वंश वृक्ष / गोवर्धन यादव

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सुबह से ही उसकी बाँयी आँख फरक रही थी। जब जब भी उसकी बाँयी आँख फरकी है, तब-तब उसे शुभ समाचार सुनने को मिले हैं। तभी उसे डाकिया आता दिखा। उसने सहज रूप से अंदाज लगाया कि आज वह उसके बेटे की चिट्ठी जरूर लेकर आयेगा। वह प्रसन्नता से भरने लगा था। पोर-पोर से रोमांच हो आया था। उसका मृगी-मन कुलाचें भरने लगा था। बुझा चेहरा फिर दिपदिपाने लगा था। सूखी देह फिर हरियल होने लगी थी। इसी दिन का उसे बेसब्री से इंतजार था।

विगत चार माह से दिनेश का पत्र नहीं आया था, उसी कारण वह पगलाया सा रहने लगा था। खाने-पीने में उसे अरूचि होने लगी थी। रात की नींद व दिन का चैन छिन गया था। एकांत क्षणों में उटपटांग विचार आते, जो दिल और दिमाग को मथ जाते। वह हमेशा बेचैनी से भरा रहता था।

एक दिन तो वह डाकघर भी जा पहुचा था और अपनी चिट्ठियों के बारे में पूछताछ करता रहा था। डाकिये ने जब इंकार की मुद्रा में अपनी भारी-भरकम गर्दन हिला दिया था, तो वह भी अंदर तक हिल गया था। उसका शरीर पीपल के पत्ते की तरह कांप गया था। तरह-तरह के प्रश्न उसके दिल में सालबोरर की तरह छेद करते रहे थे। अगरबत्ती की तरह वह दिन-रात सुलगता रहा था।

ऐसा भी विचार मन में आया कि वह खुद शहर चला जाये और अपनी आँखों से सभी को देख आए। चाहकर भी वह वैसा नहीं कर पाया था। एक तो बुढ़ाती देह, उपर से कमजोर आँखों की वजह से वह हिम्मत ही नहीं जुटा पाया था।

हाँ! एक बार वह शहर गया था। चिंटू का जन्म-दिन था। संयोग से दिनेश भी साथ था। हवा से बातें करती मोटर में बैठ कर उसे लगा कि वह हवा में उडा जा रहा है। बस से उतरते ही उसकी घिग्गी बंध गई थी। अनगिनत वाहनों को बेलगाम दौडता देख वह डर सा गया था। ठगा सा रह गया था, गगनचुंबी इमारतों को देखकर। उसे तो इस बात पर भी आश्चर्य हो रहा था कि शहर का आदमी चलता कम है और दौडता ज्यादा है। वह सोचने लगा था। आदमी की शक्ल में घोडे दौड रहे हैं। भीड देखकर वह असहज हो उठा था। उसकी बुद्धि चकराने लगी थी। वह अकेला जा पायेगा, इसमें संदेह होने लगा था। पहली बार में ही हिम्मत जवाब दे गई थी।

दिनेश पत्र नहीं लिख पाया। इसका कारण तो समझ में आता है सूरज की पहली किरण के साथ वह उठ बैठता है। दैनिक क्रिया-कर्म से निजात पाकर वह बगल में टिफिन दबाये वह घर से निकल पडता है। उसे रास्ते में बस भी बदलनी पडती है। अगर पहली बस नहीं पकडी जा सकी, तो दफ्तर समय पर पहुच पाना संभव नहीं। उसका कार्यालय भी तो उसके घर से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूरी पर है। अतः समय का पाबंद होना बहुत जरूरी है, उसके लिए।

अति-उत्साहित होते हुए दिनेश ने बतलाया था कि वह दफ्तर से लोन लेकर मोटर सायकिल खरीदने की सोच रहा है। सुनते ही वह बमक गया था। उसने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि बुरा ख्याल तत्काल मन से बाहर निकाल फेंके।

बेलगाम भागते वाहनों को वह देख ही चुका था। वह यह भी देख चुका था कि आदमी, आदमी की तरह सडक पर चल भी कहाँ पाता है। सभी स्पीडमें होते हैं। सभी आगे निकल जाना चाहते हैं। आगे निकल भागने की खतरनाक प्रवृत्ति के चलते वह गफलत का शिकार हो जाता है और असमय ही मौत को गले लगा बैठता है। अपने अल्प प्रवास में वह कई दर्दनाक हादसे देख भी चुका है।

शहर की न तो अपनी कोई तमीज होती है, न ही इंसान के मन में दया-ममता-सहानुभूति ही। हादसों को देखकर वह आगे बढ़ जाता है। मानो कुछ हुआ ही न हो। कोई रूकना नहीं चाहता। कोई पलटकर नहीं देखता। हमदर्दी नहीं जतलाता। वह नहीं चाहता कि उसकी अपनी इकलौती संतान कभी दुर्घटना का शिकार बने। उसने समझा दिया था कि बस से आने-जाने में ही फायदा है। समय बचाना यहाँ जरूरी नहीं है। जान बचाना आवश्यक है। जान है तो जहान है। अंत में अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए उसने आदेश दिया था कि वह भूलकर भी मोटर सायकिल नहीं खरीदेगा और न ही वह इसके लिए इजाजत ही देगा।

दिनेश की बात तो समझ में आती है कि उसके पास दम मारने को फुर्सत नहीं है। जब फुर्सत ही नहीं है तो क्या खाक वह पत्र लिख पाएगा। बहूरानी करती भी क्या है दिनभर! दिनेश ऑफिस चला जाता है। चिंटू अपने स्कूल चला जाता है। फुर्सत ही फुर्सत रहती है उसके पास। वह चाहे तो एकाध पोस्टकार्ड अपने बूढे ससुर के नाम लिख सकती है। पर महारानी लिख पाए तब न। निपट देहाती-अनपढ-गंवार बहू बिहा लाता तो बात दूसरी थी। वह तो शहर की कॉलेज पढ़ी लड़की को बहू बनाकर लाया था। ऐसा भी नहीं कि उसे पत्र लिखने का सउर नहीं होगा। सब कुछ जानती होगी। पता नहीं... वह पत्र नहीं लिखती। दिनभर टीवी-फीवी से चिपकी रहती होगी। सच है। समय कहाँ है, उसके पास। उसे रजनी पर क्रोध हो आया था।

अतीत के गर्त में उतरकर वह लहूलुहान होता रहा। वह कुछ और सोच पाता, डाकिए ने पत्रों के बण्डल में से एक पत्र छॉंटकर उसके हाथ में थमा दिया था। वह अपने विचारों की तन्द्रा की खोल में से पूरी तरह से निकल भी नहीं पाया था कि डाकिया जा चुका था। उसे अपनी भूल का अहसास होने लगा था।

पत्र हाथ में आते ही लगा कुबेर का खजाना हाथ लग आया है। उसके पूरे शरीर में... प्रसन्नता की लहर दौडने लगी थी। उसने लिफाफे को उलट-पलटकर देखा। पत्र पर लिखी इबारतदिनेश के हाथ ही की थी। वह दिनेश की लिखावट अच्छी तरह से पहचानता था। प्रसन्नता के साथ उसे अफसोस भी होने लगा था। वह सोचने लगा था- काश वह पढा-लिखा होता तो अब तक पत्र पढ जाता। समाचारों से अवगत हो चुका होता। पता नहीं। दिनेश ने पत्र में क्या लिख भेजा है। मजमून जानने के लिए वह उतावला हुआ जा रहा था। उसे गोपाल की याद हो आयी। उसने झट से पैरों में जूते डाले और घर से निकल पडा। रास्ता चलते उसे होश आया कि वह बण्डी-धोती में ही घर से निकल पड़ा है। कुर्ता पहनना तो वह भूल ही गया था। ष्गॉंव में सब चलता हैहूँ यह कहते हुए व्यग्रता से आगे बढ चला था।

रास्ता चलते कई विचार भी साथ चलने लगे। गोपाल घर में मिलेगा भी अथवा नहीं? वह खेलने-कूदने न निकल गया हो! संभव है, वह खेत पर निकल गया हो। खैर! वह कहीं भी होगा, वह उसे ढूढ निकालेगा।

ष्बडा प्यारा बच्चा है गोपाल। फिर पूरी ट्यूनिंग भी तो मिलती है उससे। जहाँ भी मिलता है, दादाजी प्रणााम अथवा दादाजी पायलागू कहना नहीं भूलता। कोई भी काम बतलाओ, फौरन कर डालता है। पढ़ने को कहो। झट तैयार हो जाता है। उसके पढ़ने का ढंग भी निराला है। ऐसे बांचता है मानो आँखों देखा हाल सुना रहा हो। लिखने की कहो। फौरन दवात-कलम उठा लाता है। लिखता भी क्या गजब का है, मानो कागज पर मोती टांक रहा हो।

उसने दूर से ही देख लिया था। शायद वह कहीं जाने की तैयारी में था। देखते ही वह उॅंची आवाज में बोल उठा था- ष्गोपाले दिनेश का पत्र आया है। हूँ इसके आगे वह कुछ भी बोल नहीं पाया था। बोलने को बचा भी क्या था। अब उसकी चाल में गेंद की सी उछाल थी। लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ वह आगे बढ़ चला था।

श्दादाजी-पायलागूश् कहता हुआ वह उसके पैरों तक झुक आया था। उसने उसे उठाते हुए अपने सीने से लगा लिया था। उसे सीने से चिपकाते हुए उसे लगा, ममता का एक सोता अंदर बह निकला है। भाव-विह्वल होते हुए उसके नेत्र सजल हो उठे थे।

गोपाल ने उसके हाथ से लिफाफा ले लिया और ओटले पर बैठते हुए उसे खोलने लगा। वह भी उससे सटकर बैठ गया। विस्फारित नजरों से वह उसे लिफाफा खोलते देखते रहा। अपनी सारी शक्तियों को समेटकर वह अपना ध्यान वहाँ केन्द्रित करने लगा था। पत्र की तहें ठीक करते हुए अब वह पत्र पढने लगा था।

पिताजी...

पिताजी सुनते ही लगा कि किसी ने मिश्री घोलकर उसके कानों में उडेल दिया हो। उसकी देह गन्ने की सी मीठी होने लगी थी। उसे ऐसा भी लगने लगा था कि दिनेश सामने प्रत्यक्ष रूप से बैठकर बातें कर रहा हो।

आनंदपूर्वक हूँ। ऑफिस की व्यस्तताओं की वजह से पत्र लिखने में काफी विलंब हुआ। पत्र न मिलने से आपको कितनी मानसिक पीडाओं के बीच से गुजरना पडा होगा, आपपर कैसी, क्या बीती होगी! इस दर्द का मुझे अहसास है। कृपया माफ करने की कृपा करें।

पिताजी... मैंने कितनी ही बार आपसे विनती की है कि आप यहाँ आकर हमारे साथ रहें। आपको लेकर मैं अक्सर चिंताओं से घिरा रहता हूँ। आप गाँव में निपट अकेले रहते हैं। आपको कहीं कुछ हो गया तो मैं सहन नहीं कर पाउंगा, मेरी भी आखिर कोई जवाबदारी है आपके प्रति। आप भलीभाँति जानते ही हैं कि दफ्तर से बार-बार छुट्टियाँ लेकर मैं गाँव नहीं आ सकता। आप आना नहीं चाहते। मैं बार-बार नहीं आ सकता। ऐसे में कैसे काम चलेगा। आप के न आ सकने का कारण मैं जानता हूँ। आप खेती-बाडी, मकान और मवेशियों की वजह से वहाँ फॅंसे रहते हैं। मैं पूर्व में भी निवेदन कर चुका हूँ कि इन सबको बेच डालिए। अच्छी-खासी रकम मिल जाएगी। हम या तो यहाँ बना-बनाया मकान खरीद सकते हैं अथवा प्लॉट लेकर मकान बनवा सकते हैं। आप-हम-सब साथ रहेंगे। आपको चिंटू का भी साथ मिल जायेगा। वह भी दादाजी-दादाजी की रट लगाए रहता है, उसे आपका साथ मिल जायेगा। आप ही तो कहते हैं ष्मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है। हूँ

अपने किसी निजी काम से गोविंद शहर आया था। मुझसे उसकी मुलाकात हुई थी। मैंने ही पहल करते हुए उससे कहा था कि कोई अच्छा-सा ग्राहक बताए। खेत-बाडी न बेचने की वह भी कह रहा था। मेरी ही जिद देखकर वह सभी कुछ खरीदने को तैयार हो पाया है। वह यह भी कह रहा था कि तय कीमत के अलावा भी वह पाँच-पच्चीस ज्यादा देने को तैयार है। वह यह भी कह रहा था। घर की चीज घर में ही रहेगी।

फैसला अब आपको करना है। इतना अच्छा क्रेता कहाँ मिलेगा। आप अपनी सहमति-असहमति के बारे में लिख भेजें। मैं समय पर आ जाउंगा ताकि रजिस्ट्री वगैरह करा ली जाये।


शेश शुभ

आपका

दिनेश

एक-एक शब्द वह ध्यानपूर्वक सुन रहा था। खेत-बाडी-घर बेच देने की बात सुनते ही वह बमक गया था। उसके चेहरे पर क्रोध की परछाईयाँ छाने लगी थी। वह तनाव में घिरने लगा था। उसकी आँख क्रोधाग्नि में भड़कने लगी थी। वह दॉंत भी पीसने लगा था। उसे ऐसा भी लगा कि असंख्य बर्र मक्खियों ने उस पर अचानक धावा बोल दिया है। पूरे शरीर में दंश के निशान उभर आए हैं। शब्द अंदर उतरकर विस्फोट करने लगे थे। अंदर सब क्षत-विक्षत था। वह तमतमाकर उठ खड़ा हुआ। गोपाल के हाथ से लगभग पत्र छीनते हुए उसने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और हवा में उछालते हुए घर की ओर लौट पड़ा।

गोपाल ने संभवतः आज पहली बार दद्दा को इस तरह भड़कते देखा था। दद्दा का रोद्ररूप देखकर वह घबरा सा गया था। एक डर मन की गहराईयों तक उतर आया था, विस्फारित नजरों से वह उसे जाता देखता रहा।

घर आकर वह कटे हुए लाठ के लट्ठे की तरह बिस्तर पर गिर पड़ा था। वह आवेश में उबल रहा था। उसका दिमाग अब भी भिन्ना रहा था। दिनेश की लिखी बातें रह-रह कर याद आती। शब्द कलेजे को छलनी कर रहे थे। इतना होने के बावजूद उसकी सोचने-समझने की बुद्धि बराबर काम कर रही थी। उसे दिनेश की बुद्धि पर तरस आने लगा था। वह सोच रहा था ष्दिनेश अभी बच्चा है, अकल का कच्चा है। तभी तो वह एैसी-वैसी बातें सोच पाया। उसने कैसे अनुमान लगा लिया कि दद्दा ऐसा कुछ कर सकता है। निश्चित ही गोविन्द ने उसे भड़काया होगा। वह किसी अन्य काम से शहर नहीं गया था बल्कि वह अपने मनोरथ लेकर दिनेश से मिला होगा। जब वह अपना दांव दद्दा पर नहीं लगा पाया तो उसने दिनेश को अपना मोहरा बनाया और वह बेवकूफ उसके झॉंसे में आ गया।

गोविन्द पल्ले दर्जे का लंपट है, बदमाश है, धूर्त है, चालबाज है, हरामी है। आये दिन वह गाँव में भी कोई न कोई बखेड़ा करता रहता है। प्रपंच रचना उसकी फितरत है। उसकी गिद्ध दृष्टि हमेशा दूसरों की जायजाद पर गड़ी ही रहती है। दाना डालकर तमाशा देखने की उसकी आदत है। साला हरामी, हरामखोर, बदमाश। कुत्ते का पिल्ला और भी न जाने कितनी ही गालियाँ वह बुदबुदाते हुए देता रहा।

गोविन्द का नाम जुबान पर आते ही लगा-मुँह का स्वाद कसैला-कड़ुआ हो आया है। उसका जी मिचलाने लगा था। आक-थू करते हुए उसने गला साफ किया और खेतों की ओर बढ़ चला था।

हरी-भरी, लहलहाती फसलों को देखकर उसका चेहरा कमल की भाँति खिलने लगा था। आँखों में ठंडक भरने लगी थी। शीतल हवा के झोंकों ने बदन से लिपटते हुए शीतलता की लेपन चढ़ दिया था। तपते बदन को राहत मिलने लगी थी। शरीर पर उभर आये दंश के निशान मिटने लगे थे।

खेत की मेढ़ों से चलते हुए वह वृक्ष की टहनियाँ को हाथ में लेकर हिलाता चलता मानो वह अपने मित्र से हाथ मिला रहा हो। कभी वह पेड़ों के तनों पर अपनी हथेली से हल्की-सी थाप देता। मानो वह उकी पीठ सहला रहा हो, ऐसा करते हुए वह प्रसन्नता से भरने लगा था। ऐसा कुछ करते हुए उसने अपने पिता को देखा था। बाल सुलभ जिज्ञासा के चल उसने पूछा था कि वे ऐसा क्यों करते हैं? प्रश्न सुनकर पिता गंभीर हो गये थे। वे आकाश की ओर सर उठाकर देखने लगे थे। शायद आकाश में फैले शब्दों के संजाल समेटने की कोशिश कर रहे थे।

देर तक मौन रहने के बाद वे बोल पाए थे। शब्दों के गहन-गंभीर शब्दार्थ छिपे हुए थे। शब्द क्लिष्ट नहीं थे। सीधे-सादे शब्द थे। सरल और आसान, जिसे आसानी से समझा जा सके। इतने आसान कि अल्पज्ञ भी समझ ले। उन्होंने जो कुछ भी कहा, सुनकर आश्चर्य एवं कौतूहल होना स्वाभाविक था। उनके कहने का अंदाज कुछ-कुछ दार्शनिक की तरह था। कम शब्दों में काफी कुछ कह गए थे। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए बतलाना शुरू किया।

जानते हो मन्नू...! ईश्वर ने धरती की उत्पत्ति के ठीक बाद पेड़-पौधे लगाए। फिर असंख्य जीव-जन्तु पैदा किए। बादल-बिजली-पानी वे पहले ही बना चुके थे। ईश्वर जानते थे कि कितना भू-भाग छोड़ा जाए कितना नहीं। उन्होंने एक भाग धरती, तीन भाग पानी भर दिया ताकि किसी जीव-जन्तु को पानी की कमी न पड़ जाए। धरती का खूब साज-सिंगार करने के बाद उन्होंने मानव की उत्पत्ति की।

ईश्वर जानते थे मनुय की फितरत को और उसकी नेक-नियति को भी। दिमाग का भरपूर उपयोग करने वाला वह पहला प्राणी था। ईश्वर यह भी जानते थे कि एक दिन वह धरती में छेद करके पाताल तक पहुचेगा। समुद्र को चीर कर वह नागलोक और आसमान में सुराख करके वह स्वर्गलोक तक आ धमकेगा और उसे ही धता बतलाने लगेगा। जहाँ एक ओर वह साइंस और टेक्नालॉजी में परचम लहराकर अपनी बुद्धि कौशल्य से नयी-नयी इबारतें लिखेगा तो वहीं एक दिन वह धरती के विनाश का कारण भी बनेगा।

जिस धरती को ईश्वर ने स्वयं अपने हाथों से दुल्हन की तरह सजाया-संवारा वह भला धरती का विध्वंश होते कैसे देख सकता था। ईश्वर की फिर अपनी भी मजबूरी थी। यदि वह आदमी की उत्पत्ति नहीं करता तो कौन बताता ईश्वर कैसा है। उसका स्वरूप कैसा है। ईश्वर के मन में भी मानव को लेकर कुछ लालसायें थीं। सारी क्रियाशीलता के गुण तो उसने केवल मनुय में ही डाले थे। ईश्वर की मजबूरी कहें अथवा कुछ भी कह लें। उसे आदमी को धरती पर भेजने का निर्णय लेना ही पड़ा था।

जानते हो मन्नू! इन्हीं पेड़-पौधों ने आदमजात को खाने को मीठे-मीठे फल खाने को दिए तो वही तन ढंकने को अपनी खाल। इन्हीं पेड़ों की छाल पहिनकर तो वह सभ्य कहला पाया। अपनी नंगाई ढक पाया। ये बात अलग है कि आदमी ने बदले में इन्हें क्या दिया। आज वह निर्ममता से उनके विनाश में जुटा हुआ है। सच मानो मन्नू। ये ही असली धरती-पुत्र है। ये एक पल के लिए भी धरती का साथ नहीं छोड़ते। वृक्षों को ऋषि भी कहा गया है। ऋषि सदा से ही कुछ न कुछ देते आए हैं। भले ही मनुय इनकी कितनी ही प्रताड़ना क्यों न करें।

मन्नू....! एक पते की बात और सुनो। आदमजात का कोई भी उत्सव हो। तीज -त्यौहार हों, बिना वृक्ष अथवा वृक्षों की प्रजाति के उपस्थिति के संपन्न नहीं होते, यहाँ तक आदमी जब प्राण त्यागता है तो वृक्ष ही उसका साथी साबित होता है, वह भी उसके तन के साथ जलता हुआ अपना अस्तित्व मिटा देता है।

आदमजात जब प्रसन्नता से इनसे मिलता है तो ये बेहद खुश हो जाते हैं, वे भी प्रसन्नता से नाच उठते हैं। वे इठलाने लगते हैं। कोई उन्हें गले लगाए अथवा टहनी पकड़कर हिलाऐं सो ये प्रसन्न होने लगते हैं। हवा इनसे मिलकर सारी प्रसन्नता दूर-दूर तक फैला देती है। पूरा वातावरण ही प्रसन्नता से भर उठता है। यदि इन्हें क्रोध में धारदार हथियार दिखलाओ तो सिहर उठते हैं। इन्हें भी भय सताने लगता है। मेरे पिता ने केवल इतना ही समझाया था। उसमें प्रेम का दर्शन छिपा हुआ है।

फिर धरती। धरती तो माँ होती है, हम लोगों की । बिना माँ के बच्चों की कल्पना तक नहीं की जा सकती। वह अपनी जमीन को एक निष्प्राण टुकड़ा नहीं मानता। जितनी उसके पास है वह उसे सम्पूर्ण रूप में माँ ही मानता आया है। वह अपनी माँ को बेचने की कैसे सोच सकता है। एक पुत्र अपनी माँ को कैसे बेच सकता है। उसे क्या अधिकार है कि वह ऐसा कर सके। इसी धरती पर, इसी जमीन पर उसका वंश-वृक्ष विस्तार लेता आया है। दस पीढ़ी, बीस पीढ़ी अथवा इससे कुछ ज्यादा। वह नहीं जानता। उसे अपनी पिछली सात-आठ पीढ़ी के बुजुर्गों के नाम कण्ठस्थ याद हैं। वह कदापि अपनी जड़ों से नहीं कटना चाहता। जड़ों से कटने का परिणाम क्या हो सकता है, वह यह भली-भाँति जानता है। वह किसी भी कीमत पर अपनी जड़ें छोड़कर कहीं नहीं जाएगा और न ही जमीन किसी और को बेचेगा। वह गोविन्द के मिशन को सफल नहीं होने देगा। कदापि नहीं।

उसने खेत से अंजुली भर मिट्टी उठायी। अपने माथे से लगाया। ऐसा करते हुए वह भावुक हो उठा था। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे थे। अपनी माँ के प्रति उमड़ आयी प्रेम की सरिता उसकी समूची देह में हरहराकर विस्तार लेने लगी।

मनोहर को अपनी भूल का अहसास होने लगा था। उसे याद आया। उसे कभी दिनेश को इस रहस्य से परिचित नहीं करवाया। दिनेश ने भी कभी कुछ पूछा ही नहीं। वह रह भी कहाँ पाया। भले ही वह पूछ न पाया हो। यह उसका कर्तव्य बनता है कि वह उसे बतलाए। एक पीढ़ी, आने वाली पीढ़ी को बताते चले यह क्रम बना ही रहना चाहिए।

वह दिनेश को समझायेगा कि वह नौकरी छोड़कर चला आए। क्या रखा है शहर में। भीड़भाड़, चीखते-चिल्लाते, भागते-शोरमचाते वाहन। शोर-शराबा। यही तो है शहर में। वहाँ प्राणदायक वायु कहाँ! सॉंस लेना भी मुश्किल। रहने को तंग-अंधेरी खोलियाँ, जहाँ चार लोग भी न बैठ सके। खाने-पीने की सभी चीजें मिलावटी। पग-पग पर डेरा डाले बैठी मौत। जन-जीवन को निगलने के लिए तत्पर बैठी है।

सुरसा की तरह बदन फैलाते जा रहे शहरों को सुनकर वह हतप्रभ था। जब से पास वाले शहर ने अपना विस्तार लेना शुरू किया है, तब से उसने गॉंवों की खुशहाल जिंदगी को निगलना शुरू कर दिया है। गॉंवों से पढ़े-लिखे नवयुवक मेहनत मजदूर-मिस्त्रियों को शहर के आकर्षण ने गाँव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। गॉंवों में बचे रह गये हैं वे लोग जो खेती-बाड़ी छोड़कर नहीं जा सकते, वे लोग जो अपाहिज हैं, लाचार हैं, बीमार हैं। वे ही बचे रह गये हैं, बाकी सभी को शहर ने अपने में समेट लिया है।

उसे गॉंधीजी की याद हो आयी। गॉंधीजी कभी इसी गाँव में आये थे। जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कभी कहा था। गॉंवों में ही हिन्दुस्तान बसता है। अतः सरकार को चाहिए कि वह सारी योजनाऐं गाँव से ही बननी चाहिए। पहिले गॉंवों का विकास हो, तब जाकर समग्र देश खुशहाल हो सकेगा। आजादी के बाद गॉंधी बाबा की बात जैसे भुला ही दी गई। शहर, नगरों में और नगर-महानगरों में विस्तार लेते चले गए। गाँव कंगले और उपेक्षित होते चले गए।

उसे मालूम है, दिनेश की कितनी पगार मिलती है। वह यह भी जानता है कि सामान्य परिवार को जीवन-यापन करन के लिए कितने रूपयों की जरूरत पड़ती है। वह यह भी जानता है कि उसे माह दो माह अथवा चार माह में कुछ रकम भी भेजनी पड़ती है। तब जाकर शहर का खर्च उठा पाता है। वह दिनेश को समझाएगा और बतलाएगा भी कि वह उतनी राशि तो नौकरों में बाँट देता है। फिर क्या जरूरत है शहर में रहकर समय बरबाद करने की। अगर वह एक नौजवान को समझाने में सफल हो गया तो अपने आपको धन्य मानेगा। वह गर्व से यह तो कह सकेगा कि बाबा को वह भले ही सम्पूर्ण रूप से नहीं भी जी पाया तो क्या हुआ, एक भटके हुए आदमी को रास्ते पर ला तो सका है।

विचारों की श्रृंखला रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसने देखा। सूरज अस्ताचल की ओर बहा चला जा रहा है। देखते ही देखते सुरमई अंधियारा गहराने लगा था। जड़-चेतन सब एकाकार होने लगे थे।

बैलों के गले में बंधी घण्टियों के मद्दम स्वर उसके कानों से आकर टकराने लगे थे। उसने अनुमान लगाया कि पड़ोसी किसान घर लौट रहा होगा। कौन होगा? वह यह नहीं जानता।

घण्टियों के स्वर अब स्पष्ट हो चले थे पास से गुजरने वाला व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि गोविंद ही था।

मेढ़ पर बैठकर उसने टेर लगायी ष्कौन गोविन्दहूँ?

ष्हॉं दद्दा मैं गोविन्द ही हूँ। हूँ

हूँआज बड़ी देर कर दी तैने। जरा एक बात तो सुन। मइने सुनौ हों... तू खेत बारी सबै कुछ बेचन बारो है। का कीमत धरी है तैने। कीमत जो भी धरो होवे, वो से पच्चीस-पचास जादा दूंगो। फिर घर की चीज घरई में रहनी बी चाहिये, जा में भलाई भी है। हूँ

गोविन्द को उसने माकूल जवाब दे दिया था। गोविन्द को मौन पाकर वह मुस्कुरा उठा था। गोविन्द के पास कोई जवाब नहीं था। रह भी कहाँ सकता था। बिना प्रत्युत्तर दिये वहाँ से खिसक जाना ही श्रेयस्कर लगा था उसको। सुना-अनसुना करते हुए वह तेजी से आगे बढ़ गया था।

थोड़ी देर के बाद। गहन अंधकार के गर्भ को चीरता हुआ चॉंद, आकाश-पटल पर चमचमाने लगा था।