं दिया, ये वही जाने," वे मुस्कुरा कर बोले।

भगवान ने उनको क्यों नहीं दिया, इस पर किसान झल्ला उठता है-"भगवान के नाम पर संतोष तो करने दीजिए... कहाँ सिर फोड़ लूँ।"

अभावग्रस्त जीवन में परिश्रम से अगर किसी तरह गुज़ारा हो जाता है, तो किसान उसी से सन्तुष्ट हो जाता है। कथा का मुख्य बिन्दु है कि अभाव क्या है? असन्तुष्टि का भाव ही अभाव है। जिनके पास जीवन-यापन के जितने अधिक साधन होते हैं, उनका असन्तोष भी उतना ही गहरा होता है। पशु भी पेट भरने पर खाना बन्द कर देता है; लेकिन असन्तोष और अतृप्ति के पाश में जकड़ा मनुष्य 'और अधिक-और अधिक' पाने के लिए सारे सुख-चैन को तिलांजलि दे देता है। दूसरों का कौर छीनने वालों की अतृप्ति पागलपन तक बढ़ जाती है। यहाँ सन्तोष का अर्थ यह कदापि नहीं कि कर्म करना छोड़ दीजिए। सन्तोष का तात्पर्य है 'जीवन-यापन की वह मनःस्थिति, जिसमें व्यक्ति अपने कार्य और उसके परिणाम स्वरूप प्राप्त जीवन को जीभर कर जी रहा है। वह उद्विग्न नहीं, बल्कि अपने जीवन से सन्तुष्ट है। भोजन की तृप्ति, नींद का आनन्द, मन की अनुद्विग्नता खरीदी नहीं जाती; बल्कि आत्मतोष से निर्मित करनी पड़ती है।'

संवादों की सार्थक शृंखलाबद्धता कथा के विकास को ही नहीं, लेखक के गम्भीर आशय को भी पूरी त्वरा के साथ प्रस्तुत करती है। यह रामकरन की लघुकथाकार के रूप में सफलता है।

संवाद यदि पूरी तरह अनुस्यूत न हों, संवादों में संवेदना की ऊष्मा न हो, तो वे कथा की निर्मिति में सहायक नहीं हो सकते। किसान के संवाद, जीवन की भट्टी के ताप से तपे हुए हैं, जो 'काँटा' लघुकथा को सार्थकता प्रदान करते हैं। कोरे वर्णन, सपाट और भरती के संवाद, केवल घटना को कथा समझने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है; जिसके कारण कथा की अनुपस्थिति का संकट निरन्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसी रचनाओं में कथारस की बात करना बेमानी हो जाता है। जब कथा ही नदारद है, तो कथारस कहाँ से आएगा?

वंचित वर्ग के लिए बहुत बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। जितने गलीज़ काम हैं, वे सब उसके जिम्मे हैं। वह हमारे लिए उस समय महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि जन सामान्य उनको नहीं कर सकता। जब उसको मेहनताना देने का अवसर आता है, उस समय उसे न्यूनतम कैसे दिया जाए, यह विचार उद्वेलित कर जाता है। 'फाँस' लघुकथा में सुदर्शन रत्नाकर ने गटर की सफ़ाई करने वाले के लिए इसी मनोवृत्ति को उजागर किया है। दुर्गन्ध इतनी थी कि उबकाई आ जाए। एक हज़ार रुपये से कम का काम नहीं। तीन आदमी काम में लगे हैं। 'उसने पर्स से पाँच सौ, का एक, दो सौ-सौ के तथा एक सौ रुपये के नोट निकाल कर अपने हाथ में रख लिये।' काम की प्रगति के साथ यहीं से बदलाव शुरू हो गया। पानी थोड़ा आगे जाने लगा, तो हज़ार के बदले पाँच सौ का विचार आ गया। 'एक ने हाथ नाली में डाला और उसमें फँसी ईंट का टुकड़ा बाहर निकाल दिया। पानी तेज़ गति से मेन होल में जाने लगा' की स्थिति में पहुँचते ही, पाँच सौ भी अधिक लगे, तो तीन सौ बहुत हैं' का विचार आ गया। उनको तीन सौ दे दिए। उनके जाने के बाद मन में यह फाँस अटक गई कि दो सौ रुपये बहुत थे। सुदर्शन रत्नाकर ने इस कथा में मेहनताना देने के विचार को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करके जीवन्त कर दिया है। किसी विस्फोट की तरह या हड़बड़ी में कुछ भी अचानक नहीं हुआ। रचना में कोई संवाद नहीं। केवल वैचारिक ऊहापोह के विश्लेषण से लघुकथा अपने चरम पर पहुँचती है। शीर्षक हर स्तर पर लघुकथा को सार्थकता प्रदान करता है। ऐसी लघुकथाएँ लम्बे आत्मचिन्तन और गहन मन्थन से निःसृत होती हैं।

सुदर्शन रत्नाकर की 'साँझा दर्द' के, चारपाई बुनने वाले के पास काम ही नहीं क्योंकि पॉश कॉलोनी वाले चारपाई ही नहीं रखते। वह आगे बढ़ा तो गंदे नाले के पार की बस्ती में एक झोपड़ी के बाहर ही जंग लगी स्टील की चारपाई दिख गई वह खुश हुआ कि यहाँ काम मिल जाएगा; लेकिन चारपाई बुनने वाला और चारपाई वाला मज़दूर दोनों पात्र अभावग्रस्त हैं। पहले को काम की कमी, दूसरा ठण्ड में अर्थाभाव के कारण सीलन-भरी जमीन पर सोने के लिए बाध्य है। उसके पास चालीस रुपये भी नहीं कि चारपाई की मरम्मत करा सके। बात न बनने पर खाँसता हुआ मज़दूर लेट गया। चारपाई बुनने वाले के लिए अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति है। 'भूख के मारे उसके पेट में कुलबुलाहट हो रही थी' ऐसी स्थिति में बिना कुछ लिये मरम्मत करके चारपाई भीतर रख दी। वह "चारपाई ठीक करवा लो" की आवाज़ लगाता हुआ आगे बढ़ गया। उसके चेहरे पर गहरे संतोष था। यही मानवीयता का भाव, उस अभावग्रस्त चारपाई बुनने वाले के व्यक्तित्व को ऊँचाई प्रदान करता है।

व्यक्ति के बदलने पर स्थितियाँ किस प्रकार बदल जाती हैं, इसे अशोक भाटिया की लघुकथाओं में देखा जा सकता है। 'एहसास' इनकी बहुत छोटी-सी लघुकथा है। स्टेटस की समस्या हर जगह देखने को मिल जाएगी। इस कथा में निहित व्यंग्य भी देखने योग्य है।

'कुत्तों की प्रदर्शनी थी। मैं भी देखने पहुँच गया। कुछ देर बाद नौकर कुत्ते लेकर आए। मैं एक सोफे पर बैठा ही था कि मैनेजर ने कहा कि सोफे कुत्तों के लिए हैं। इसलिए मुझे उठना पड़ा।

प्रदर्शनी खत्म हुई, तो मैं चाय पीने के लिए एक खोखे पर पहुँच गया। मुझे देखकर कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों में से एक-दो अपनी मैली धोतियाँ समेटते हुए उठ गए।

'कुर्सी पर बैठते हुए मेरे सामने प्रदर्शनी का वह दृश्य घूम गया। '

कुत्तों की प्रदर्शनी, तो सोफ़े कुत्तों के लिए थे। मैनेजर के कहने पर उसे उठना पड़ा। भला कुत्तों की प्रदर्शनी में किसी भले आदमी का क्या काम! प्रदर्शनी खत्म होने पर जब वह चाय पीने के लिए खोखे पर पहुँचा, तो कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों में से एक-दो अपनी मैली धोतियाँ समेटते हुए उठ गए। 'मैली धोतियाँ' के माध्यम से लेखक ने पहले से बैठे एक-दो लोगों के स्तर को रेखांकित किया है। उनका कुर्सी छोड़कर उठना वैसा ही है, जैसा कुत्तों के लिए निर्धारित सोफ़े पर किसी भले आदमी का बैठना। एहसास का साम्य दर्शाने वाली दोनों स्थितियाँ कथा को महत्त्वपूर्ण बनाकर व्यंजित करती हैं।

अशोक भाटिया की 'तीसरा चित्र' लघुकथा कला के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र के वैषम्य को चित्रित करती है। पहले चित्र में अमीर और स्वस्थ बच्चे को नौकर की गोद में दिखाया गया था। रौब में भी बच्चे के चेहरे पर असन्तोष का भाव तन्मयता से दिखाया गया था। दूसरे चित्र में मध्यवर्गीय बच्चा ' माता पिता का हाथ पकड़कर खड़ा है और अपना परिचय खुद ही दे रहा है। बच्चे को सुंदर कपड़े पहनाकर माता-पिता भी बहुत खुश हैं। बेटे के बनाए आखिरी चित्र को पिता ने देखा। धीमे से बोले–" तुमने इस चित्र में जान फूँक दी है, मिट्टी के ढेर पर बैठा दुबला सहज बच्चा... हवा में बिखरे बालों में से झाँकती चमकीली आँखें..., जेब में मिटटी भरते उसके हाथ।

पिता ने पूछा कि पहले दो चित्र रंगों से बनाए, लेकिन तीसरा चित्र काली पेंसिल से क्यों बनाया? चित्रकार बेटे का उत्तर सोचने पर मजबूर करता है-"पिताजी, इसकी बारी आई, तो सब रंग खत्म हो चुके थे।" , बेटा धीमे से बोला।

अभावग्रस्त बच्चों का चित्र अधिक सहज और अनूभूतिपरक बना; क्योंकि वह कलाकार की यथार्थ अनुभूति के अधिक निकट था।

कलाकार और कलाकृति के सन्दर्भ में डॉ. उपमा शर्मा की दो लघुकथाएँ उद्धृत की जा सकती हैं-अन्तर्दृष्टि और मूल्यांकन। कला प्रदर्शनी में लगे अनगिनत चित्रों में एक चित्र अनुपम रंगों के सौन्दर्य से ध्यान खींच रहा था, पर वहाँ भीड़ नहीं थी। कलाकार पहली बार आया था। सलौनी का ध्यान उस पर गया। रंग-संयोजन सार्थक और प्रभावशाली था; लेकिन वहाँ एक भी दर्शक नहीं था। सलौनी के पूछने पर–"तुम्हें अपनी कला की उपेक्षा देख बुरा नहीं लग रहा चित्रकार!"

वह सामान्य रहा। चित्रकार का मानना था कि अगर कला का सच्चा पारखी एक भी हो, तो कला को सार्थक मानना चाहिए। 'चित्र में बहती हुई बूँद सीपी के अंदर गिर पड़ी थी, जो मोती बनने की प्रक्रिया में थी' सीपी में बूँद का गिरना ही बूँद की सार्थकता है। बूँद का मोती बनना ही सच्ची कला है। दूसरी लघुकथा मूल्यांकन में डॉ. उपमा शर्मा ने बताना चाहा कि कला केवल निर्मित चित्र नही, बल्कि कलाकार के व्यक्तित्व का भी दर्पण है। हृदय की उदारता ही सच्ची कला है। घोषित परिणाम के अनुसार ' संपदा जी और अभिनव जी दोनों को बराबर नम्बर मिले हैं। अब दर्शकों को अपना-अपना मत देना है। चित्रकारों को भी अपना मत स्वयं या दूसरे के लिए देना था। सम्पदा की दृष्टि से दूसरा चित्र उसके चित्र से तनिक भी कमतर न था। किसी कलाकार के लिए सुन्दर चित्र बनाना ही महत्त्वपूर्ण नहीं, दूसरों की कला के प्रति सराहना और सम्मान का दृष्टिकोण रखना, कला का उदात्त रूप है। उसे पता चला कि जिस कलाकार ने दूसरा चित्र बनाया, उसके तो हाथ भी नहीं थे। उसने केवल पैरों से ही वह चित्र बनाया था।

'संपदा ने दो पल सोचा और अपना मत उस चित्रकार के पक्ष में डाल दिया।' इस लघुकथा में लेखिका ने इस विचार को स्थापित किया है कि गुणग्राहकता ही सच्ची कला है।

सभी लोग कलाकार का सम्मान करें, यह सम्भव नहीं। रतन चंद 'रत्नेश' की 'पेंटिंग' लघुकथा इसका सशक्त उदाहरण है। लोग अपनी कार्यसिद्धि के लिए कलाकारों की सहायता लेते हैं। उनके लिए कला या कलाकार महत्त्वपूर्ण न होकर, केवल अपना कार्य महत्त्वपूर्ण है। 'निर्देशक को एक ही चिन्ता खाए जा रही थी। वे मंच पर ड्राइंग-रूम की दीवार पर कुछ बेहतरीन पेंटिंग्स टाँगना चाहते थे, ताकि मंच जीवंत हो उठे।' निर्देशक ने अपने परिचित से आग्रह करके उनकी पेँटिंग ले गए। नाटक सफल हुआ। निर्देशक ने कहा-'नाटक की सफलता में सिर्फ मेरा ही हाथ नहीं, उन कलाकारों का भी उतना ही योगदान है, जिन्होंने अपनी अभिनय कला की छाप छोड़ी। बहरहाल उन पेंटिंग्स के बारे में आपका क्या ख्याल है?'

'कौन-सी पेंटिंग?' आगंतुकों ने एक दूसरे को प्रश्नभरी निगाहों से देखा।

निश्चित रूप से निर्देशक को झटका लगा होगा। नाटक के दृश्य को विश्वसनीय बनाने के लिए, जिन पेण्टिंग का उपयोग किया था, उन पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। समक्ष होते हुए भी कलाकार का नेपथ्य में चले जाना, खटकने वाली बात है। परिदृश्य में नाटक का यथार्थ प्रभाव सृजित करने के लिए कलाकृतियों के माध्यम से जो कार्य किया गया, उस पर ध्यान न जाना निर्देशक को खटक गया। 'रत्नेश' जी ने कथ्य का विकास कुशलतापूर्वक किया।

इस सदी का सर्वाधिक पीड़ादायक परिवर्तन है कि अब बच्चे, बच्चे नहीं रहे, बूढ़े हो गए हैं। संचार माध्यमों की भीड़ का आक्रामक प्रहार, एकल परिवार और अभिभावकों की व्यस्तता और विवशता, स्कूलों द्वारा की जा रही रस्मदायगी ने बच्चों की सहजता छीन ली है। उनके बेरौनक चेहरों से भोलापन नदारद है, उनकी दूधिया मुस्कान दम तोड़ती जा रही है। बड़े-बुज़ुर्गों से किस्से सुनने की उनका उत्कण्ठा गायब है। उग्रता और प्रतिरोध की शिकन उनके माथे पर देखी और पढ़ी जा सकती हैं। फिर भी कहीं-कहीं सहजता बची है। कहाँ पहले रविवारी समाचार-पत्रों में बच्चों का एक पूरा पृष्ठ होता था। आज के दिन वह सब सिरे गायब है। लघुकथाओं में भी बाल अनुभूतियों को लेकर रची जाने वाली रचनाओं का नितान्त अभाव है। बाल मनोविज्ञान को जाने बिना, बड़ों को पात्र बनाकर उपदेश ठूँस देना हास्यास्पद है। बालसुलभ कथ्य की तलाश और उसका निर्वहन सरल नहीं है।

इस सन्दर्भ में डॉ अशोक भाटिया की 'नाराज़ी का अधिकार' और डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की 'बदला' लघुकथाएँ विचारणीय हैं, जिनमें बालसुलभता को बिना किसी तामझाम या उपदेश के चित्रित किया गया है। 'नाराज़ी का अधिकार' में बेटी नाराज़ थी। पापा ने केबल की तार काट दी, इसलिए। पिता आश्वासन देते हैं-'स्कूल के टैस्ट हो जाएँ, फिर लगा देंगे।' फिर भी बेटी चुप और नाराज़। पिता उसके छोटे भाई के पास सोने चले गए। बेटी को लगा कि पिता उसे अधिक प्यार करते हैं। यह भी एक कारण है; लेकिन बेटी की समस्या अलग तरह की है। वह मासूमियत से कहती है-'पर मुझे सोने से पहले आपको लातें जो मारनी थीं। उसके बिना मुझे नींद नहीं आती।' यह अकेला वाक्य लघुकथा को जीवन्त बना देता है। बेटी की इस बात को सुनकर पापा के साथ बेटी भी हँस पड़ती है।

'बदला' लघुकथा का बाल मनोविज्ञान कुछ अलग है। अपनी माँ उमा को रचना बताती है–"करती तो हूँ सारा काम। सब्जी बनाने के लिए टमाटर नहीं ला के दिए थे। आपके साथ कपड़े भी तो धुलवाए थे।"

"पढ़ भी लिया कर।" कहने पर-"कर तो लिया स्कूल का काम।" मशीन से कपड़ा पकड़ने की शैतानी पर एक थप्पड़ खा जाती है। इसी बीच में कोई दरवाज़ा खटखटाता है। रचना एकबार कहने से दरवाज़ा नहीं खोलती। गुस्से से मम्मी की तरफ देखा। दोबारा कहने पर उठी और पापा के दोस्त के लिए दरवाजा खोला।

"कौन था?" पूछने पर रुखाई से बताया-"अंकल थे।"

साथ ही बोली, "मैंने अंकल को नमस्ते भी नहीं की।"

यह था मम्मी से खाए थप्पड़ का प्रतिकार। इस प्रतिकार में कोई छल-छद्म नहीं था, थी केवल रूखेपन से की बालसुलभ प्रतिक्रिया-"मैंने अंकल को नमस्ते भी नहीं की।" डॉ. दीप्ति ने इस एक वाक्य से 'बदला' लघुकथा को विश्वसनीय ही नहीं, अनुभूतिपरक भी बना दिया है।

बाल मज़दूरी कराना भले ही अपराध की श्रेणी में आता हो, देश के लाखों बच्चे, जिन्हें पढ़-लिखकर कुछ बनना था, बाल मज़दूर के रूप में शोषण का शिकार हैं। उनसे कठोर परिश्रम कराया जाता है। सामान्य नींद लेना भी उनके भाग्य में नहीं। सुकेश साहनी की लघुकथा 'किरचें' क्रूर शोषण का रूह कँपाने वाला चित्र है। आदि कुमारी पर भक्तों की भीड़ के कारण वह बाल मज़दूर कई दिन से सो नहीं पाया था। ऊपर से दूकानवाले की चिल्लाहट और क्रूरता। लड़के की लाल सुर्ख आँखें नींद की वजह से मुँदी जा रही थीं। उसके सामने जूठे गिलासों का ढेर लगा हुआ था। झपकी लगने से गिलास हाठ से छूटकर टूट गया। दूकानदार का थप्पड़ पड़ा। क्रूरता इतनी की उसके चारों तरफ़ किरचें फैला दी। नींद के झोंके में उसका हाथ किरच के चुभने से घायल हो गया। साबुन के घोल में न डुबोकर उसने केवल पानी से ही धोकर गिलास का ढेर लगा दिया और वहीं किरचों के बीच बेसुध होकर सो गया।

जहाँ परिवार में कोई आय का साध नहीं होता, कमानेवाले हाथ नहीं होता, वहाँ बालश्रम घर-परिवार के पोषण के लिए विवशतावश किया जाता है। जीवन-यापन के इस संघर्ष में अपनी जिम्मेदारी का एहसास करने वाले बच्चे समय से पहले ही जवान हो जाते हैं। साहनी जी की 'स्कूल' लघुकथा इसी श्रेणी में आती है। पिता नहीं हैं, माँ दरियाँ बुनकर घर का खर्चा चलाती है। बेटे ने कुछ काम ज़िद की जिसके लिए वह टोकरी-भर चने लेकर घर से निकला। बेटे को अकेले नींद भी नहीं आती, इसलिए माँ के पास ही सोता है। तीन दिन से घर नहीं लौटा। माँ की व्याकुलता स्टेशन मास्टर के सामने प्रकट होती है। गाँव के अन्धकार और सन्नाटे से भरे स्ट्रेशन पर वह व्याकुलता से आने वाली पैसेंजर ट्रेन का इन्तज़ार करती है। ट्रेन आने पर–'एक आकृति दौड़ती हुई उसके नज़दीक आई। नज़दीक से उसने देखा। तनी हुई गर्दन...बड़ी-बड़ी आत्मविश्वास से भरी आँखें... कसे हुए जबड़े... होठों पर बारीक मुस्कान।'

माँ को देखकर बेटे की गम्भीर बात-"माँ तुम्हें इतनी रात गए यहाँ नहीं आना चाहिए था!" से लगा कि तीन दिनों में उसका बेटा इतना बड़ा कैसे हो गया? 'स्कूल' कोई प्राइमरी या जूनियर स्कूल नहीं (अनजाने में कुछ पाठक शब्द के अभिधेय अर्थ तक ही सीमित रह जाते हैं) , बल्कि जीवन की वह पाठशाला है, जिसके हम सभी विद्यार्थी हैं। हर व्यक्ति, मृत्यु पर्यन्त जीवन के संघर्षों से कुछ न कुछ सीखता है। यही प्रत्येक व्यक्ति का स्कूल है। इस लघुकथा का शीर्षक 'स्कूल' रोज़मर्रा प्रयोग में आने वाला शब्द न होकर, जीवन जीने की शैली को व्यक्त करता है। परिस्थितियाँ और दायित्व चना बेचने वाले संघर्षचेता लड़के को आत्मविश्वास से भर देते हैं।

सुकेश साहनी की अन्य लघुकथा 'प्रक्षेपण' में रोहित की मनःस्थिति का सूक्ष्म चित्रण है। उसे रमन अंकल के यहाँ से रोज़-रोज़ अखबार माँगकर लाना पसन्द नहीं। कारण-जब वह अखबार माँगने जाता है, तो उसे उस परिवार की उपेक्षा-भरी दृष्टि का सामना करना पड़ता है। परिवार के दबाव में उसे जाना पड़ता है। रोहित के परिवार वाले उसकी मनोदशा नहीं समझ पाते हैं। पापा की जलती हुई आँखें उसे रमन अंकल के घर जाने को बाध्य करती हैं। रोहित माँगकर अखबार नहीं लाना चाहता; क्योंकि ऐसा करने से उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है। घर के सभी सदस्य उसे कामचोर, बहानेबाज बताकर प्रताड़ित करते हैं। लेखक ने रमन की स्थिति को बताने के लिए–'बरामदे में उनका झबरा कटोरे से दूध पी रहा था' का प्रसंग इस कथा में जोड़कर कुत्ते की हैसियत का संकेत किया है। बच्चे को केवल बच्चा नहीं समझना चाहिए। बड़ों की तरह उसका भी आत्मसम्मान महत्त्वपूर्ण है।

बच्चे के विकास और मानसिक पोषण और व्यवहार पर माता-पिता के कार्यकलाप और व्यवहार का सीधा प्रभाव पड़ता है। इस प्रसंग में उषा लाल की 'संस्कार' लघुकथा देखिएगा। किट्टी पार्टी में-'संस्कारों के निर्वहन में माँ की भूमिका' पर चर्चा की गई। शिल्पा को रास्ते में कोई वाहन नहीं मिला, जिसके कारण वह थक गई थी। घर पहुँचकर अपने नौकर चन्दन को आवाज़ लगाई, जिसको उसने सुना नहीं, तो वह चिल्लाई—'चन्दन, ओ चन्दन, मर गया क्या? " वह दौड़कर पानी का गिलास ले आया। इसी बीच उसका चार वर्षीय बेटा नितिन भी स्कूल से आ गया था। बस्ता फर्श पर पटककर वह भी चिल्लाया-' मम्मी, मुझे रोटी दो, भूख लगी है। 'माँ के न सुनने पर-' मम्मी, ओ मम्मी! जागी हो या मर ...। '

शिल्पा तमतमाकर बोली-'बावा, ये क्या तरीका है मम्मी से बोलने का?'

नितिन ने जब गले से लिपटकर भोलेपन से कहता-'मम्मी, मुझे रोटी दे दो, भूख लगी है' शिल्पा को चंदन से हुआ अपना वार्त्तालाप स्मरण हो आया। छोटे बच्चे अनुकरण से बहुत-सी बातें अनायास सीखते हैं। उन्हें सही-गलत का उस समय पता नहीं होता; अतः बड़ों को अपने व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए।

संग्रह-वृत्ति बच्चों का विशेष गुण है। वह कंकड़-पत्थर हों या कुछ और। जिन चीज़ों से बच्चों का लगाव होता है, वही उनके लिए बहुमूल्य होती हैं। छोटी से छोटी वस्तु से उनका लगाव, उन्हें जीवन-जगत् के इस सत्य से परिचित कराता है कि वस्तु की उपयोगिता उसके लगाव से जुड़ी है। मनुष्य में यह भाव ही अतीत की स्मृतियों को सहेजकर रखने की प्रेरणा देता है। यह भाव न होता, तो आज हमारे प्राचीन स्मारक न होते, हमारी समृद्ध संस्कृति न होती, हमारे प्राचीन तीर्थ न होते। उर्मि कृष्ण की 'अमानत' बाल मनोविज्ञान पर केन्द्रित लघुकथा है। नए मकान में जाने के लिए कवि शिवा का सामान ट्रक में लद चुका है। चार साल की गुड़िया को आवाज़ दी, तो वह फ़्रॉक में कंकड़–पत्थर का बोझा लिये धीरे से बाहर आई। सरिता ने उसको डाँटा और झोली के पत्थर बिखेर दिए। माँ की इस प्रतिक्रिया से आहत गुड़िया बिखरे पत्थरों को देख फूट–फूटकर रो पड़ी। पिता ने हस्तक्षेप किया-"-ये उसके बचपन की अमानत हैं, तुम्हारे ट्रक–भर सामान से ज्यादा कीमत है गुड़िया के लिए इन पत्थरों की।"

सरिता को अपनी गलती का अहसास हुआ। तीनों मिलकर बिखरे पत्थर करने लगे तो गुड़िया खुशी लौट आई।

कबीर कहते हैं-'मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक'। कबीर का यह परामर्श उनके लिए है, जो संयम के साथ साधना करना चाहते हैं। वह तभी सम्भव है, जब मन पर नियन्त्रण हो। सामान्य जीवन में तो मन की बात सुननी भी होती है, कोई बात मन में ठुके, तो करनी भी होती है। मन की सारी दुर्बलताएँ मनुष्य को उसकी शक्ति और सीमा का अनुभव कराती हैं। बस मन कभी पराजित न हो; क्योंकि 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।' यह भी कबीर ने ही कहा है। ये दोनों विचार एक दूसरे के विपरीत लगते हैं, पर हैं नहीं। मन किसी से मिलाना है, तो तब जो मन के अनुरूप लगेगा, जिससे अपनेपन का एहसास होगा, उसी से आत्मीयता हो सकेगी। डॉ. सुषमा गुप्ता ने 'कैमिस्ट्री' लघुकथा में इस कथ्य को बखूबी प्रस्तुत किया है।

मोहनदास की घर के गेट के सामने वाली पटरी पर बैठे रामदीन मोची से आत्मीयता है। दोनों अपने सुख-दुख की बातें एक दूसरे से कर लेते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उनके पास कुछ काम भी नहीं है। पत्नी की मृत्यु के बाद वे अकेले पड़ गए हैं। बस वक्तकटी के लिए रामदीन मोची से बतिया आते हैं। अकेले अपने मन की बात किसी और से भी करें, तो कैसे। बहू सीमा को यह आत्मीयता पसन्द नहीं। उसके आपत्ति करने पर पति उसे समझाता है-"माँ के जाने के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए हैं। अब तुम और मैं तो दफ़्तर चले जाते हैं, तो समय काटने उसी से बतिया आते है।"

सीमा मुस्कुराकर स्वीकार कर लेती है कि 'कैमिस्ट्री हो तो ऐसी।' सामंजस्य के इस मनोविज्ञान को समझना होगा। चाहे जितने भी बड़े भौतिक साधन क्यों न हों, कोई भी आदमी दिनभर चुपचाप नहीं बैठ सकता। जिसके सामने मन में उठती तरंगों को व्यक्त किया जाए, ऐसा कोई हमदर्द तो चाहिए। संवादहीनता की स्थिति में जीवन नीरस हो जाएगा।

डॉ. सुषमा गुप्ता की 'मोहपाश' लघुकथा जीवन को उद्वेलित करने वाली घटनाओं के प्रभाव को रेखांकित करती है। यह कथा गहरे अवसाद में डूबे एक पिता की विभ्रम की मनःस्थिति का मार्मिक चित्र है। पति-पत्नी के ये संवाद देखिए-

"आ गया लगता है। जा दरवाज़ा खोल दे।"

"नहीं जी, कोई नहीं आया।"

"अरे खिड़की पर लाइट चमकी अभी गाड़ी की। देख ध्यान से वही होगा। कार साइड लगा रहा होगा।"

खुद ही जाकर देखता और स्वीकार करता है कि 'बाहर तो कोई नहीं है पर लाइट तो हमारे गेट पर ही चमकी थी।'

वह बेहद निराश हो बोला।

" XX

"चलो अब सो जाओ। जब आना होगा आ जाएगा। बहू खोल देगी अपने आप। यूँ ही बेटे के मोह में रात काली करते हो।"

"क्या करूँ, नींद ही नहीं आती वह जब तक घर नहीं आता।"

पानी लेने के लिए बहू रसोई में आती है, तो दोनों को सोने को कहती है-"कल इनकी बरसी है। आने जाने वालों का ताँता लगा रहेगा फिर आराम नहीं मिलेगा आप दोनों को।"

लाइट फिर चमकी खिड़की पर और बूढ़ा फिर सजग हो गया कि शायद अब की ।

जवान बेटे की मृत्यु से संतप्त बूढ़ा पिता, विभ्रम की स्थिति में जी रहा है। खिड़की पर लाइट के चमकते ही उसे लगता है कि बेटा ऑफ़िस से आ गया है। पिता की इस करुणा-विगलित मनःस्थिति को सुषमा गुप्ता ने मार्मिक संवादों के माध्यम से जिस प्रकार कथ्य सम्प्रेषित किया है, वह पाठक को बरबस द्रवित और विचलित कर देता है। यह लघुकथा अवचेतन मन की बहुत—सी दुखती पर्तों को एक-एककर खोलती है।

जीवन एक पुस्तक है, वह पुस्तक, जिसके हर संस्करण में आवश्यकता एवं परिस्थिति के कारण कुछ अध्याय जुड़ते जाते हैं, कुछ अध्याय समयातीत होने के कारण हटाए भी जाते हैं। नई पीढ़ी का जीवन पाँच दशक पहले जैसा सीधा-सपाट नहीं रह गया है। वैश्विक परिस्थितियाँ निरन्तर बदल रही हैं। घटनाक्रम इतनी तीव्रता से बदल रहे हैं कि व्यक्तिगत जीवन में सामंजस्य बिठाना सरल न होकर और अधिक जटिल हो गया है। आज वह युग नहीं रह गया कि बच्चे माता-पिता या किसी अन्य की डाँट खाकर चुपचाप बैठ जाएँ। बच्चों की कोमल भावनाओं को समझना बहुत ज़रूरी है।

अनिता ललित की लघुकथा 'दहशत' में माता पिता की चिन्ता और उनके मन की आशंका का कारण है पेपर खराब होने पर पुत्र को डाँट देना। माँ रीना की आँखों में आँसू हैं और मन में डर है-'बेटा अट्ठारह वर्ष का हो रहा है, गर्म ख़ून है! भगवान न करे! कहीं कुछ उल्टा-सीधा कर बैठा तो'। अखबार में छपने वाली आए दिन की आत्महत्या की सुर्खियाँ और भी डराती हैं। बेटे रिंकू को फ़ोन मिलाया; मगर फ़ोन अभी भी स्विच ऑफ था'। फोन का स्विच ऑफ़ होना, दोनों को और डराता है। रवि सोचते हैं कि दोस्तों के साथ व्यस्त होगा। उन्हें नई पीढ़ी से और भी शिकायते हैं-लापरवाही, आलस्य, आराम तलब होना, धैर्य और सहनशीलता का न होना।

कार हॉस्टल के सामने पहुँची ही थी कि सामने से रिंकू एक बैग लिए हुए आता दिखा! रीना दौड़कर उसके पास पहुँची और उससे लिपट गई! रिंकू अचकचा गया! वह हैरान था, माँ के इस अप्रत्याशित व्यवहार से।

रिंकू एक सेमिनार में गया था, इसलिए फ़ोन स्विच ऑफ था! उसने पापा की डाँट का बुरा माना ही नहीं। उसने पापा को गले लगाते हुए कहा-"आय एम सॉरी पापा! आपका बेटा हूँ, कुछ ग़लत नहीं करूँगा! मुझपर भरोसा कीजिए!"

इस लघुकथा का एक-एक वाक्य सधा हुआ है। कथा में रीना और रवि के अन्तर्द्वन्द्व को बहुत कुशलता से चित्रित किया है। यह लघुकथा पाठक को आद्यन्त अपने साथ बहा ले जाती है।

परिवार, माता-पिता से लेकर सन्तान तक भावनात्मक संरक्षण का आधार है, आत्मीयता की शक्ति है, सम्मान और प्रेम इसको अभिसिंचित करने वाला निर्मल जल है। आनन्द हर्षुल की लघुकथा 'बेटी का क़द' में इसकी उष्मा को अनुभव किया जा सकता है। माँ का एड़ी उठाना, पिता का घुटने मोड़कर बेटी के कद को बढ़ाना, केवल क़द तक सीमित नहीं, बल्कि उस रूढ़ि को तोड़ना है, जो बेटी के महत्त्व को नकारती रही है। गहन आत्मीयता की अन्तर्धारा परिवार की शक्ति है। परिवार की शक्ति के बिना समाज सुदृढ़ नहीं होता। आत्मीयता का यह संस्पर्श पूरे घर को इस प्रकार सुरभित और प्रभावित करता है-

'जहाँ वे थे एक दूसरे से कद का खेल खेलते-खेलते वही फर्श पर ढेर से फूल खिल आए थे अचानक, बिना मिट्टी और पानी के-सुंदर फूल।' आनन्द हर्षुल लघुकथा-जगत् के उन गिने-चुने लेखकों में से एक है, जिन्होंने इस विधा की गरिमा और अभिव्यक्ति को ऊँचाई प्रदान की है।

बेटी की महत्ता और सामाजिक एवं पारिवारिक चेतना के लिए रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की 'नवजन्मा' भी देखी जा सकती है।

तीसरे व्यक्ति की भूमिका परिवार को जोड़ने और तोड़ने का काम करती है। यह उस तीसरे व्यक्ति के सोच पर निर्भर है कि वह परिवार का हितचिन्तक है या नहीं। बदलते दृष्टिकोण, संस्कार और हैप्पी मदर्स डे ऐसी ही लघुकथाएँ हैं। तीसरा व्यक्ति जोड़ता भी है और कभी दरार भी पैदा करता है; लेकिन कभी सफल होता है, कभी नहीं हो पाता।

जब कोई लड़की वधू बनकर ससुराल आती है, तो उसे परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने में समय लगता है। कारण है-मायके और ससुराल के अलग-अलग तौर तरीके और जीवन-शैली। ससुराल वाले चाहते हैं कि बहू केवल उनके अनुसार चले। उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं रह जाती। तनाव का कारण बनता है पति और अन्य लोगों में से किसकी बात को वह प्राथमिकता दे। डॉ.उपमा शर्मा की 'बदलते दृष्टिकोण' लघुकथा पारिवारिक इसी द्वन्द्व पर आधारित है। सासू माँ के गुस्से का कारण है विलम्ब से चाय लाना और उसमें भी चीनी कम। मीनू ने जब भाभी से पूछा, तो बताया कि माँ जी की चाय में ज्यादा चीनी डालने पर आपके भाई नाराज होते हैं। माँ को शुगर है न। "भाभी के इस तर्क पर सासू माँ और नाराज़ हो उठती है और इसे बेटे के विरुद्ध भड़काने की बात कह जाती है। मीनू भाभी के कार्य का समर्थन करती है, तो सासू माँ अपने लिए सब्जी में नमक, मसाले और तेल कम डालने का आरोप लगाती है? बेटी मीनू का यह कहना-" हृदय रोगी हो आप और ये सब नुकसान देता है आपको। "

बेटी के समझने पर माँ आहत होती है-"यह भी बता... और तू कब से इसकी इतनी तरफ़दारी करने लगी! कल तक तो मेरी हाँ में हाँ मिलाती थी!" माँ ने आश्चर्य से बेटी को देखते हुए कहा।

मीनू ने नजरें झुकाकर जबाब दिया, "तब मैं किसी की भाभी नहीं थी माँ।"

मीनू का यह कथन पारिवारिक सामंजस्य का सूत्र है। मीनू अपने घर और ससुराल के दोनों परिवार के अनुभवों के कारण व्यावहारिक अन्तर को समझ चुकी है।

आशु बेटे के पुत्री का जन्म हुआ, तो माँ शीला को बुलावे का इन्तज़ार है। सहेली बिना का यह कहना-"उसे माँ की नहीं, आया की याद आई है। मैंने भी दुनिया देखी है" गुमराह करता है। ॠता शेखर 'मधु' ने 'संस्कार' लघुकथा में परिवार में तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप को चिह्नित किया है। शीला बेटे के पास न जाने का मन बना लेती है।

"माँ, किस दिन का टिकट ले लूँ?" आशु के पूछने पर-"बेटा, अभी कुछ दिन के लिए रहने दे। कुछ काम आ गया है" कहकर टालना चाहती है।

"किन्तु कल तक तो आप तैयार थीं, आज अचानक क्या हो गया।" आशु ने माँ की चुप्पी ताड़ ली-"माँ, यदि आप यह समझ रही हैं कि मैं आपको काम के लिए बुला रहा हूँ, तो आप गलत हैं। मेरे घर में बाई, कुक और आया, सभी हैं। फिर भी कुछ कमी है।"

"क्या," शीला असमंजस भरी आवाज़ में बोली।

"परमात्मा वाली नज़र गुड़िया के लिए चाहिए माँ," कहते हुए आशु भावुक हो गया।

"कल की टिकट ले-ले बेटा," शीला ने सहज भाव से कहा।

तीसरे व्यक्ति के रूप में निशा की भूमिका-कृष्णा वर्मा की 'हैप्पी मदर्स डे' में भी मतभेद का बीज वपन करने का प्रयास करती है। उद्विग्नता के कारण रमा भी उससे मिलना चाहती है। मिलने पर वह रमा जी से पूछ बैठती है-"आज आप भी कुछ उखड़ी-उखड़ी—सी लग रही हैं। सब ठीक तो है? तबीयत तो ठीक है ना?"

कुरेदकर पूछते ही रमा अपनी बहू अनु के बारे में बता देती है-"आज तो अनु ने हद ही कर दी। घर का काम यूँ ही फैला छोड़कर इतनी जल्दी चली गई कि मेरे उठने का इंतज़ार भी नहीं किया। ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं। इतना भी नहीं कि एक फोन ही कर दे। बस यही सोच मन खिन्न—सा हो गया था। सोचा, तुम से ही बातचीत करके मन हलका कर लूँ। अनु को क्या चिंता, मैं हूँ ना सब काम देखने के लिए।"

इसी बीच गुड़िया जाग गई। दरवाज़े की घंटी बजी, तो निशा ने दरवाज़ा खोला, तो सामने अनु खड़ी थी। रमा भी गुड़िया को लेकर आ गई, तो उसे आश्चर्य हुआ-"अरे अनु–आज इतनी जल्दी घर?"

"मम्मी जी, आज से मैंने सोमवार के व्रत शुरू किए हैं। सुबह जल्दी निकल गई थी कि मंदिर दर्शन करके समय से दफ़्तर पहुँच जाऊँ। आपकी नींद खराब न हो, सो आपको सुबह उठाना उचित नहीं समझा; इसलिए नवीन से कह गई थी कि आप को बता दें।"

हाथ में पकड़ा लिफाफा सासू माँ के आगे बढ़ाती हुई बोली, "हैप्पी मदर्स डे मम्मी जी!" आज शाम आपको खाने के लिए बाहर ले जा सकूँ; इसलिए ही जल्दी आई हूँ।

रमा के मन में जो शंका थी, वह निर्मूल सिद्ध हुई। आशंका का जो तूफ़ान सिर उठाने लगा था, शमित हो गया। रमा के पास स्वयं को धिक्कारने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा था। परिवार सन्तुलित रहे, इसलिए आपसी सद्भाव को सचेतन रखना आवश्यक है।

ठीक इसके विपरीत शशि पाधा की 'घर' लघुकथा है, जिसमें तीसरे का हस्तक्षेप नहीं है। नई बहू लता ने अपनी सुशीलता और मृदुभाषिता से उसने सब का दिल जीत लिया था। उसकी सास 'मीरा' भी उसे इस घर के नए परिवेश में ढल जाने के लिए सहायक थीं। मीरा ने देखा पास वाले स्टोर रूम में लता के खाली सूटकेसों के पास ब्राउन कागज़ में लिपटा पैकेट पड़ा था। वह पैकेट खोला नहीं गया; क्योंकि उसमें बहू के मम्मी–पापा की तस्वीर थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि इसे कहाँ रखूँ। "

मीरा ने वह तस्वीर बैठक की कोने वाली मेज़ पर करीने से रख दी। 50 वर्ष पहले मीरा ने अपने लिए भी ऐसा ही सोचा था; किन्तु तब वह हिम्मत नहीं जुटा पाई थी।

अब बैठक की उस मेज पर मीरा और उसके पति की तस्वीर के साथ, लता के माता–पिता की तस्वीर भी सजी थी।

बहू के साथ यदि सभी ऐसा व्यवहार करें, तो घर एक आत्मीय सुगन्ध से सुरभित हो सकता है।

परिवार में पिता वह सदस्य है, जिसकी तरफ़ बहुत कम ध्यान जाता है। जैसे किसी पौधे को हवा-पानी चाहिए उसी प्रकार पिता को भी आत्मीयता की ऊष्मा की आवश्यकता है। 'प्रेम' चन्द्रेश कुमार छतलानी की वैसी ही अभिभूत करने वाली लघुकथा है। बेटा दस वर्षों के बाद विदेश से लौटा है। लोग दबी ज़ुबान से आक्षेप लगाते ही हैं। पिता के बचने की आशा नहीं है। चिकित्सक ने 'ना' की मुद्रा में सिर हिला दिया। पुत्र को आया देखकर पिता ने संकेत किया और मन्द स्वर में कहा-"एक बार...अपनी गोद का सिराहना दे दे।" पिता ने गहरी और सन्तुष्टि-भारी साँस लेकर आँखें मूँद लीं।

वह अपने पिता के चेहरे से नजरें नहीं हटा पाया, कुछ क्षणों तक देखने के बाद उसे एकाएक याद आया कि उसके पिता पहली बार उसकी गोद में लेटे थे और वह न जाने कितनी बार।

इस लघुकथा के ताने-बाने पर ध्यान देना होगा। कोरा कथन लघुकथा के लिए कोई अर्थवत्ता नहीं रखता। इस तरह का कथन लघुकथा की संजीवनी बन सकता है। कुछ नए-पुराने लेखक निष्प्राण और निरुद्देश्य कथन द्वारा बलात् लघुकथा गढ़ने के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे लेखकों को चन्द्रेश कुमार छतलानी की इस लघुकथा को ध्यान से पढ़ना चाहिए। संवेदना की ऊष्मा के कारण 'प्रेम' लघुकथा पाठक के हृदय को छू लेती है। यह केवल समापन पर नहीं रुकती, बल्कि उससे आगे प्रवासी सन्तानों को भी सजग करती है। 'उसके पिता पहली बार उसकी गोद में लेटे थे और वह न जाने कितनी बार' यह अनुभूति द्रवित कर देती है।

मृत्यु शय्या पर लेटे एक और पिता की व्यथा-कथा है-ज्ञानदेव मुकेश की 'मुक्ति' , जिनके प्राण किसी उधेड़बुन में उलझे हुए हैं। उन्होंने कई गरीबों को कर्ज दिया और कर्जदारों से छोटे-छोटे पुर्जे बनवाकर रख लिये थे। उन्होंने एक दिन बेटे से पूछा, "बेटा, कर्ज के वे पुर्जे कहाँ हैं?" बेटे ने कर्ज के वे सारे पुर्जे लाकर उनके सिरहाने के नीचे रख दिए। बेटे ने इसे मोह समझा।

पिता ने बेटे से बीड़ी पीने की इच्छा जताई। बेटा पिता को माचिस और कुछ बीड़ी थमाकर चला गया।

अगली सुबह पिता नश्वर शरीर का परित्याग कर चुके थे। बेटे ने वे पुर्जे खोजे; पर सिरहाने के नीचे नहीं मिले। ज़मीदार पिता ने वे पुर्ज़े जला दिए थे। वे सभी गरीबों को कर्ज से मुक्त करके, खुद भी मुक्त हो गए थे। कर्ज़ वसूल करना उनको व्यथित करता रहा। अब उनके चेहरे पर दोष-मुक्ति के भाव थे।

प्रियंका गुप्ता की 'भूकम्प' लघुकथा में वह पिता हैं, जिनकी ज़िन्दगी की अहमियत अब रह ही कितनी गई है। वैसे भी उनका गू-मूत करते-करते थक चुका था वो...और उसकी पत्नी भी। ऐसे में अगर भूकंप में वह खुद ही भगवान को प्यारे हो जाएँ, तो उस पर कोई इलज़ाम भी नहीं आएगा। यह पुत्र की निम्न कोटि का सोच है। बाऊ जी तो न चल पाने के कारण घर में छूट गए, लेकिन हड़बड़ी में दुधमुँहा बच्चा अपने पालने में ही रह गया था। अंदर की ओर भागते उसके कदम वहीं थम गए। वह गिरते-गिरते बच गया था। एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता की गोद में उसका लाल था।

जाने भूकंप का दूसरा तेज़ झटका था या कुछ और ...पर वह गिरते-गिरते बच गया था।

यह भूकम्प का दूसरा झटका ही था कि जिस पिता की मरण-कामना कर रहे थे, वही अशक्त पिता उस बच्चे को गोद में लिये हुए थे। प्रियंका ने भूकम्प के द्विअर्थी शीर्षक के माध्यम से लघुकथा के कथ्य को सार्थक रूप से सम्प्रेषित किया है।

माता-पिता को बोझ समझने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में सविता मिश्रा 'अक्षजा' की लघुकथा 'तोहफ़ा' लू-लपट में शीतल बयार की तरह है। रामसिंह पोस्टकार्ड और एक लिफ़ाफ़ा, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था- 'वृद्धाश्रम' लिखा था, पाकर हतप्रभ और सन्तप्त होकर पत्नी को आवाज़ देते हैं-"सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाड़ले ने क्या हसीन तोहफ़ा भेजा है!" पिता कभी अपने पुत्र से खुश नहीं रहे। शायद इस सोच के पीछे यह सोच हो। लिफ़ाफ़ा खोला, तो उसमें नए घर का चित्र था। लिफ़ाफ़े में और नीचे लिखा था-"बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।"

पढ़कर रामसिंह और उनकी पत्नी सरोजा के आँखों से झर-झर आँसू एक बार फिर बह निकलें।

इस तरह के उदाहरण कम ही होते हैं, लेकिन होने चाहिए, ताकि टूटते परिवारों को जोड़ने का प्रयास जारी रहे

डॉ. मधु सन्धु की 'अभिसारिका' लघुकथा उन वयोवृद्ध दम्पती की व्यथा का फोटोग्राफ़िक चित्रण है, जो अपने छोटे और बड़े बेटे के पास अलग-अलग रह रहे हैं। कोई एक बेटा दोनों को एक साथ नहीं रखता। माता-पिता का भी छोटे और बड़े बेटे ने बँटवारा कर रखा है। जो स्वर्णिम दिनों में एक साथ रहे हों, उनको अलग-अलग रखना मानसिक क्रूरता है। मधु सन्धु जी ने दोनों के मिलन को नए जोड़े की तरह ही उत्सुक दिखाया। दोनों ने 'टखनों-घुटनों, वात-पित्त-कफ एवं दाँतों-मसूड़ों पर चर्चा की। गुनगुनी धूप में चाट का मज़ा लिया, घड़ी देखी और फिर अलग-अलग रास्तों पर चल दिए।' यह लघुकथा करुणा से ओतप्रोत है।

परिवार की बढ़ती उपेक्षा कितना असहाय बना देती है, इसे रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की लघुकथा 'स्पेस' में भी देखा जा सकता है।

'प्रेम' परिवार की सुरक्षा का वह घेरा है, जो बुज़ुर्गों को आश्वस्त करता है। पौत्र ध्रुव के माध्यम से शशि पाधा ने 'मंजिलें लाँघता दर्द' लघुकथा में इस संवेदना का बल प्रदान करती हैं। ध्रुव ब्लॉक जोड़कर 'बड़ी-सी बिल्डिंग' बना रहा है, कई मंज़िला। कारण-"इसमें हम सब मिलकर रहेंगे। चाचा, मासी और मेरे सारे कज़िन्स। कितना मजा आएगा न दादी।"

दादी के घुटनों में दर्द है। वह घुटनों पर दवाई लगा रही है। कुछ देर बाद सोचकर ध्रुव ने बिल्डिंग की ऊपरी मंज़िलों से ब्लाक्स निकाल दिए। अचानक ध्रुव ने उनकी कुर्सी के पास आकर बड़े प्यार से कहा, "दादीमाँ! देखिए न, अब मैंने केवल एक ही मंजिल का घर बनाया है। लिफ़्ट खराब होने पर आप को सीढ़ियाँ चढ़ने में दर्द होता है न; इसीलिए यह बड़ा—सा घर बनाया है। सब यहीं रहेंगे। सभीईईईई——–।"

और दादी माँ का दर्द कई मंजिलें लाँघता हुआ कहीं दूर उड़ गया।

बच्चे के माध्यम से लेखिका ने जिस एहसास और संस्कार की बात की है, वह सुखी परिवार के लिए अपरिहार्य और अनिवार्य है।

ससुराल पक्ष के कुछ ऐसे भी विवाद होते हैं, जिनको मायके वाले हवा देते हैं। कुछ तो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर बेटी का घर उजाड़ने में पीछे नहीं रहते। शशि बंसल की लघुकथा 'विकल्प' में इला और कमल में आपसी मतभेद रहता है। माँ के यहाँ पहुँचकर इला शिकायत करती है और हमेशा के लिए माँ के यहाँ आकर रहना चाहती है। माँ का यह कहना-"तेरे पापा से पूछती हूँ"-लता को विचार बदलने को बाध्य करता है। वह-"इसकी ज़रूरत नहीं"-व्यंग्य मिश्रित मुस्कान फेंक इला पर्स उठाकर बाहर निकल गई।

यहाँ लेखिका का मन्तव्य है कि पति-पत्नी को अपने मतभेद स्वयं सुलझाने चाहिए। तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति, दाम्पत्य सम्बन्धों में सहायक नहीं हो सकती।

आज के युग में भला आदमी होने की नियति है, सबके शोषण का शिकार होना, मूक बनकर रहना, प्रतिकार न करना। घर-परिवार में यह सामान्य बात है। मंजरी इस समझदारी शब्द के पीछे छिपे शोषण में केवल मूक द्रष्टा बनी रही है। इस नियति को सीमा सिंह की लघुकथा 'समझदार' में देखा जा सकता है। चाहे दूध का सन्दर्भ हो, चाहे पढ़ाई का या शादी का। ससुराल में आकर भी समझदारी का यह तमगा भ्रूण परीक्षण तक पहुँचता है, ताकि वंश चलाने के लिए लड़के का जन्म सुनिश्चित किया जा सके। "तुम तो समझदार हो, सोचो अगर तुझे भी बेटी हुई, तो वंश आगे कैसे चलेगा"-सासू ने कहा था और साथ ही पति ने भी पूछा-"तो क्या सोचा मंजरी?"

सुनकर बरसों का दबा आक्रोश एक साथ फूट पड़ता है-"नहीं चाहिए मुझे, ये समझदारी का तमगा, जो मुझे अजन्मे की हत्या में भागीदार बनाता हो।"

इस प्रतिकार से उसने स्वयं को बहुत हल्का महसूस किया।

अपनी उन्नति के लिए दूसरे का चरित्र हनन आज की परिपाटी बन गई है। राजनीति, साहित्य, समाजसेवा, न्याय, प्रशासन, मीडिया, विज्ञापन आदि क्षेत्रों में इसे देखा जा सकता है। अपने डूबते करियर को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए घटिया उत्पाद को बढ़िया बताना तथा अच्छे उत्पाद को घटिया बताकर प्रचारित करना, ओछी हरकत ही कही जाएगी। अर्चना राय ने 'सीढ़ी' लघुकथा में चुस्त संवादों के माध्यम से इसे सफलतापूर्वक अभिव्यक्त किया है। प्रायः देखा गया है कि प्रतिष्ठित व्यक्ति को निशाना बनाया जाता है ए, ताकि अपना स्वार्थ सिद्ध हो सके। विज्ञापन में काम करने वाले नायक का कथन कितना घातक और शर्मनाक है-

"वह क्या है न सर? बेईमान को बेईमान कहने से वह पब्लिसिटी नहीं मिलती, जो ईमानदार को बेईमान..."-कहते हुए वह ढिठाई से हँसने लगा।

समाज का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले मीडिया का असली रूप सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ' भीतर की आग में दिखाई देता है। समाचार-पत्र जिस पवित्रता की दुहाई देकर अच्छा बनना चाहते हैं, उसके भीतर का सच कुछ और ही है। जिसमें सही काम करने की आग है, उसका जीवन कुछ और ही है। सुदीप को अखबार का सम्पादक व्यावहारिक होने के लिए कहता है। यही व्यावहारिकता दुनियादारी है। सुदीप को यह दुनियादारी स्वीकार नहीं है। यही कारण है कि उसे यहाँ की नौकरी छोड़कर किसी दूसरे अखबार का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा। वर्त्तमान कालखण्ड को देखें, तो मीडिया ऐसे लोगों से भरा है, जो पैसे लेकर देश के विरोध में भी लिखने को तैयार है। उन पत्रकारों के लिए निजी हित और स्वार्थ ही सर्वोपरि हैं।

हमारा समाज परम्पराओं में इतना जकड़ा है कि लोभवृत्ति के कारण शोषण को भी महिमामण्डित किया जाता है। कितने भी कानून बन जाएँ, दहेज के लोभी कोई न कोई मार्ग ढूँढ ही लेते हैं। कमल चोपड़ा 'डाका' लघुकथा में इस जड़ परम्परा पर कड़ा प्रहार करते हैं। लेखक ने ब्रजनाथ के यहाँ दहेज की लूट और सेठ मदन लाल के यहाँ डकैती की लूट में जो साम्य प्रस्तुत किया है, उससे पुराने विषय को भी धारदार बना दिया है। दहेज लेने वाले भी नगदी, बर्तन, कपड़ा आदि समेट रहे हैं और उसी समय डाका डालने वाले भी वही काम कर रहे हैं। दोनों लुटे परिवारों की एक—सी स्थिति है, लेकिन लेखक का यह कथन देखिए, जो लघुकथा को अनुप्राणित कर देता है-थोड़ी ही देर में गाँव में पुलिस आ गई; लेकिन न जाने क्यों पुलिस का एक भी आदमी ब्रजनाथ जी के घर नहीं आया था।

इस लघुकथा में कोई संवाद नहीं, हैं तो केवल कुछ कथन। कथ्य में किसी कथन से कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता, बल्कि कथ्य का विकास होता है। प्रत्येक कथ्य 'डाका' लघुकथा को एक त्वरा प्रदान करता है। कारण, प्रत्येक कथन की सार्थकता और पारस्परिक निबद्धता। सपाट और निरर्थक कथन को घसीटकर लघुकथा गढ़ने वाले इस कथा की संरचना से सीख ले सकते हैं।

मानवीयता वह गुण है, जो केवल मानव मात्र के लिए ही नहीं, वरन् प्रत्येक जीव के लिए हृदय में दया और करुणा-भाव को प्रश्रय देता है। कुत्ते का सन्दर्भ किसी को गर्हित सिद्ध करने के लिए दिया जाता है, जबकि वह अपने पालक के लिए जान भी जोखिम में डाल देता है। मेरी मँझली बहन की शादी के समय बढ़िया भोजन परोसने पर भी हमारे कुत्ते ने छुआ तक नहीं। फेरों की रस्म पूरा होने तक माँ और कुछ अन्य लोगों का भी उपवास था। बहन जब पहली बार ससुराल गई, तो कुत्ता भी हमारे ताँगे के साथ ही गया। बहन की ससुराल में मक्का की रोटी मिली, तो उसने नहीं खाई, ससुराल वालों ने मज़ाक किया कि तेरा यह भाई बहुत नखरेवाला है। तुम्हारे यहाँ इसे गेहूँ की रोटी मिलती है। बहन ने कुत्ते को डाँटा कि तू मेरी बेइज्जती करा रहा है। यहाँ से चला जा। वह वहाँ से तुरन्त चल दिया। रास्ते के कुत्तों से लड़ता-झगड़ता लहूलुहान होकर 12 किमी दूर हमारे घर पहुँचा। इसी तरह मध्य प्रदेश में 22 मई, 1997 को सुबह लगभग चार बजे भयंकर भूकम्प आया। घर की पालतू कुतिया रोमा भौंककर भूकम्प की आहट से जगाती रही। मैंने उठकर उसे डाँटा और फिर लेट गया। वह शान्त नहीं हुई। इसके बाद हम कोई अनहोनी सोचकर जागे कि सारा घर हिलने लगा। हम सब घर से बाहर निकल आए। क्या प्रकृति आपदा का पूर्वानुमान करने की संवेदन शक्ति मनुष्य में है? उत्तर होगा, नहीं। मनुष्य का धर्म है कि जीवों के लिए अपने हृदय में करुणा और मानवीयता का भाव पोषित करे।

कपिल शास्त्री की 'आगंतुक' इसी मानवीयता की पुष्टि करता है। जनवरी की कड़कड़ाती ठण्ड में पिल्ले को आश्रय देने से पत्नी का कोप-भाजन बनने की सम्भावना थी। उसकी आवभगत करने में व्हाट्सएप्प, फेसबुक, टी-वी-सीरियल सब भूल जाना उसके प्रति मानवीय भाव को उजागर करता है। पत्नी की शर्त है-'ले तो आए हो, अब तुम ही इसकी गन्दगी भी साफ करना।' पति और बेटी द्वारा सहर्ष स्वीकार कर लेना, इस लघुकथा को आद्यन्त अनुभूतिपरक एवं पठनीय बना देता है।

प्रियंका गुप्ता की लघुकथा 'जानवर' सड़क पर लावारिस घूमने वाले कुत्ते पर केन्द्रित है, जो दिनभर इधर-उधर भटकता; लेकिन सूरज डूबने से पहले अपने मुहल्ले में वापस आ जाता। मुहल्ले वाले बासी-तिबासी खाना उसके आगे डाल देते। डिनर लेने के बाद बचा-खुचा खाना बाहर आकर उसे खिलाना, माला का नियम बन गया था। एक दिन रसोई का काम समेटकर माला उसे खाना देने के लिए बाहर आई, दूसरे गेट की आड़ में खड़ा आवारा आदमी उसे दबोचकर घर के अन्दर ले जाने लगा। सन्नाटे-भरी रात में वह भीतर तक काँप गई। इसी बीच अपराधी चीखा। कुत्ते ने चुपके से उसके पैरों में दाँत गड़ा दिए थे। उसे भागने का मौका नहीं मिला। चीख सुनकर मुहल्ले वाले आ गए और उसे पुलिस को सौंप दिया। इस कथा के सन्दर्भ में लेखिका का यह कथन बहुत सार्थक है-लोगों की निगाह में यह कुत्ता एक जानवर है; पर असली कुत्ता तो वह था, जो आदमी के खोल में किसी जानवर से भी ज्यादा ख़तरनाक हो सकता था।

आदमी रूपी जानवर से तो यह कुत्ता अधिक श्रेष्ठ है।

सुकेश साहनी की लघुकथा 'दूसरा चेहरा' बहुत चर्चित रही है और बरसों से पाठ्यक्रम का हिस्सा है। मिक्की द्वारा कुत्ते के पिल्ले को घर लाने और मुख्यतः दादी माँ के प्रतिरोध पर आधारित है, जो मानती हैं-"राम–राम! कुत्ता सोई, जो कुत्ता पाले।" मिक्की अपने दोस्त से पिल्ला माँग लाया था। इस पर माँ भी चिल्लाई थी। बस उसको एक रात रखने की इजाजत मिली थी। रात में जब पिल्ला दादी माँ की चारपाई पर चढ़ने का प्रयास करने लगा, तो उसने देखा-दादी ने दाएँ–बाएँ देखा...पिल्ले को उठाया और पायताने लिटाकर रजाई ओढ़ा दी।

कठोर चेहरे के पीछे दादी माँ का यह दूसरा चेहरा भी है, जो जीवों के प्रति करुणा से ओतप्रोत है। लेखक ने इस तथ्य को भी स्थापित किया है कि कठोर दिखने वाला हर व्यक्ति, कठोर नहीं होता।

मानव का जीवन बहुत ऊहापोह-भरा होता है। हमें जो नहीं मिल पाता, वही अभाव बनकर उद्वेलित करता है। जिसने संसार का परित्याग कर दिया, उसे संसार से अनुरक्ति होने लगती है। जो सांसारिक जीवन जी रहा है, उसे लगता है कि सारा जीवन यों ही व्यर्थ में व्यतीत कर दिया। वास्तव में जिसको जो नहीं मिला, उसे वही प्राप्य लगने लगता है। चित्रेश की लघुकथा 'डुबकियाँ' में जीवन के इसी सत्य की स्थापना होती है। कॉलेज छोड़ने के बाद आज करीब पचास साल बाद दो बूढ़े राधाकिशन और मूलचंद ट्रेन में मिलने पर एक दूसरे को पहचान जाते हैं। एक दूसरे के बारे में बात करते हैं। मूलचंद व्यापार में पूरी तरह डूब गया और राधाकिशन ने समाज सेवा और धर्म प्रचार से समय निकाल दिया। एक को अफ़सोस हो रहा सांसारिक जीवन में डूबकर धर्म से दूर होने का, तो दूसरा अफ़सोस कर रहा है कि उसने सांसारिक जीवन का आनन्द नहीं लिया। दोनों ही, जो न पा सके, उसी के लिए उद्विग्न हैं। सन्तुष्टि का न होना ही जीवन की डुबकियाँ हैं, जिसमें अधिकतम व्यक्ति गोता गाते रहते हैं।

जीवन के लिए प्रेम अमूल्य निधि है। जिसके जीवन में प्रेम नहीं, वह असामान्य होने के कारण किसी भी समय मानसिक विकृति का शिकार हो सकता है। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की प्रथम लघुकथा– 'इन्तज़ार' (रचना तिथि: 29 जून 1972) इस सन्दर्भ में देखी जा सकती है।

जीवन के कुछ ऐसे भी प्रसंग होते हैं, जिनको प्रेम का नाम नहीं दिया सकता, लेकिन अनुराग के वे पल किसी सुखद ऊष्मा से कम नहीं होते। सारिका भूषण की 'एक स्पेस' लघुकथा, मनोवैज्ञानिक लघुकथा है, जो मानव मन की गुह्यतम अनुभूति को विश्लेषित करती है। भ्रमण के समय मिस्टर वर्मा के मुख से 'हैलो मिसेज फ्रेश' ये तीन शब्द सुनकर न जाने कौन—सी नज़दीकियों का आभास होने लगा। ... कुछ मीठी-मीठी—सी लगने लगी थी पार्क की हवा। पेड़ों से छनकर आती धूप भी गुदगुदाने लगी थी। सारिका भूषण ने अव्यक्त; लेकिन मर्यादित सम्बन्धों को इस प्रकार व्याख्यायित किया है-'शायद हर किसी को चाहे स्त्री हो या पुरुष अपने रिश्तों के बीच एक स्पेस चाहिए। रिश्ते बोझ न बनें, उनके दायरों में घुटन न लगे, इसके लिए शायद एक मर्यादित स्पेस चाहिए।' जीवन के सूक्ष्म सम्बन्धों को सारिका भूषण ने अत्यन्त कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। घटाटोप लेखन के बीच इस प्रकार का रचनाकर्म विधा की शक्ति को प्रभासित करता है।

जीवन के विभिन्न सन्दर्भों को लेकर प्रतीकात्मक रूप से भी लघुकथाओं का सर्जन हुआ है, जिनमें मानव-मन की कुण्ठा, ईर्ष्या, प्रतिशोधात्मक भावों की अभिव्यक्ति हुई है। यह अभिव्यक्ति सीधी-सपाट न होकर मनोविश्लेषण पर आधारित है। गहराई में उतरे बिना इसे हृदयंगम नहीं किया जा सकता। हिमांशु की 'क्रौंच–वध' और 'चिरसंगिनी' इसी तरह की रचनाएँ हैं।

गहन सकारात्मक संवेदना व्यक्ति की शक्ति बन सकती है। यह तब सम्भव है, जब हम औपचारिकताओं के केंचुल को उतारकर बाहर निकलें। अधिक जिम्मेदारियाँ ओढ़कर हम सामान्य नहीं हो सकते। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को 'केंचुली' लघुकथा में-सुदर्शन रत्नाकर ने बहुत ही सहजता से अभिव्यक्त किया है। अनुशासन की घिसीपिटी जीवन-चर्या को ताक पर रखकर स्कूल से लौटे बच्चों से मस्ती। सोसाइटी की हम उम्र महिलाओं के साथ गप-शप लगाना। पार्क में घूमी, एक साथ बैठकर रात का खाना खाया। मुक्त मन से सब काम किए, तो गहरी नींद आई। यही मुक्तभाव जीवन का सुख और सौन्दर्य है।

जीवन अनेक विषमताओं से भरा हुआ है। हम उन विषमताओं में स्वय को कितना 'सम' कितना सकारात्मक बनाए रखते हैं, इसी पर सब आश्रित है। जब व्यक्ति अकेला होता है, तो वह खुद से ही संघर्ष करता रहता है। उसका अन्तर्द्वन्द्व उसे बेचैन किए रता है। अकेलेपन के कवच को तोड़कर किसी व्यक्ति से जुड़ना, भले ही औपचारिक हो, शक्ति को रिजेनेरेट करना है, स्वयं को ऊर्जस्वित करना है। डॉ. सुषमा गुप्ता ने इस मनोवैज्ञानिक सत्य को अपनी लघुकथा 'एक दिन...' में सम्प्रेषित किया है।

जाने क्या सोचकर उसने बरसों बाद मैसेज भेजा-"तुम्हारे देश में लोग मर रहे हैं।"

मुझे कुछ समय लगा यह समझने में कि मैसेज किसका है, फिर याद आया कि मैंने उसको स्विट्ज़रलैंड की ट्रेन में देखा था आखिरी बार।

मैंने रिप्लाई किया-"तुम्हारे देश के भी।"

सन्देशों से बात आगे बढ़ती है, तो एक साथ कॉफी पीना तय होता है।

जीवन जब बहुत सारे अवरोधों और संकटों के बीच पिस रहा होता है, तब भी आशा की एक किरण बची रहती है। लेखिका ने यह तथ्य लघुकथा में इस रूप में अभिव्यक्त किया है-'ज़िंदगी सहूलियतों के सहारे नहीं कटती। ज़िंदगी उम्मीद से कटती है। एक ऐसी उम्मीद, एक ऐसी जिजीविषा जो शरीर में जिंदगी भरती हो। हालात बुरे होंगे, बहुत बुरे होंगे, पर याद रखना, तुम्हारे अंदर की उम्मीद बची रहे सदा।'

जीवन में आशा बची रहे, मन के भीतर जिजीविषा रहे, तो एक दिन मन का भी आएगा। '

'मन का एक दिन' यही शक्ति का स्रोत है।

अपनी इस लघुकथा की मूल संवेदना के विषय में डॉ. सुषमा गुप्ता का कहना है-' अतीत पलटकर देखने पर दिखता तो है; पर कोई भी जख़्म आखिर पलटकर कब तक देखा जा सकता है! जीवन में बहुत बार महसूस होता है कि हम अकेले रह गए हैं, पर अकेला कौन नहीं है! किसी के सहारे से यूँ भी जिंदगी न कटती है, न आगे बढ़ती है। जीवन सिर्फ अपनी हिम्मत और अपनी जिजीविषा के बल पर ही आगे बढ़ता है और यही जीवन का अर्थ भी है और सार्थकता भी।

कथ्य और शैली का वैविध्य किसी भी विधा के लिए प्रतिष्ठा की विषय है। आज के दिन तक बहुत से लेखक नवीन से नवीनतम विषयों के संधान में लगे हुए हैं। लघुकथा-शिल्प के लिए बहुत से सफल और असफल प्रयास हुए हैं। हिन्दी लघुकथा-जगत् में सुकेश साहनी एक ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने 1989 से आज तक (35 वर्षों में) 'गोश्त की गन्ध' से लेकर 'चिड़िया' लघुकथा तक सर्वाधिक नवीन प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग किसी दिखावे या मनबहलाव के लिए नहीं रहे। इस तरह की लघुकथाओं को सतही अध्ययन करने वाले नहीं समझ सकते। न समझने का कारण है, पाठक का स्वयं को शब्दकोशीय अर्थ तक ही सीमित कर देना। भाषा के लाक्षणिक और व्यंजक रूप को भी समझना अनिवार्य है। इसको समझे बिना, अच्छी लघुकथा का सर्जन सम्भव नहीं। घिसे-पिटे विषयों को ठोक-पीटकर, सपाटबयानी से बोझिल लघुकथाओं का रोज़ ढेर लगता जा रहा है। कोई लेखक रुष्ट न हो जाए, इस डर से 'वाह-वाह' कर दी जाती है। नए-पुराने सभी लेखकों के लिए यह प्रवृत्ति घातक है। बर्रे के छत्ते में कोई ढेला नहीं मार सकता है। आत्ममुग्ध रचनाकारों के लेखन पर ईमानदारी से टिप्पणी करने वाले भी इसलिए चुप्पी लगा जाते हैं।

विषयवस्तु और शिल्प की नवीनता दृष्टि से सुकेश साहनी-साहनी की लघुकथा 'कोलाज़' पर विचार करना आवश्यक है। नारी के लिए जनमानस में किस प्रकार का चिन्तन पल्ल्वित हो रहा है, इसके लिए अलग-अलग स्थानों की अलग-अलग सूचनाओं और प्रतिक्रियाओं को सँजोया गया है। यहाँ सूचना और प्रतिक्रियाओं को मिलाकर कथा का ताना-बाना तैयार किया गया है। क्या इस तरह की अलग-अलग सूचनाएँ और प्रतिकियाएँ लघुकथा बन सकती हैं? उत्तर होगा-'हाँ"। पहिए के अरे (स्पोक्स) और धुरी को समझना होगा। धुरी एक है, अर्थात् एक ही केन्द्रीय विषय है। सारी सूचनाएँ और मन्तव्य एक ही धुरी पर यानी' नारी की स्थिति'पर, स्पोक्स की तरह केन्द्रित हैं। अरे छोटे-बड़े या किसी भी तरह से अलग आकार के नहीं हो सकते। आकारगत साम्य के कारण ही वे सब धुरी से जुड़कर पहिए को गतिशील बनाते हैं। सब मिलकर एक ही रूपाकार की सृष्टि करते हैं। इतना जान लेने पर' कोलाज़'लघुकथा को सही रूप में ग्रहण किया जा सकता है।' कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा' मिलाकर ऐसी लघुकथा नहीं रची जा सकती।

शैली विशेष की घोषणा होते ही, उसे समझे बिना ही कुछ लोगों में लघुकथा उगलने की होड़ लग जाती है। यह मारामारी किसी सुष्ठु रचना के लिए सही लक्षण नहीं। इस फर्राटा दौड़ में आगे निकलने की होड़ में अधिकतर लेखक अपनी अधकचरी रचना के साथ मुँह के बल गिरते हैं। लघुकथा को अनुभव और संवेदना की चाशनी में मद्धिम आँच पर पकाने की आवश्यकता है।

'बीसवाँ कोड़ा' हरभगवान चावला की लघुकथा में कोड़े को भावपरक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। इसी के साथ कोड़ा मारने वाले का मनोविज्ञान भी समझना होगा। नाबालिग राजकुमार अपने पालतू सफ़ेद कबूतर का पीछा करते हुए छोटी रानी के महल में दाख़िल हो गया। उस समय रानी वस्त्र बदल रही थी। राजकुमार, ऊपर से नाबालिग! न्याया का दिखावा करने के लिए प्रतीकात्मक दण्ड तो दिया ही जाएगा। राजकुमार जैसा रुई का पुतला बनाकर उस पुतले को बीस कोड़ों की सज़ा सुनाई गई। कोड़े पड़ते गए, राजकुमार ख़ामोश बना रहा। बीसवाँ कोड़ा पुतले पर पड़ते ही राजकुमार की चीख निकल गई।

सब हैरान, 'राजकुमार की पीठ पर एक धारी थी, जिसमें से लहू रिस रहा था।' लहू रिसने का कारण जब पूछा गया, तो कोड़ा मारने वाला सिपाही वज़ीर से भयभीत नहीं हुआ। आँखों में आँखें डालकर बात केवल निर्भीक व्यक्ति ही कर सकता है। सिपाही का उत्तर चौंकाने वाला था, "मेरी राजधानी में युवाओं को बैल की जगह कोल्हू में जोता जाता है और जब कोई युवा कोल्हू को खींचते हुए बेदम होकर साँस लेने के लिए रुकता है, तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं। कोल्हू में जुतने वाले युवाओं में एक मेरा भी बेटा है। वह रोज़ शाम को जब घर आता है, तो उसकी पीठ पर मैं धारियाँ देखता हूँ, जिनमें से लहू रिस रहा होता है। आज जब मैंने राजकुमार के पुतले पर कोड़े बरसाए, तो बरबस मुझे अपने बेटे की पीठ याद आ गई थी।"

लेखक ने लहू रिसने की गहन कल्पना से लघुकथा को मार्मिक एवं सम्प्रेष्य बना दिया है। इस तरह की मार्मिक एवं सशक्त रचनाएँ गहन अनुभूति और सशक्त भाषा की माँग करती हैं, जिसका चावला जी ने बखूबी निर्वाह किया है।

‌‌ लघुकथा-जगत् में नए लेखक निरन्तर जुड़ते जा रहे हैं और अपने सशक्त रचनाकर्म से चमत्कृत भी कर रहे हैं। स्थापित लेखकों का दायित्व है कि इनको उपयुक्त अवसर, मार्गदर्शन और स्थान दें, ताकि लघुकथा और अधिक प्रखरता से साहित्यिक ऊँचाई को स्पर्श कर सके। हड़बड़ाहट में कुछ भी लिख देना न लघुकथा है, न लघुकथा का शॉर्टकट। इस प्रवृति से बचना चाहिए। रचना अच्छी है या नहीं, उसे आने वाला समय निर्धारित करता है।

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