वसन्त सेना / भाग 7 / यशवंत कोठारी

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मदनिका वसन्त सेना को अभिसार हेतु तैयार करती है। वसन्त सेना कहती है-

‘देखो आर्य कितने महान है। चुराये गये आभूशणों को वे जुंए में हार जाना बता रहे हैं और बदले में अपने प्राण प्रिय पत्नी की रत्नावली मुझे भिजवादी। वे महान है मदनिका। महान।‘

आप ठीक कह रही हैं देवी, उनकी उदारता पर तो सभी मुग्ध है।‘

‘अच्छा मैं तैयार होने जा रही हूँ।‘

‘देवी सावधान रहना पुष्पकरण्डक उद्यान शहर के बाहर है और वह निर्जन स्थान है। आपका अकेले जाना और भी अनुचित है।‘

शकार वसन्त सेना के चक्कर में एक बार फिर वसन्त सेना के घर में घुस आता है। वह मदनिका को डराता है, धमकाता है और वसन्त सेना से मिलना चाहता है। मदनिका शकार को झूठ कह देती है कि वसन्त सेना तो अभिसार हेतु प्रस्थान कर गई है। इसी समय राजाज्ञा सुनाई देती है कि गोपपुत्र आर्यक काराग्रह को तोड़ कर निकल भागा है। मदनिका प्रसन्न होती है। क्यांेकि अब शर्विलक भी आ जायेगा। शकार और विट उद्यान में वसन्त सेना को ढूँढ़ने के लिए चले जाते हैं। तभी वसन्त सेना अन्दर से अभिसार हेतु तैयार होकर निकलती है। मदनिका उनहंे जाने से रोकना चाहती है। वह सूचना देती है कि गोपपुत्र आर्यक काराग्रह से भाग गये हैं।

‘लेकिन यह तो षुभ संवाद है।‘

‘लेकिन राजा का साला शकार-।‘

‘उस दुष्ट का नाम भी जबान पर मत लाना।‘

‘वह आया था। वह आपको नगर के सभी उद्यानों में ढूँढ़ रहा है।‘

‘लेकिन मेरा जाना आवश्यक है। नहीं तो आर्य चारूदत्त क्या कहेंगे।‘

लेकिन आपका जाना मुझे उचित नहीं जान पड़ता है।‘

‘अच्छा यह रत्नावली सुरक्षित रखना। उसे लौटाना है। वह एक कुल वधू की अमानत है, नगर वधू के पास।‘

वसन्त सेना चली जाती है। तभी मैत्रेय गाड़ी लेकर आता है, मगर मदनिका उसे सूचित करती है कि आर्या वसन्त सेना तो चली गयी। अनर्थ की आशंका व्यक्त करते हुए मैत्रेय गाड़ी लेकर पुनः चला जाता है। राजाज्ञा सुनाई देती है-‘गोपपुत्र आर्यक नगर में ही हैं। सभी सावधान रहे। आर्यक को पकड़ने वाले को उचित पुरस्कार दिया जायेगा।‘

मैत्रेय के जाने के बाद मदनिका भयभीत होकर मन ही मन डरती रहती है।

चारूदत्त आकाश में काली घटनाओ को देख रहे हैं। बादल उमड़ आये हैं। अन्धेरा छा गया है। कोयल जंगल में चली गयी है। हंस मान सरोवर चले गये हैं। मैत्रेय अभी तक वसन्त सेना को लेकर नहीं आया है, पता नहीं क्यांे? आर्य का दिल आशंका से धधक रहा है तभी मैत्रेय आता है।

‘कहो मित्र कैसा रहा।‘

‘प्रभू उसने तो रत्नावली ले ली। और मेरा मजाक उड़ाया।‘

‘अच्छा।‘

‘आर्य मेरी माने तो इस गणिका से दूर ही रहे। ये किसी की भी सगी नहीं होती हैं। वैसे वसन्त सेना ने आज आने को कहा था। षायद वह रत्नावली से भी कुछ ज्यादा और चाहती है।‘

‘अच्छा उसे आने दो।‘

‘तभी वसन्त सेना के अनुचर कुंभीलक ने प्रवेश किया। आर्य चारूदत्त से तथा मैत्रेय से बातचीत करता है। वसन्त सेना के आने की जानकारी देता है। आर्य प्रसन्न होकर उसे दुशाला देते हैं।‘

वसन्त सेना सोलह श्रृंगार करके प्रवेश करती है। साथ ही दासी, विट भी है। छत्र लगा हुआ है। अद्वितीय सौन्दर्य, काम कला प्रवीण, नगर वधू वसन्त सेना के प्रवेश से ही बाग में बहार आ जाती है। वसन्त सेना सजी धजी मुग्धा नायिका सी लग रही है। वह स्वर्णाभूशणों से लदी हुई है। सुन्दर वस्त्रांे ने उसकी सुन्दरता को और भी बढ़ा दिया है। बरसते पानी में वसंत सेना को देखकर वह अत्यंत प्रसन्न होता हैं। वसन्त सेना मैत्रेय को देखकर कहती है-

‘आपके जुआरी मित्र कहां है?‘

‘वे सूखे बाग में है।‘

‘सूखा बाग---‘

‘हां वहीं चलिए।‘

‘दोनों चलते हैं। वसन्त सेना चारूदत्त को देखकर मदमस्त हो जाती है। धीमे स्वरों में पूछती है-

‘सांझ मीठी है न आर्य।‘

‘प्रिये तुम आ गई प्रिये।‘ बैठो। आसन पर बैठे। मित्र मैत्रेय इनके वस्त्र वर्षां से भीग गये हैं। इन्हंे दूसरे वस्त्र लाकर दो।‘

‘जो आज्ञा।‘

‘वसन्त सेना अन्दर जाकर वस्त्र बदलती है। आर्य चारूदत्त और वसन्त सेना आपस में एक-दूसरे को तृषित नजरों से देखते हैं। मन ही मन प्रसन्न होते हैं। वे अपनी प्रसन्ता छिपा नहीं पाते।

वसन्त सेना-‘ आपने रत्नावली भेजकर अच्छा नहीं किया। गहने तो चोरी हो गये थे।‘

‘चोरी की बात कोई नहीं मानता। अतः मैंने रत्नावली भेज दी।‘

‘आप मुझ पर तो विश्वास करते।‘

चारूदत्त चुप रहते हैं। मौन का संवाद होता हैं। वर्षा आ रही है। मेघ गरज रहे हैं। बिजली चमक रही है। मैत्रेय तथा वसन्त सेना की दासी व चेटी दोनों को बाग में छोड़ कर अन्दर चले जाते हैं।

वसन्त सेना को देखते चारूदत्त श्रृंगार दिखाते हैं। प्रेम से आलिंगन करते हैं। दोनों बाहुपाश में बंध जाते हैं।

चारूदत्त-‘हे मुख तुम गरजो। हे बिजली तुम चमको। हे वर्षा तुम तेज धार से आओ। क्योंकि इस नाद प्रभाव से मेरी देह वसन्त सेना के स्पर्श से पुलकित होकर फूल के समान और रोमांचित हो रही है।‘

‘प्रिये यह देखो इन्द्र धनुश। कैसा मनोरम।‘ आर्य चारूदत्त फिर कहते हैं-

‘वर्षा में भीगे हुए तुम्हारे वक्षस्थल कितने सुन्दर लग रहे हैं।‘ इनकी नोका पर ठहरी जल की बूंदे नन्हे मोतियों जैसी आभा दे रही हैं।‘

‘तुम कितनी सुन्दर हो।‘

वसन्त सेना कुछ न कह कह कर आर्य के सीने में अपना मुंह छुपा लेती है। वे प्रगाढ़ आलिंगन में एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं। वसन्त सेना अपने आभूशणों को उतारती है, अभिसार को प्रस्तुत होती है।

बाहर वर्षा तेज होती जा रही है। आर्य चारूदत्त अभिसार में आनन्द ले रहे हैं। वसन्त सेना अभिसार में पूर्ण सहगामी है। वे एक-दूसरे में समा जाते हैं। रात काफी बीत चुकी है- वे अभिसारपरोन्त शिथिल हो निंद्रा देवी की गोद में विश्राम करते हैं।