लाश की तरह ठंडा और मौत की तरह शांत / पंकज सुबीर

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(बात तब की है जब उस सूबे के किसानों ने अचानक ही आत्म हत्या करना शुरू कर दी थी और सूबे के शासक ने किसानों की आत्म हत्या को रोकने के लिये कुछ करने की ठानी। इस कुछ करने के लिये सबसे बेहतर उपाय शासक को ये नज़र आया कि अपने गृह गाँव में एक भव्य राम कथा का आयोजन किया जाये। शासक का ये सोचना था कि भव्य राम कथा करवाने से अच्छी बरसात होगी, अच्छी बरसात होगी तो अच्छी फ़सल होगी और अच्छी फ़सल होगी तो किसानों की आत्म हत्याएँ अपने आप ही रुक जाएँगी।)

कट टू राम कथा

आलीशान तथा भव्य कथा पंडाल, जिसको बनवाने के लिये मुम्बई में फ़िल्मों का सेट बनाने वाले कलाकारों को विशेष रूप से बुलाया गया था। सेट की लागत को लेकर अलग-अलग मत थे। लोक निर्माण विभाग का कहना था कि सेट की लागत पांच करोड़ आई है, जबकि ग्रामीण यांत्रिकी विभाग का कहना था कि लागत किसी भी सूरत में सात करोड़ से कम नहीं है। दरअसल में ये पंडाल, अंदर से पंडाल से ज़्यादा कोई राजमहल नज़र आता था, जिसमें मंच पर नक़्क़ाशीदार खम्बे लगे थे और भव्य कलाकृतियाँ लगाईं गईं थीं। मंच के बारे में ये कहा जा सकता है कि ये एक प्रकार का फ़्यूज़न मंच था। जिसमें किसी ज़िल्ले इलाही टाइप के शहंशाह के भव्य दरबारे ख़ास में अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर के माडल का फ़्यूज़न किया गया था। कुल मिलाकर बात ये कि आत्महत्या करने वाले किसानों को रोकने के लिये की जा रही इस पाँच सितारा राम कथा में सब कुछ पाँच सितारा था। पाँच सितारा कथा वाचक, पाँच सितारा पंडाल, पाँच सितारा श्रोता और पाँच सितारा आयोजक (जजमान) ।

शासक का ये गृह गाँव, ज़िला मुख्यालय से क़रीब सौ किलोमीटर की दूरी पर था। चूँकि दूरी ज़्यादा थी इसलिये ज़िला मुख्यालय के सारे अधिकारियों का अस्थाई पड़ाव कथा के तीन चार दिन पहले से ही गृह गाँव हो चुका था। इसलिये भी क्योंकि कथा पंडाल के ठीक बाहर एक भव्य विकास मेला तथा प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया था। इस प्रदर्शनी में वर्तमान शासक के कुशल नेतृत्व में हुए प्रदेश के विकास की झलक प्रस्तुत की गई थी। इस प्रदर्शनी का कुल मिलाकर अर्थ ये निकल रहा था कि पूरा सूबा विकास से लहलहा रहा है, गहगहा रहा है, महमहा रहा है। हर तरफ़ ख़ुशहाली, ज़मीन को फाड़-फाड़ के हीट (निकल) रही है। किसान 'मेरे प्रदेश की धरती सोना उगले-उगले हीरे मोती' गीत गाता हुआ ट्रेक्टरों में अपनी सजी धजी पत्नियों के साथ हर्षित होकर घुमड़ाता फिर रहा है। हस्पतालों में संतों टाइप के डॉक्टर परोपकार में जुटे हैं और स्कूलों में चाणक्य टाइप के मास्टर भविष्य के चंद्रगुप्तों को तराशने में लगे हैं। लगभग राममंदिर जैसे पंडाल में चल रही रामकथा के ठीक बाहर चल रही इस प्रदर्शनी का कहना था कि फिलहाल इस सूबे में लगभग रामराज्य वाले हालात हैं।

बात तब की है जब रामकथा में कथा वाचक अयोध्या में दशरथ के राज्य का प्रसंग सुना रहे थे कि दशरथ का राज किस प्रकार प्रजा मूलक है। कथा वाचक की विशेषता ये थी कि वे एक-एक शब्द के दस-दस पर्यायवाची सुनाते थे और श्रोता रस विभोर हो जाते थे। इसी बीच वे दशरथ के राज्य का एक दो बार सूबे के वर्तमान राज के साथ साम्य भी स्थापित कर चुके थे। जिस पर मंत्री गणों, अधिकारियों तथा कर्मचारियों ने हर्षित होकर तुमुल करतल ध्वनि की थी। बात ठीक इसी दिन की है।

कट टू ज़िला मुख्यालय

जिला मुख्यालय के सारे सरकारी कार्यालय केवल ताला लगाने की औपचरिकता को छोड़ दें, तो बंद ही पड़े थे। पुलिस थानों में एकाध सिपाही को एफआइआर लिखने की औपचारिकता पूरा करने के लिये छोड़ दिया गया था। बाक़ी, पुलिस कप्तान से लेकर सारा दल सौ किलोमीटर दूर गृह गाँव में था। होना भी था, इतने सारे ज़ेड प्लस जो आ रहे थे। इस प्रकार कहा जाये तो फिलहाल राम कथा के चलने तक ज़िला मुख्यालय को रामभरोसे छोड़ दिया गया था। ये बात ठीक उसी दूसरे दिन की है जब वहाँ से सौ किलोमीटर दूर कथा वाचक दशरथ के राम राज्य के बारे में विस्तार से चर्चा कर रहे थे।

कुछ लोगों का ऐसा कहना है कि प्रशांत तो पहले से ही बिगड़ा हुआ लड़का था। इतना कि कक्षा दस तक आने तक ही सर्व गुण संपन्न हो चुका था। लोगों का कहना था कि प्रथम श्रेणी अधिकारी पद से रिटायर हुए दादा के इकलौते बेटे का इकलौता बेटा था, सो बिगड़ने के सारे अधिकार तो उसके पास सुरक्षित थे ही। ख़ैर ये बातें बाद में, पहले तो ये कि उधर सौ किलोमीटर दूर राम कथा चल रही थी और इधर रामभरोसे छोड़े गये शहर में कुछ हो गया। हुआ ये कि प्रशांत का बाक़ायदा अपहरण कर लिया गया। वैसे तो प्रशांत दिन भर कहाँ रहता है, घर वालों को ज़रा भी पता नहीं रहता था। लेकिन उस रोज़ शाम ढलते ही प्रशांत की ढूँड़ मच गई। इस ढूँड़ मचने के पीछे कारण था, वह कॉल जो प्रशांत के ही मोबाइल से प्रशांत के पिता के पास आई थी। जिसमें कहा गया था कि प्रशांत का अपहरण कर लिया गया है और चालीस लाख फिरौती के बदले उस छोड़ा जायेगा। जब ढूँड़ मची तो पता चला कि प्रशांत की साइकिल एक बगीचे में खड़ी है, जहाँ से लोगों ने उसे एक मोटरसाइकिल पर किसी आदमी के साथ जाते हुए देखा था। सूचना मिलते ही ये ढूँड़ एक प्रकार के हड़कम्प में बदल गई।

पुलिस थाना राम कथा के प्रताप से शांत पड़ा हुआ था। जब तीन चार उपलब्ध हेड साहबों ने भीड़ को आते देखा तो घबरा गये। एफआइआर लिखने के लिये वे छोड़े गये थे, सो उन्होंने लिख ली, उससे ज़्यादा करना उनके बूते के बाहर था। इसके बाद का काम अधिकारियों को करना था, जो फिलहाल थे नहीं। दो हेड साहबों को थाने में छोड़कर बाक़ी के दो में से एक साइकिल प्राप्ति स्थल और एक प्रशांत के घर रवाना हो गया। तीनों स्थानों पर काग़ज़ों का पेट भरना प्रारंभ कर दिया गया। प्रशांत के परिजन बेचैनी की हालत में थाने से सिटी कोतवाली और वहाँ से पुलिस कप्तान के घर तक दौड़ लगा रहे थे। हर जगह उनको ढाक के तीन पत्ते ही मिल रहे थे। रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। प्रशांत का मोबाइल अब स्विच्ड ऑफ आ रहा था। लेकिन परिवार वालों ने अपने स्तर पर भागदौड़ करके ये पता लगा लिया था कि प्रशांत के मोबाइल से जो कॉल किया गया था वह राजधानी से किया गया था। अर्थात प्रशांत को अपहरण करके ज़िला मुख्यालय से घंटे भर की दूरी पर स्थित सूबे की राजधानी ले जाया गया था।

कट टू राम कथा

रात के नौ बज रहे थे। कथा वाचक अपन मधुर वाणी में बता रहे थे कि किस प्रकार अयोध्या में चारों तरफ़ सुख, शांति और समृद्धि फैली हुई है। एक बार बात को घुमा कर उन्होंने कहा कि 'बहुत सौभाग्यशाली होती है वह प्रजा, जिसका शासक, जिसका राजा, जिसका प्रजा पालक, जिसका प्रधान संवेदनशील होता है और यदि इसको सच मानें तो इस पंडाल में बैठे आप सब भी सौभाग्यशाली हैं।' सारा माहौल गदगदायमान हो गया। एक बार फिर से तुमुल हर्ष ध्वनि हुई। इतनी कि प्रवचन को आधा मिनिट तक रोकना पड़ा। 'और जहाँ का राजा संवेदनशील होता है वहाँ के मंत्री और अधिकारी भी उतने ही संवेदनशील होते हैं, यह बात मैंने यहाँ आपके ही प्रदेश में आकर जानी है।' पुनः तुमुल करतल ध्वनि।

'सर यहाँ लोग हंगामा कर रहे हैं।' यह सूचना एक हैड साहब ने अपने से ठीक ऊपर वाले सब इंस्पेक्टर के मोबाइल पर उपलब्ध करवा दी। सूचना स्टेप बाय स्टेप होती हुई पुलिस कप्तान तक पहुँच गई। पुलिस कप्तान स्वयं पंडाल के व्ही।आइ.पी गेट पर खड़े सारी व्यवस्थाएँ देख रहे थे। इसी गेट से होकर कुछ देर बाद दिल्ली से विशेष रूप से आ रहे व्ही।व्ही।आई.पी. को गुज़रना था। जो आज की कथा के पश्चात होने वाली आरती में शामिल होने के लिये विशेष रूप से आ रहे थे। उनके पास ज़ेड के साथ लगे हुए ढेर सारे प्लसों की सुरक्षा थी। जैसे ही हंगामे की सूचना पुलिस कप्तान तक पहुँची वे कुछ देर तक सोचते रहे, फिर सूचना लाने वाले से बोले 'कोतवाली को सूचना कर दो कि जैसे तैसे करके दो-तीन घंटे तक बात को सँभाल लें। साढ़े दस बजे तक आरती ख़त्म हो जायेगी और ग्यारह बजे तक व्ही।आइ.पी वापस रवाना हो जाएँगे। उसके बाद तुरंत यहाँ से एक टीम को वहाँ भेज दिया जायेगा। लेकिन अभी तुरंत कोई नहीं जा सकता।' कोतवाली में बैठे भीड़ को सँभाल रहे हेड कांस्टेबल रामभरोसे यादव को सूचना दे दी गई। सूचना पुलिस कप्तान की थी इसलिये रामभरोसे के पास 'जी श्रीमान जी' कहने के अलावा कोई चारा नहीं था।

कट टू ग्राम तिलखिरिया

राजधानी से रामकथा वाले गाँव को जाने वाली सड़क पर राजधानी से क़रीब बीस किलोमीटर पर स्थित ग्राम तिलखिरिया। सड़क से पाँच छः सौ मीटर अंदर, अंधेरे में डूबे हुए खेत की मेड़ पर तीन साये बैठे नज़र आ रहे हैं। दो बड़े साये और एक छोटा साया। पास ही एक मोटर साइकिल, साइड स्टैंड पर टिकी, आधी झुकी खड़ी है। सड़क पाँच छाः सौ मीटर दूर है इसलिये आती जाती गाड़ियों की बस हेड लाइटें ही यहाँ से दिख रहीं हैं। दो बड़े वाले साये रह-रह कर कुछ पी रहे हैं और बीच-बीच में मोबाइल पर बातें भी करते जा रहे हैं।

'अच्छा! पुलिस वहीं है? कितने पुलिस वाले हैं?'

'घर के लोग क्या कर रहे हैं? अच्छा? सारे वहीं हैं कि कुछ इधर उधर भी हैं?'

'ये कैसे पता लगा कि मोबाइल यहाँ आकर किया था?'

'यहाँ की पुलिस को भी ख़बर हुई है क्या?'

इसी प्रकार की फुसफुसाहट भरी बातें हो रहीं हैं।

मोबाइल पर कॉल डिस्कनेक्ट करके एक बड़े साये ने एक भद्दी-सी गाली बक कर बैठे-बैठे ही छोटे वाले साये में लात मारी। छोटा साया लात पड़ते ही ज़मीन पर आड़ा हो गया। कोई चीख नहीं निकली। मानो मुँह में कपड़ा ठूँसा गया हो। बस गूँ-गाँ की आवाज़ आकर रह गई। दोनों बड़े साये फिर चुपचाप कुछ पीने लगे। एक साये के हाथ के मोबाइल ने वाइब्रेट होकर फिर से घर्र-घर्र की।

'हाँ बता। कब ख़बर की?'

'यहाँ लेकर आये हैं ये पता कैसे चला?'

'हाँ फ़ोन तो इस लौंडे के मोबाइल से ही किया था।'

'कौन-सा टॉवर पकड़ाया है? हाँ फ़ोन तो उसी इलाक़े से किया था।'

'नहीं अभी तो वहाँ से बहुत दूर हैं।'

जैसी कुछ बातें हुईं और फिर से शांति छा गई। एक ने सिगरेट सुलगाने के लिये माचिस की तीली जलाई ही थी कि दूर से पुलिस की गाड़ी का सायरन गूँजा। दोनों सतर्क हो गये। सायरन धीरे-धीरे पास आ रहा था। दोनों उठकर मोटरसायकल को सीधी करने लगे। सायरन की आवाज़ के साथ दूर से लाल बत्ती लगी हुईं गाड़ियाँ भी उस सड़क पर दिखाई देने लगीं। क़रीब बीस पच्चीस लाल, पीली, नीली बत्ती लगी हुई गाड़ियाँ थीं। ये गाड़ियाँ वहाँ दूर सड़क से निकल रहीं थीं। ये दिल्ली से आये उन्हीं व्ही।व्ही।आईपी का क़ाफ़िला था, जो रामकथा सुनने जा रहे थे। इधर दोनों साये मोटरसाइकल को चालू करके उस पर बैठ चुके थे। उधर पूरा क़ाफ़िला बात की बात में धड़धड़ाता हुआ गुज़र गया। अब केवल सायरन की दूर से आती आवाज़ थी जो धीरे-धीरे मद्धम होती जा रही थी। मोटर साइकल पर पीछे बैठा बड़ा साया तेज़ी के साथ उतरा और गालियाँ बकता हुआ उस तरफ़ लपका जहाँ लात खाकर छोटा साया आड़ा पड़ा था।

कट टू राम कथा

पंडाल में बड़ा ही दिव्य वातावरण निर्मित था। कथा वाचक राम जन्म का प्रसंग कथा में शामिल कर चुके थे। देश के दिव्यतम साउंड सिस्टम से होकर उनकी आवाज़ भी दिव्य रूप धरकर पंडाल में गूँज रही थी। इसीलिये तो वे सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी साउंड सिस्टम पर भरोसा करते थे। जब उन्होंने राम जनम का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि 'वह प्रभु, भगवान, ईश्वर, परमात्मा, पालनहार, जगतपति, अन्याय और अत्याचार को समाप्त करने के लिये स्वयं अवतार लेता है। उसके आते ही हर तरफ़ आनंद की, प्रेम की, करुणा की, रस वर्षा होने लगती है। वैसी ही जैसी इस पंडाल में और आपके प्रदेश में हो रही है।' इसके साथ ही कथा वाचक के साथ संगत दे रहे संगीतकारों ने अपने इलेक्ट्रानिक वाद्य यंत्रों पर शंख, घड़ियाल और झाँझ की आवाज़ फुल वाल्यूम में निकाल कर उस प्रकार का वातावरण बना दिया जिसमें श्रद्धालुओं की रोमावलियाँ खड़ी हो गईं। आँखों से आँसू वग़ैरह हीट (निकल) पड़े। एक युवा टाइप के मंत्री तो वातावरण से इतने अभिभूत हो गये कि अपने स्थान पर खड़े होकर नृत्य करने लगे। कथा वाचक के साथ सुर में सुर मिला कर अब पूरा पंडाल गा रहा था 'भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौशल्या हितकारी' और इसी बीच व्ही।व्ही।आई.पी. ने उस दिव्य पंडाल में प्रवेश किया।

कट टू ग्राम तिलखिरिया

बड़ा साया ज़मीन पर पड़े छोटे साये पर टूट पड़ा था। अँधेरा बहुत गहरा था। बड़ा साया लगातार गालियाँ बक रहा था और छोटा साया मुँह से गूँ-गाँ की आवाज़ निकाल रहा था। दूसरा बड़ा साया उसी प्रकार मोटर सायकल पर बैठा सिगरेट फूँक रहा था। कुछ देर में छोटे साये के पास गया बड़ा साया आकर मोटर साइकिल के पास ज़मीन पर बैठ गया।

'मार दिया क्या?' मोटर साइकिल पर बैठे साये ने फुसफुसाहट के अंदाज़ में पूछा।

'नहीं...' नीचे बैठे साये ने उत्तर दिया।

'फिर?'

नीचे बैठे साये ने कुछ उत्तर नहीं दिया। घुटने मोड़ कर, मोटर साइकिल के अगले टायर से पीठ टिका कर उसी प्रकार बैठा रहा। मोटर साइकिल पर बैठे साये का मोबाइल वाइब्रेट हुआ।

'हाँ बोल ...'

'नहीं हम लोग वहाँ नहीं हैं।'

'कितने पुलिस वाले हैं।'

'कौन कौन से चैनल पर चल रहा है?'

'अंदाज़ा क्या लगा रहे हैं?'

'नहीं अब तो कोई मतलब नहीं है, देखते हैं क्या करना है।' कहते हुए उस साये ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया। कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

'ख़ूब हंगामा हो रहा है वहाँ पर।' मोटर साइकिल पर बैठे साये ने सूचना देने वाले अंदाज़ में धीरे से कहा। नीचे बैठे वाले ने कोई उत्तर नहीं दिया। मोटर साइकिल पर बैठा साया नीचे उतरा और छोटे साये वाली दिशा में तेज़-तेज़ क़दमों से बढ़ गया। नीचे बैठा साया मोबाइल से कोई नंबर लगाने लगा।

'क्या करें अब इसका?'

'पहचानता तो है।'

'नहीं वहाँ ले जाने में तो रिस्क है।'

'देखते हैं।' कहते हुए उसने कॉल काट दिया।

थोड़ी देर बाद छोटे साये के पास गया दूसरा साया भी आकर वहीं नीचे ज़मीन पर बैठ गया। दोनों खुसफुसाहट के अंदाज़ में कुछ बातें करने लगे। कुछ देर तक बात करते रहे फिर पास ही पड़ा एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर दोनों छोटे साये वाली दिशा में बढ़ गये।

दोनों अब छोटे साये के ठीक सिर पर खड़े थे। छोटा साया ज़मीन पर उल्टा पड़ा था। जिस साये ने हाथों में पत्थर उठा रखा था उसने पत्थर को दोनों हाथों से अपने सिर से ऊपर हवा में तान लिया ।

कट टू राम कथा

'पूँ ऽऽऽऽऽऽ' लगभग पच्चीस शंख वादक एक साथ अपने फेफड़ों में भरी हवा को शंख में पूरी ताक़त लगाकर फूँक रहे थे। शंख ध्वनि से पूरा पंडाल गूँज रहा था। शंखध्वनि के बीच एक अत्यंत सजी धजी महिला अपनी गोदी में एक छोटे से बच्चे को लिये नैपथ्य से मंच पर आई। उसके मंच पर आते ही पंडाल में बैठे श्रद्धालू अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर तालियाँ पीटने लगे। पूरा पंडाल आध्यात्म से गजगजा रहा था। कथा वाचक ने दोनों हाथों को उठाकर सबको शांत रहने का इशारा किया। जब सब शांत हो गये तो कथा वाचक ने अपने उसी मधुर स्वर में जो कि विशेष कंपनी के साउंड सिस्टम के साथ मिलकर मधुरतम हो जाता था, स्तुति प्रारंभ की।

'श्री रामचंद्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणम'

पहले पंक्ति को कथा वाचक गाते थे और फिर उसी पंक्ति को पूरा पंडाल दोहराता था।

'रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथ नंदनं'

कट टू ग्राम तिलखिरिया

खेत की मेड़ अब पूरी तरह से शांत थी। अब वहाँ केवल छोटा साया था, उसी प्रकार से उल्टा लेटा हुआ। दोनों बड़े साये वहाँ से जा चुके थे।

कट टू ज़िला मुख्यालय

रात गहरा रही थी और शहर धीरे-धीरे आक्रोशित हो रहा था। लोग पुलिस के उन तीन चार हेड साहबों पर निशाना साध रहे थे। हेड साहब पसीना पोंछते हुए रह-रह कर अपने मोबाइल से कोने में जाकर कुछ बात कर आते थे। फिर लौट कर कभी काग़ज़ों में कुछ दर्ज़ करके, कभी लड़के के परिवार से पूछताछ करके समय को काटने का प्रयास कर रहे थे। समय को काटना ज़रूरी था, क्योंकि उधर जब तक राम जन्म करवाने के लिये आये व्ही।व्ही।आई.पी. लौटते नहीं, तब तक वहाँ से पुलिस बल का चलना संभव नहीं था।

कट टू ग्राम तिलखिरिया

सुब्ह होते ही एक किसान ने सबसे पहले लाश को देखा। लाश जो खेत की मेड़ पर उल्टी पड़ी हुई थी। उसका सिर पत्थर से बुरी तरह से कुचल दिया गया था और दोनों हथेलियों को कलाई के पास से किसी धारदार हथियार से काट दिया गया था। किसान ने जब ये देखा तो चीखता हुआ उल्टे पैरों भागा। घंटे भर में पुलिस की गाड़ियाँ धड़धड़ाते हुए खेत की मेड़ पर आ लगीं। मरने वाले का चेहरा इतनी बुरी तरह से कुचला गया था कि किसी भी तरह से पहचानना संभव नहीं हो रहा था। पुलिस ने लाश को जब्ती में लिया और जिस प्रकार सायरन बजाती हुई आई थी उसी प्रकार लौट गई।

कट टू ज़िला मुख्यालय

दोपहर तक सूचना आई कि राजधानी के पास के गाँव तिलखिरिया में एक लाश मिली है जो किसी सोलह सत्रह साल के लड़के की है। देर रात प्रशांत के घरवाले कपड़ों से पहचान करके उसका शव लेकर वापस लौट आये। एक बार तसल्ली करने के लिये कपड़ों में मिली साइकिल की चाबी को प्रशांत की साइकिल के ताले में लगाया गया। ताला क्लिक की आवाज़ के साथ खुल गया। ताले के खुलने के साथ ही शहर भर में आक्रोश की लहर दौड़ गई। प्रशांत के घर मातम छा गया।

कट टू राम कथा

आज राम कथा में एक बार फिर से विभोर कर देने वाला वातावरण बना हुआ था। दशरथ के आँगन में ठुमक कर चलते राम का अत्यंत भावुक चित्रण हो रहा था। 'ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनिया' भजन कथावाचक पूरी तल्लीनता के साथ गा रहे थे और सुन-सुन कर रस विभोर हो रहे थे वहाँ उपस्थित श्रद्धालु। आज कथा में ज़िला मुख्यालय का पुलिस बल उतनी संख्या में नहीं था। प्रशांत की हत्या को लेकर ज़िला मुख्यालय पर तनाव है इस बात को देखते हुए आइजी ने पुलिस कप्तान को वहीं रुकने के निर्देश दिये थे।

'विद्रु मसे अरुण अधर, बोलत मुख मधुर मधुर' कथा वाचक की मधुर स्वर लहरी पूरे पंडाल में रस घोलती हुई बह रही थी। आज की कथा पूरी तरह से राम की बाल लीलाओं पर आधारित थी।

'राम का जन्म यूँ ही नहीं हो जाता। उसके लिये दशरथ और कौशल्या जैसे प्रजा पालकों को जन्म लेना होता है। ऐसे गुणी और जन-जन के कल्याण की भावना को मन में रखने वाले राजा के घर ही राम का जन्म होता है। अयोध्या एक प्रतीक है, प्रतीक इस बात का कि भयमुक्त समाज, अत्याचारमुक्त शासन और पक्षपात रहित व्यवस्था जहाँ होगी उसे अयोध्या कहा जायेगा और राम का आगमन वहीं होगा जहाँ अयोध्या होगी।' इतना कह कर कथा वाचक कुछ देर रुके, रहस्य से मुस्कुराये और अपनी उसी किंचित मुस्कुराहट वाली शैली में बोले 'और यदि इसे ही सच माना जाये तो अब यदि राम को जन्म लेना हो तो उसके लिये उन्हें आपके इसी राज्य में आना होगा।' इतना कह कर वे फिर रुक गये। श्रद्धालुओं को बात समझने में दस सेकेंड का वक़्फ़ा लगा और दस सेकेंड बाद पूरा पंडाल जयघोष से फटा पड़ रहा था। कोने-कोने से कथा वाचक महाराज की जय-जय कार के नाद घोष हो रहे थे।

'शासक का दायित्व होता है कि वह अपनी प्रजा को एक ऐसा भयमुक्त वातावरण दे जहाँ अपराध का कोई चिह्न तक नहीं हो। वह सबसे पहले अपनी प्रजा के बारे में सोचे तथा उसी के हित में निर्णय ले। जिनके विचारोें में, संस्कारों में, व्यवहार में धर्म होता है वे हर दुविधा को लेकर धर्म की शरण में जाते हैं। धर्म के पास हर प्रश्न के उत्तर हैं, लेकिन आवश्यकता है तो बस धर्म के पास जाने की। जैसे आपके राज्य में प्रकृति की मार से कुछ किसान बंधुओं ने आत्महत्या कि तो आपके मुख्यमंत्री को भी धर्म की ही राह सूझी। ये राम कथा उसी निमित्त की जा रही है। ऐसे प्रजापालक शासक की पुकार देवताओं को भी सुननी पड़ती है और प्रकृति को भी।' सात करोड़ के पंडाल के वातानुकूलित मंच से जब कथा वाचक प्रदेश के क़र्ज़े से डूबे किसानों के बारे में बता रहे थे तो कुछ आइ.ए.एस. अधिकारी भावुक होकर अपनी आँखें पोंछ रहे थे।

कट टू ज़िला मुख्यालय

प्रशांत के अंतिम संस्कार के बाद से ही शहर में तनाव फैल गया था। अगले दिन शहर बंद करने की घोषणा कि गई थी जिसे लगभग सारे व्यापारिक संगठनों ने अपना समर्थन दिया था। इस बंद के समर्थन में रात को एक मशाल जुलूस शहर के मुख्य बाज़ारों में निकाला गया था। सारे प्रादेशिक चैनलों पर प्रशांत का समाचार रह-रह कर रिपीट हो रहा था। जुलूस को पृष्ठभूमि में रखते हुए इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टर अपनी रपट बना रहे थे 'पूरा शहर उत्तेजित है, जिस प्रकार से शहर के एक होनहार बालक को दिन दहाड़े अगवा किया गया और जिस प्रकार उसकी नृशंस हत्या कि गई उससे लोग आक्रोशित हैं। पुलिस कोई उत्तर नहीं दे रही है। जिस प्रकार से प्रदेश की राजधानी से मात्र बीस किलोमीटर दूर सर कुचल कर और हाथ काट कर ये जघन्य हत्या कि गई है, उससे प्रदेश में पुलिस और प्रशासन की हालत का पता चल रहा है।' रिपोर्टर अपनी आवाज़ में भावुकता और आक्रोश दोनों घोलने का प्रयास कर रहे थे।

'सवाल ये उठता है कि यदि पुलिस चाहती तो ये हत्या रोक सकती थी। प्रशांत का अपहरण शाम पाँच बजे हुआ और लगभग दस बजे उसकी हत्या कि गई। इस बीच ये पता चल चुका था कि प्रशांत को अगवा करके राजधानी ले जाया गया है। यदि पुलिस एक्टिव हो जाती तो शायद प्रशांत बच जाता। लेकिन पुलिस तो तब एक्टिव होती जब वह यहाँ होती। पुलिस कप्तान से लेकर सारा पुलिस बल तो मुख्यमंत्री के गृह गाँव में चल रही राम कथा में व्ही।आइ.पी ड्यूटी दे रहा था।' एक दूसरा रिपोर्टर ओबी वैन के लाइव में चीख रहा था।

'पुलिस कप्तान से लेकर सारा पुलिस बल तो मुख्यमंत्री के गृह गाँव में चल रही राम कथा में व्ही।आइ.पी ड्यूटी दे रहा था।' इस एक वाक्य को सुनकर राजधानी में बैठे प्रदेश के डीजीपी अपनी कुर्सी पर पहलू बदल कर बैठ गये। इस बदले हुए पहलू की लहर वहाँ से आइजी, फिर डीआइजी और वहाँ से पुलिस कप्तान तक पहुँच गई।

अगले दिन सुबह से ही सारा शहर बंद था। बंद इस प्रकार मानो कर्फ़्यू लगा हो। देर रात राम कथा से राजधानी लौटे आइजी और डीआइजी भी सुबह से ज़िला मुख्यालय पहुँच गये थे। दस बजे शहर के नागरिकों का एक विरोध मार्च निकलना था और दोपहर दो बजे महिलाओं का एक जुलूस। पुलिस इन दोनों की तैयारियों में लगी हुई थी।

पहला जुलूस कोतवाली जाकर समाप्त हुआ। जहाँ आईजी ने ज्ञापन लेने के बाद लोगों को समझाने की एक असफल कोशिश की। जब जुलूस वापस लौट गया तो इलेक्ट्रानिक चैनलों के रिपोर्टरों ने आईजी को घेर लिया।

'ये फ़िज़ूल की बात है, भला राम कथा का इस घटना से क्या लेना देना?' एक रिपोर्टर के सवाल पर आईजी ने कुछ तीखे स्वर में उत्तर दिया और उतनी ही तीखी नज़र साथ खड़े पुलिस कप्तान पर डाली। पुलिस कप्तान की हवाइयाँ उड़ गईं।

दोहपर बाद महिलाओं का जुलूस सीधे कलेक्टर कार्यालय पहुँचा। जुलूस को देखते हुए मेन गेट बंद कर दिया गया था। गेट की सलाखों के उस तरफ़ कलेक्टर महिलाओं से ज्ञापन लेने के लिये खड़े थे। महिलाओं ने गेट के पास खड़े होकर देर तक नारेबाज़ी की। जब ज्ञापन दिया जा रहा था तो एक महिला ने ज्ञापन के साथ कुछ चूड़ियाँ भी रख दीं।

'ये किसलिये?' कलेक्टर ने कुछ मुस्कुराते हुए पूछा।

'पहनने के लिये और किसलिये? शहर से दिन दहाड़े एक बच्चे का अपहरण होता है हत्या होती है और आप सब वहाँ चैन से बैठ कर राम कथा सुनते हैं। हत्यारों को तो आप पकड़ नहीं सकते इसलिये चूड़ियाँ पहनिये और बैठे रहिये चुपचाप।' चूड़ी देने वाली महिला ने तीखे स्वर में उत्तर दिया। महिला के इतना कहते ही वहाँ आई सारी महिलाओं ने हाथों में रखी चूड़ियाँ गेट की सलाखों पर टाँगना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में पूरा गेट चूड़ियों से भर गया। महिलाएँ नारेबाज़ी करती हुई लौट रहीं थीं। एक हाथ में ज्ञापन और दूसरे में चूड़ियाँ पकड़े कलेक्टर गहरी निगाहों से उन लौटती हुई महिलाओं को देख रहे थे।

'सर सब कंट्रोल में है।' माथे का पसीना पोंछते हुए आइजी ने अपने मोबाइल पर उत्तर दिया। कलेक्टर ने अपने निवास पर शहर में चल रहे तनाव को लेकर एक विशेष और गोपनीय बैठक बुलाई थी।

'नहीं सर राम कथा को लेकर कहीं कुछ आक्रोश नहीं है वह तो...' आइजी ने कुछ कहना चाहा लेकिन उधर से बात काटी गई। आइजी चुप होकर उधर की बात सुनते रहे।

'जी सर मैं यहीं हूँ, अभी कुछ लोगों को बुलाया है, शाम तक कुछ न कुछ हल निकल आयेगा'

हर तरफ़ एक प्रकार का हड़कंप मचा हुआ था। हड़कंप इसलिये नहीं कि दिन दहाड़े एक लड़के का अपहरण हुआ और फिर अत्यंत नृशंस तरीके से उसकी हत्या कर दी गई। हड़कंप इसलिये था कि इन सब के चक्कर में मुख्यमंत्री की रामकथा बदनाम हो रही थी। हड़कंप इसलिये था कि बात घूम फिर के बार-बार वहीं आ रही थी 'पुलिस कप्तान से लेकर सारा पुलिस बल तो मुख्यमंत्री के गृह गाँव में चल रही राम कथा में व्ही।आइ.पी ड्यूटी दे रहा था।' यही एक ऐसी बात थी जिसके चलते इस हत्या और अपहरण वाले मामले में पुलिस तेज़ी के साथ सक्रिय हो रही थी, इस प्रकार मानो पूरा मामला अब सुलझा कि तब सुलझाा।

आज की ये बैठक इसीलिये बुलाई गई थी। इसीलिये, मतलब इसलिये कि इस पूरे मामले से 'राम कथा' को किस प्रकार अलग किया जाये। ऐसा क्या किया जाये कि लोगों का ग़ुस्सा शांत हो सके। बैठक में पुलिस और प्रशासन के केवल कुछ ख़ास अधिकारियों के अलावा एक नेता टाइप के समाजसेवी पत्रकार विनय उपाध्याय भी मौजूद थे। विनय उपाध्याय को इस बैठक में विशेष रूप से बुलाया गया था। पुलिस प्रशासन जब भी इस प्रकार की किसी परेशानी में उलझता था तो उससे बाहर आने के लिये विनय उपाध्याय की ही सेवाएँ ली जाती थीं। वे शहर की नस-नस से वाक़िफ़ थे। उन्हें पता होता था कि ये जो शहर के किसी ख़ास हिस्से में दर्द उठ गया है उसको शांत करने के लिये कौन कौन-सी नसों को दबाना होगा। दर्द की तासीर देख कर ही वे ये सुझाव भी देते थे कि ये जो दर्द उठा है, ये एक्यूप्रेशर से ठीक हो जायेगा या इसके लिये पुलिसिया एक्यूपंचर ही करना होगा। सलाह देकर वे परिदृश्य से हट जाते थे और बाक़ी की काम पुलिस और प्रशासन करता था। टेबल पर रखा कलेक्टर का मोबाइल वाइब्रेट हुआ, डिस्प्ले पर आ रहे नंबर को देख कर कलेक्टर एलर्ट हो गये। कॉल को कनेक्ट करके कान से लगा लिया। बात कुछ देर बाद शुरू हुई।

'जी सर, प्रणाम सर। सर उसी के लिये बैठे हैं।'

'जी सर, पता कर लिया है सर, एक दो अपोज़िशन वाले हैं, वही लोग बार-बार पब्लिक को भड़का कर मामले को उस तरफ़ मोड़ रहे हैं।'

'जी सर बस उन्हीं लोगों का कुछ उपाय निकाल रहे हैं हम।'

'जी सर आज ही हो जायेगा, प्रणाम सर।'

मोबाइल को वापस टेबल पर रखने के बाद कलेक्टर ने पास बैठे आइजी की तरफ़ देखा। आइजी ने एसपी को देखकर भवें उचकाईं, एस पी ने विनय उपाध्याय की तरफ़ देखा और गला खँखारते हुए कहा 'क्या विनय जी आपके रहते शहर में इतनी सारी फ़िज़ूल की अफ़वाहें उड़ रहीं हैं। कहीं कोई रोकने टोकने वाला ही नहीं है।'

एसपी के इतना कहते ही विनय उपाध्याय कुछ सचेत होकर अपनी कुर्सी पर रीपोज़िशन हुए। वे कुछ कहते उससे पहले ही एसपी की बात का सिरा पकड़ कर आइजी ने कहा 'बार बार रामकथा का मामला उठाया जा रहा है। आपकी तो अपनी पार्टी का मामला है, आप ही कुछ नहीं करेंगे तो कैसे काम चलेगा?' आइजी का अंदाज़ मीठा था। वही अंदाज़ जिसे ठेठ प्रशासनिक अंदाज़ कहा जाता है। जिसके द्वारा चारों तरफ़ से घिर जाने पर प्रशासनिक व्यवस्था किसी जनता के आदमी को ढाल बनाकर खड़ा करती है। जिसे मुहावरे तथा कहावत की भाषा में गधे को बाप बनाना कहा जाता है।

'नहीं होगा सर, बस कल से कुछ नहीं होगा, सारा शहर शांत हो जायेगा। भूल जाएँगे लोग कि कहीं कोई प्रशांत मरा था।' विनय उपाध्याय ने कहा।

'कल से ...?' कलेक्टर ने पूछा।

'जी सर, कल तक का समय तो लगेगा ही।' विनय उपाध्याय ने विनम्रता पूर्वक उत्तर दिया।

'कैसे?' इस बार आइजी ने पूछा।

'देखिये सर इस पूरे मामले को कुछ ऐसा रंग देना पड़ेगा कि लोग इस मामले से ख़ुद ही अपने आप को दूर कर लें।' विनय उपाध्याय ने उत्तर दिया।

'मसलन?' आइजी ने फिर पूछा।

'कुछ ऐसा कि जिसके सामने आने पर प्रशांत का अपहरण, हत्या सब कुछ पीछे रह जाए, जैसे कोई सैक्स स्केंडल।' विनय उपाध्याय ने कहा।

'सैक्स स्केंडल?' कलेक्टर ने आश्चर्य से शब्दों पर थोड़ा ज़ोर देते हुए कहा।

'जी सर, बात तो बिल्कुल सही है। हमको ये बात सुगबुगाहट के रूप में शहर भर मैं फ़ैलाना है कि प्रशांत की हत्या के पीछे बड़ा सैक्स स्केंडल है, जिसे पुलिस ने लगभग ट्रेस कर लिया है। हमें कोई आफ़िशियल स्टेटमेंट नहीं देना है, बस सुगबुगाहट के रूप में बात को फ़ैलाना है और इस प्रकार की बातें तो ख़ुद ब ख़ुद ही फैल जाती हैं।' इस बार उत्तर दिया एसपी ने। शायद सारा प्लान बैठक में आने से पहले ही तैयार कर लिया गया था।

'मगर मामला क्या उछाला जायेगा?' कलेक्टर की भौंहें अभी भी तनी हुईं थीं।

'उसके लिये कुछ ख़ास नहीं करना होगा सर, हमें केवल लोगों को डराना है, ताकि ये लोग डर कर अपने घरों में बैठ जाएँ। कुछ ऐसा कि लड़के के परिवार वाले ख़ुद ही चाहने लगें कि मामला बंद हो जाए।' एसपी ने उत्तर दिया।

'कर लेंगे आप लोग?' आइजी ने पूछा।

'जी सर हो जाएगा।' एसपी ने जवाब दिया।

'लेकिन इस तरह के एकदम सिरे से झूठे मामले को लोग एक्सेप्ट कर लेंगे? कहीं ऐसा न हो कि इससे मामला और बिगड़ जाए।' कलेक्टर ने पूछा।

'नहीं सर, मामला एकदम सिरे से झूठा भी नहीं है। दस परसेंट तो कहीं न कहीं कुछ सचाई है। हमें उस दस परसेंट को ही बढ़ा कर पेश करना है।' बहुत देर बात विनय उपाध्याय ने उत्तर दिया।

'कल तक सब कुछ शांत हो जाएगा? मैं ऊपर कह चुका हूँ।' आइजी ने फिर पूछा।

'हो जाएगा सर, आज रात तक ही काफ़ी कुछ ठंडा हो जाएगा।' एसपी ने कुछ लापरवाही के अंदाज़ में कहा।

'तो ठीक है, अब ये आपकी जवाबदारी है, मुझे ये बात अलग से कहने की ज़रूरत नहीं है कि मामला गंभीर है।' आइजी ने दोनों हाथ टेबल पर रखते हुए कहा और उठ कर खड़े हो गये।

कुछ ही देर बाद विनय उपाध्याय शहर के बीचों बीच स्थित सबसे ज़्यादा चलने वाली पान की दुकान पर अपने तयशुदा स्टूल पर बैठे थे। भाव भंगिमा गंभीर थी। एक अगरबत्ती की काड़ी से दांत कुरेदते हुए शून्य में ताक रहे थे।

'क्या बात है विनय भैया? आज तबीयत कुछ ठीक नहीं है क्या।' पान वाले ने पान बढ़ाते हुए पूछा।

'हमारी तो ठीक है मोहन, लेकिन लगता है अपने इस शहर की तबीयत अब ठीक नहीं है।' पान हाथ में लेते हुए उत्तर दिया विनय उपाध्याय ने।

'हाँ विनय भैया सो तो है। दिन दहाड़े लौंडे को उठा ले गये और फिर इत्ती बुरी तरह से मार डाला, च-च च।' मोहन ने बात का समर्थन किया।

'वो बात तो अपनी जगह है मोहन, लेकिन अब जो मामले का सुराग लग रहा है, वह तो बहुत गंदा है।' विनय उपाध्याय ने पान को एक तरफ़ के गाल में दबाते हुए कहा।

'क्या सुराग़ लग रहा है?' मोहन ने पान पर कत्था लगाते हाथ को रोक कर पूछा। दुकान पर बैठे बाक़ी के लोग भी इस तरफ़ मुख़ातिब हो गये।

'अब क्या बोलें मोहन अपने ही शहर का मामला है। बोलते में भी बुरा लगता है। जब पुलिस ने लड़के के परिवार वालों के सारे मोबाइलों की कॉल डिटेल्स निकलवाई तो एक मोबाइल से एक ख़ास नंबर पर लम्बी-लम्बी कॉल्स मिली हैं। जब उस नंबर को ट्रेस किया गया तो वह घनश्याम का निकला।' विनय उपाध्याय पान को चुगलते हुए बोल रहे थे।

'घनश्याम?' इस बार गुमठी पर बैठे किसी तीसरे ने पूछा।

'अरे वही, जिसकी होजियरी और अंडर गारमेंट्स की दुकान है यहाँ पीछे वाली गली में। वही रंगीला रतन।' विनय उपाध्याय ने उत्तर दिया।

'फिर?' मोहन की उत्सुकता बढ़ चुकी थी।

'फिर क्या, जब घनश्याम के मोबाइल की कॉल डिटेल्स निकलवाई तो इस तरह की कई सारी कॉल्स मिली हैं। लम्बी लम्बी। सब अलग-अलग नंबरों पर की गईं हैं। सारे नंबर महिलाओं के हैं। शहर भर के अच्छे परिवारों के महिलाओं के और कॉल्स भी ऐसी वैसी नहीं हैं, कोई दो घंटे की है तो कोई ढाई की।' बात ख़तम करके विनय उपाध्याय ने इतमीनान से पान थूक दिया।

'अब...?' मोहन ने फिर पूछा।

'अब क्या? पुलिस घनश्याम को उठवाने वाली है पूछताछ के लिये। मैंने तो मना किया था एसपी साहब को कि मामले को रफा दफा कर दो। बिला वज़ह भले घर की महिलाओं पर बात आयेगी। मगर पुलिस किसी की सुनती है कभी? कहने लगे शहर में इतना तनाव है, लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, अब हमें भी तो कुछ न कुछ करना ही होगा ना।' विनय उपाध्याय के स्वर में चिंता घुली हुई थी।

'मगर भैया जी घनश्याम में ऐसा क्या है कि ...?' मोहन ने अधूरी बात इस अंदाज़ में छोड़ दी कि आगे का तो समझने लायक है ही।

'क्यों ...? क्या नहीं है? गोरा चिट्टा है, ऊँचा पूरा है और उस पर होजियरी और लेडीज़ अंडर गारमेंट्स की दुकान चलाता है और क्या चाहिए?' विनय उपाध्याय ने तीखे स्वर में कहा।

'सो तो है।' मोहन को लगा कि प्रश्न ग़लत हो गया।

'मैंने तो अपनी तरफ़ से ख़ूब कोशिश की रोकने की, लेकिन क्या करो, अब शहर की क़िस्मत में बदनामी का ठीकरा फूटना लिखा है, तो उसे कौन रोक सकता है।' एक ठंडी सांस छोड़ कर कहा विनय उपाध्याय ने।

'प्रशांत के परिवार में भी?' मोहन की उत्सुकता बरकरार थी।

'वहीं से तो सुराग मिला है पुलिस को। दो-दो घंटे की कॉल्स मिली हैं।' विनय उपाध्याय ने उत्तर दिया।

'उनसे भी होगी पूछताछ?' मोहन पूरी कहानी जान लेना चाह रहा था।

'अब महिलाओं को थाने में बुलाकर तो होगी नहीं पूछताछ। फिर भी घर जाकर तो पुलिस पूछेगी ही। देखो अब क्या होता है। मेरा तो दिमाग़ ही काम नहीं कर रहा है। पुलिस ने नाम नहीं बताये हैं अभी, उससे और टैंशन हो रहा है। पता नहीं कौन-कौन से घरों का नाम उलझता है इस मामले में। जो हो रहा है अच्छा नहीं हो रहा है।' कहते हुए विनय उपाध्याय उठ गये।

'कलजुग है विनय भैया। ख़सम से पूरा नहीं पड़े तो बाहर मुँह मार लो। कौन है रोकने टोकने वाला और अब तो ये मोबाइल।' मोहन की बात अधूरी ही छोड़ कर विनय उपाध्याय दुकान से बढ़ गये।

शाम के बढ़ कर रात होने तक ये चर्चा पूरे शहर में फैल चुकी थी कि प्रशांत हत्याकांड वाले मामले में अपहरण-वपहरण का कोई मामला नहीं है। अपहरण और फिरौती का नाटक तो केवल मामले को उलझाने के लिये रचा गया है। हक़ीक़त में तो ये सीधा-सीधा हत्या का मामला है। प्रशांत को किसी बारे में कुछ ऐसा पता चल गया था कि उसे मार दिया गया। इस चर्चा के फैलने के साथ वह पुछल्ला भी फैल रहा था कि इस मामले की आँच में शहर के कई सारे संभ्रांत परिवार भी आ रहे हैं। ये जो पुछल्ला था ये जहाँ-जहाँ से गुज़र रहा था वहाँ-वहाँ 'प्रशांत अपहरण और हत्या' के कारण पुलिस और प्रशासन के ख़िलाफ़ उपजे आक्रोश को शांत करता जा रहा था। उस कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन की तरह जिसमें कहा जाता है 'डर सबको लगता है, ...ती सबकी है।'

और फिर रात को जब एक पुलिस कांस्टेबल घनश्याम को अपने साथ मोटर साइकिल पर बिठा कर शहर के प्रमुख मार्गों का फ़िज़ूल में ही चक्कर लगाता हुआ कोतवाली की तरफ़ गया तो मानो सुगबुगाती-सी चर्चा में बारूदी पंख लग गये। अभी तक जो चर्चा दबे छुपे अंदाज़ में हो रही थी, वह अब खुल कर चौराहे-चौराहे होने लगी। देर रात तक शहर के चौराहे जागते रहे और एक ही बात करते रहे 'होजियरी वाला घनश्याम'।

बात की बात में शहर की चर्चा का रुख़ पलट चुका था? सुब्ह तक जो शहर प्रशांत की हत्या, पुलिस का निकम्मापन, रामकथा और आंदोलन जैसे विषयों पर मुट्ठी भींच-भींच कर चर्चा कर रहा था, शाम होने तक वही शहर 'घनश्याम के जाल में कौन कौन?' पर रस ले लेकर बतिया रहा था। कुछ लोगों ने बाक़ायदा अपने तरफ़ से सूची बनाकर भी प्रस्तुत कर दी थी कि घनश्याम के चक्कर में कौन-कौन से परिवार आये हैं। सुब्ह का आक्रोश रात तक रस में परिवर्तित हो चुका था।

अगली सुब्ह पुलिस और प्रशासन के लिये एक ख़ुशनुमा सुब्ह थी। वे लोग जो कल तक प्रशांत हत्याकांड को लेकर चल रहे आंदोलनों की अगुवाई कर रहे थे, उनमें से अधिकाँश के परिवारों की तरफ़ घनश्याम कांड की सूई घूम रही थी। सो वे सारे अब बड़े इतमिनान से अपने-अपने काम धंधे में लगे हुए थे।

दोपहर होने तक दबी ज़ुबान, फुसफुसाहट और कानाफूसियों में पूरा शहर एक ही बात कर रहा था 'इसका भी नाम आया है, उसका भी नाम आया है।' बाक़ायदा दावे प्रस्तुत किये जा रहे थे। 'वो तो बिल्कुल तय ही है, देखते नहीं हो घंटे-घंटे भर घनश्याम की दुकान पर खड़ी रहती थी और उसके तो घर भी घनश्याम का खुल्ला आना जाना है।'

उधर जो परिवार घनश्याम कांड के घेरे में आ रहे थे वे अपने तौर पर मामले की अंदर ही अंदर पड़ताल भी कर रहे थे। अधिकांश गोपनीय तरीके से विनय उपाध्याय से संपर्क कर चुके थे। विनय उपाध्याय सबको एक ही आश्वासन दे रहे थे 'नहीं नहीं कुछ नहीं है ऐसा और अगर कुछ होगा तो मैं तो हूँ। आपका परिवार मेरा परिवार है। कोई नाम सामने नहीं आयेगा। बस आप ज़रा ये प्रशांत वाले मामले से दूर रहो। क्या है पुलिस बड़ी कुत्ती चीज़ होती है। फिर वह मेरी भी नहीं सुनेंगे और अगर ईश्वर न करे घर की महिलाओं से पूछताछ हो गयी तो इज़्ज़त का तो पंचनामा बन जायेगा, फिर बचेगा ही क्या। आप तो अपना काम संभालो, आपको क्या लेना देना, हत्या, अपहरण, पुलिस से? उसके लिये हम हैं ना।' एक लम्बी-सी बात जिसमें आश्वासन, दिलासा, धमकी, सलाह सब कुछ इतनी सफ़ाई के साथ मिलाया जा रहा था कि सुनने वाले को लग ही नहीं रहा था कि इसमें क्या-क्या है। आख़िर में एक फाइनल चोट के रूप में 'हम परिवार वाले हैं, हमें दस ऊँच नीच का ध्यान रखना चाहिये।' कह कर विनय उपाध्याय पूरे आंदोलन को ठंडा कर देते थे।

यूँ तो हत्याकांड के बाद से ही पुलिस प्रशांत के घर के दिन भर में कई-कई चक्कर काट रही थी, लेकिन आज जब एडीशनल एसपी के साथ पुलिस अमला प्रशांत के घर पहुँचा तो लोगों की उत्सुकता अचानक बढ़ गई। क्यों आई है अचानक पुलिस? उसी मामले में पूछताछ करने आये हैं। लगता है घनश्याम ने सारा कच्चा चिट्ठा खोल दिया है। क्या कोई गिरफ़्तारी होने वाली है। राम-राम कैसा बुरा समय आया है परिवार पर, एक तो जवान जहान लड़का चला गया और उस पर ये कलंक। इस प्रकार की फुसफुसाहटें हवा मैं तैर रहीं थीं। क़रीब घंटे भर तक पुलिस का अमला प्रशांत के घर रहा। इसी बीच विनय उपाध्याय भी वहाँ पहुँचे। एडीशनल एसपी और विनय उपाध्याय ने प्रशांत के पिता और दादा के साथ काफ़ी देर तक बंद कमरे में चर्चा की। बाहर तमाशबीन 'कुछ होने' की प्रतीक्षा में समूहों में खड़े थे। घंटे भर बाद पुलिस का अमला बाहर निकला और गाड़ी में सवार होकर रवाना हो गया। क़रीब पन्द्रह मिनिट बाद विनय उपाध्याय भी एक काग़ज़ लिये निकले और रवाना हो गये। कुछ ही देर बाद एक प्रेस विज्ञप्ति प्रशांत के दादा कि ओर से शहर के सभी अख़बारों के ऑफिसों में बँट चुकी थी। विज्ञप्ति में लिखा था कि दुख की इस घड़ी में पूरे शहर ने जिस प्रकार परिवार का साथ दिया उसके लिये परिवार आभारी है। साथ ही ये अपील भी की थी कि शहर के लोग शांति बनाए रखें। पुलिस हत्यारों को खोजने के लिये हर संभव प्रयास कर रही है। लोगों के बार-बार विरोध प्रदर्शन करने से पुलिस का काम प्रभावित हो रहा है। पुलिस को अपना काम करने दें, हमें पुलिस पर पूरा विश्वास है कि वह जल्द ही हत्यारों को पकड़ लेगी। धैर्य बनाये रखें।

विज्ञप्ति के छपने और सुब्ह का अख़बार बँटने के बाद सारा मामला समाप्त हो चुका था। आक्रोश जो पिछले दो दिन से ही चौराहे हर गली में उफन कर दिख रहा था, वह झााग की तरह बैठ चुका था।

'प्राब्लम सॉल्व हो गई सर।' पप्पू पास हो गया वाले अंदाज़ में आइजी ने मोबाइल पर सूचना दी। ये वही सूचना थी जो थाना प्रभारी से एडीशनल एसपी, वहाँ से एसपी और वहाँ से डीआइजी के द्वारा आइजी तक पहुँची थी और अब आइजी से सीधे सीएम तक पहुँच रही थी, बीच के एडीजीपी, डीजीपी वग़ैरह को छोड़ते हुए।

'नहीं सर हत्यारे नहीं पकड़ाये हैं। लेकिन मामले को लेकर जो कुछ भी ऊलजुलूल बातें हो रहीं थीं वह ख़त्म हो गईं हैं। लोग अब आंदोलन या प्रदर्शन नहीं करने को लेकर राज़ी हो गये हैं। हत्यारों को लेकर भी टीम लगी है, लेकिन हमारी प्राथमिकता तो यही थी सर कि ये रामकथा को लेकर जो कुछ चल रहा है वह जल्द से जल्द बंद हो जाये।' आइजी को पूरे मार्क्स आज ही लेने थे।

'जी सर हत्यारे भी पकड़ में आ जाएँगे।'

'जी सर, जी सर, जी सर।'

'सर मैंने एस पी को कह दिया है कि आज राम कथा का समापन है सो ।'

'सर ।'

'सर ।'

'सर ।'

कट टू राम कथा

राम कथा का समापन हो रहा था। कथा वाचक आज राम के राज्याभिषेक के साथ समापन कर रहे थे। हालाँकि राज्याभिषेक के बाद सीता का दूसरा वनवास और धरती में समाने की घटनाएँ भी होती हैं, लेकिन वह कहानी के हैप्पी एंडिंग में ख़लल डालती हैं। तो कथा वाचक इसीलिये राज्याभिषेक पर ही समापन कर रहे थे।

'यही राम राज्य है (कथा वाचक जान बूझ कर' वही'के स्थान पर' यही'का प्रयोग कर रहे थे।) जिसमें चारों तरफ़ सुख, शांति, समृद्धि, अमन, चैन, संतोष, सहकार, सौहार्द्र, सद्भावना, सहयोग, प्रेम, आत्मीयता, सामंजस्य, स्नेह, परोपकार, करुणा ...' लगभग पचहत्तर इसी प्रकार के शब्द, कथा वाचक ने एक के बाद एक बोले। तीसवें शब्द से जो तालियाँ बजनी शुरू हुईं तो पचहत्तरवें शब्द तक बराबर बजती रहीं। कुछ भावुक टाइप के लोगों का ये हाल था कि वे बीसवें शब्द पर विभोर हुए, तीसवें पर उनके रोंगटे खड़े हो गये, पचासवें पर आँखों से आँसू निकले, साठवें पर वे बाक़ायदा रोये और सत्तर से पचहत्तरवें शब्द तक आते-आते वे फूट-फूट कर रो रहे थे। तालियों के बीच कथा वाचक ने तीन बार एक ही वाक्य को दोहरा कर कथा का समापन किया। लेकिन तीनों बार उनकी भंगिमा अलग-अलग थी। पहली बार उन्होंने आसमान की ओर दोनों हाथ उठाकर फैलाते हुए कहा

'यही है राम राज्य'

दूसरी बार हाथों को सामने समानांतर नब्बे डिग्री पर रखते हुए बाहर की तरफ़ फैला कर मानो पूरे पंडाल को समेटते हुए कहा

'यही है राम राज्य'

और तीसरी आर दोनों हाथों को पुष्पाँजलि वाली मुद्रा में ठीक सामने बढ़ाया। ठीक सामने जहाँ कथा के आयोजक बैठे थे। पुष्पाँजलि की मुद्रा को बाहर की तरफ़ खोलते हुए कथा वाचक ने तीसरी बार बहुत ही कोमल स्वर में गदगद कंठ से ठहर-ठहर के कहा

'यही है राम राज्य'।

कट टू ग्राम तिलखिरिया

तिलखिरिया में देर रात तेज़ बारिश हुई। बारिश जो धोती रही, घोलती रही उस ख़ून को, जो वहाँ घांस पर, पत्तों पर, ज़मीन पर बिखरा था। ख़ून जो सूख चुका था। बारिश उसको घोलकर बहाती रही उस नाले की तरफ़ जो खेत से सटकर बहता था। नाला, जो आगे जाकर उस नदी में मिलता था जो ज़िला मुख्यालय से होती हुई बहती थी और आगे जाकर चंबल में गिरती थी। वही चंबल जो गंगा में मिलती है और वही गंगा जो सागर में जाकर समाप्त होती है। रात भर बारिश ख़ून को बहाती रही नाले की तरफ। जब सुब्ह हुई तो बरसात थम चुकी थी। सूरज निकल चुका था। धुली-धुली धूप में चमक रहे थे कंकड़, पत्थर, तिनके, घांस और मिट्टी, ख़ून का कहीं कोई निशान नहीं था।

कट टू ज़िला मुख्यालय

पूरी रात का सफ़र करता हुआ, नाले से नदी और नदी के साथ ज़िला मुख्यालय पहुँचा ख़ून अल सुबह ज़िला मुख्यालय से होकर बह रहा था। जब ये ख़ून वहाँ से होकर बहा तब शहर पूरी तरह शांत और ठंडा था, लाश की तरह ठंडा और मौत की तरह शांत।