विकल्प / राजा सिंह

Gadya Kosh से
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माँ का हाँथ बहुत धीरे से उसके सिर पर गया, हिचकता सा, सिहरता हुआ और वह उसके छुवन से ही जान गयी कि माँ कितने आतुर है, कितनी बेबस है, कितने भयभीत और फिर भी कितनी जाग्रत और तनी हुई.घबराहट और डरी हुई धड़कनों की एक धुकधुकी-सी लगी है।

"क्या हुआ, बेटा?" माँ की आँखों में दुश्चिंता के अलावा कुछ भी नहीं था। ऐसे में तोषी का मन उमड़ने लगा कि अभी सब कुछ उलट दे।भीतर भरी हुई उसकी नफ़रत और जहर सब कुछ उलट दे।एक दो साल में उसके भीतर समाया पछाताप के उमड़ते घुमड़ते बादल बाहर निकल पड़ने को आतुर थे परन्तु अभी नहीं।उसके साथ रहने से हो गयी अपच उलटी या दस्त के रूप में पेट में गुड़गुड़ कर रहे है।जिसका शोर उसके मन मष्तिष्क में ढेर होता जा रहा है, गमगीन गहरा और सूनसान...उसका दिमाग बिलकुल कुंद है।

"अभी नहीं!" रूधी-सी आवाज सुनाई दी।और वह चल दी अपने कमरे की ओर।माँ हतप्रभ देखती रह गईं।उसकी सूखी और अधीर ऑंखें उसे निहारती रह गयी। बाबू जी की सुर्ख तरेरती आँखें उसकी पीठ से चिपकी हुई उसका अंत तक पीछा करती रहती है। जब तक कि वह अपने कमरे के दरवाजे को धकेलकर बंद नहीं कर लेती है।वह वैसे ही खड़े रहते है जैसे कह रहे हो कि मैं जानता था ऐसा ही कुछ होयेगा।

तोषी अपने बिस्तर पर औधे मुंह गिर पड़ी और बेतहासा रोने लगी।धीमे, तेज, चुप कब तक रोती रही।उसे होश नहीं था।उसे माँ की यह बात बहुत रुला रही थी कि..."सोना जाने कसे, आदमी जाने बसे!" ...उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह माँ को कैसे बताएँ? माँ उसका पीछा करते हुए टोह रही थी।बहुत समय हो आया था, तोषी निवृत और विरक्त हो गयी थी, अपनी अवस्था से।उसने अपने को कमरे में बंद कर लिया था।ऐसा लगता था कि कमरे में वह नहीं उसकी छाया है।वह बहुत अरक्षित महसूस कर रही थी।वह उठी और बाहर आने को सोचा।

सब कुछ पूर्ववत नहीं था।एक डेढ़ साल पहले वह इस घर की जान थी, अभिमान थी।यह वही थी जो इस घर को पराया करके चली गयी थी।उसने भागकर कबीर से शादी कर ली थी...वह अपने मन को दिलाशा दे रही थी।क्या हुआ? है तो वह इस घर की एकलौती लाडली बेटी घर उसे स्वीकार करेंगा! उसने अपने मन को समझाया।देखते है? किसी भी क्षण वह बाहर निकल सकती है।दरवाजें को खोलते ही माँ वही खड़ी मिली। यह तो बेहतर हुआ कि दवाजा भीतर खुलता था यदि कही बाहर खुलता तो निसंदेह माँ चोटिल हो जाती।वह अपने प्रति हिकारत से हंसी, तो उसका चेहरा अजीब-सा विकृत हो आया।

वह वैसे ही ठिठकी खड़ी रही उसे अब माँ के प्रश्नों का जवाब देने की सामर्थ आ गयी थी।माँ ने कुछ भी नहीं पूछा।अनायास माँ ने उसका हाँथ हलके से पकड़ा। वह उसे लेकर अपने साथ चौके के तरफ चली।वह अनमने ढंग से ही उसके साथ बिना किसी प्रतिरोष के चौके आ गयी।

वह चौके में बैठकर हवा में तक रही थी...कही वह उन लड़कियों में तो नहीं थी जिनका मन मर जाता है।जैसे कुछ लड़कियाँ पंखे पर अपना दुपट्टा बाँधकर लटक जाती है, हवा में झूलती रहती है।बर्बाद हो गयी जवानी से निजात पाने के लिए.अख्वारी न्यूज़ बन जाती है।स्थिर पंखे के नीचे झूलती रहती है ...सो जाती है।

"बेटा, खाना खाओ.।!" माँ उसे वात्सल्यमयी ममता से निहार रही थी। हाँलाकि उसकी आँखों में बेशुमार प्रश्न क्रोंध रहे थे।

तोषी चौबीस घंटे से ज्यादा हो गए थे, वह भूखी और प्यासी थी।वह सूनी खुली आँखों से खाने की तरफ देख रही थी जैसे यह खाना उसके लिए नही।अचानक वह कही से लौट आई.उसने बहुत धीमे से खाने की तरफ रुख लिया।माँ अब भी हिचक रही थी जैसे कुछ कहते हुए मुश्किल पड़ रही हो।

वह आँख मूंदे बैठी रहती है।अचानक एक लम्बी साँस खींची और झट से उठ खड़ी हुई.माँ उसका हाँथ पकड़कर खीचना चाहती थी, अपने पास बिठाना चाहती थी।परन्तु वह अपने कमरे की तरफ अग्रसर थी।वह धीरे से फुसफुसाई-

"क्या...तुम्हे वह अब अच्छे नहीं लगते?" तोषी ठिठक गयी।वह हलके से तिरछा होकर पलटी और सिर्फ अविश्वनीय नज़रों से देखा।

' मै, अब उसके पास नहीं जाउंगी।" उसकी आँखे गीली हो आई थीं।

"तू...नहीं जाएँगी...वह तो आ सकता है।" माँ की आँखों में प्रश्नाकुल विष्मय था।

"नहीं...मै उसे छोड़ आयीं हूँ।" यह कहते हुए वह पूरी तरह दृढ थी।

वह समझ रही थी कि माँ उसका पीछा करते टोह रही थी।वह बहुत कुछ जानना चाहती थी।परन्तु वह अनवरत दुःख रहे, रिस रहे घावों को पुनः खोलना नहीं चाहती थी।वह फिर अपने कमरे में चली आई थी...वह निस्पृह, निसहाय, निसंग और निरर्थक बन कर रह गयी थी।उधर बाबू जी ने अपने को बैठक में कैद कर लिया था, मानो उन्हें तोषी से कोई मतलब ही न हो।

लेकिन वह बाहर आई तो दरवाजें पर माँ को प्रतीक्षारत देखकर सिट-पिटा-सी गयी।दोनों ने एक दुसरे को देखा।वह दृष्टि जो एक दुसरे को पार भेदती चली जाती है।उसकी ओर देखा।उसे माँ पर तरस आया।उसका मन डोलने लगा और वापस कमरे में घुस गयी।पीछे पीछे माँ भी आ गयी और उसे निसंग भाव से देख रही हो जैसे कि वह कोई दूसरी औरत हो, घर की बेटी तोषी न हो?

उसने अपने को कमरे में बंद कर लिया था।मानो कमरे में वह नहीं उसकी छाया हो।वह बहुत अरक्षित महसूस कर रही थी।एक डेढ़ साल पहले वह इस घर को पराया करके चली गयी थी।सबके विरोध को दरकिनार करते हुए उसने भाग कर कबीर से शादी कर ली थी।मगर माँ-बाप का घर कभी भी पराया नहीं होता।उसने अपने को दिलाशा दिया।इस बात में विश्वास था भरोसा था।

वे पब्लिक लायब्रेरी में मिले थे।तोषी अपनी रिसर्च के सिलसिले में अक्सर वहाँ जाती रहती थी।कभी उसका पूरा दिन लग जाया करता।

वह आगे चली आई थी कोई किताब खोजने, अलमारियों के बीच।एकदम कोने की एक अलमारी में इच्छित किताब दिखी।वह काफी ऊचाई पर थी।उसने चारों तरफ टटोलती निगाह डाली, लेकिन कोई स्टूल अदि ना पाकर निराशा में उसी तरफ किताब पर टकटकी निगाह लगा कर देख रही थी।

अचानक एक हाथ लपका और उस किताब को एक झटके में खींच लिया।वह काफी लम्बा लड़का-सा लेकिन लड़का नहीं काफी बड़ा, साफ, गोरा झक्क सफ़ेद।उसे देखकर अचानक घबराहट-सी हुई.

"यही, चाहिए थी?" उसने पूछा।वह अब भी झिझक रही थी।उसकी आंखों में कुछ ऐसा था कि सामने खड़ा रहना असंभव था।वह फटाक से थैंक्स बोलकर वापिस अपनी चेयर पर आ गयी जहाँ वह बैठी थी।उसने जेब से रूमाल निकाला और पसीना पोछने लगी।सर्दी का पसीना डर, घबराहट और अप्रत्याशित आशंका से मिला जुला होता है।

वह उसे देख रहा था।सुंदर, सुशील, मनभावन और उसकी पसंद की लड़की।उसका सिर अपनी किताब पर झुका हुआ था।वह किताब के एक-एक पन्ने को पलटती परन्तु अव्यक्त निगाहों से उसे देखती और परखती जा रही थी। अब वह धीमे-धीमे चलता हुआ उसके पास चला आया, लगभग उसके सामने।वह उससे मित्रता करने से अपने को रोक नहीं सका।

'मै हूँ यहाँ का अस्सिस्टेंट लाइब्रेरियन कबीर।' उसने उसके पास बैठते हुए कहा।तोषी ने हकबकाकर अपनी आँखें ऊपर उठाई.

"जी! तोषी।" कुछ देर पहले घिर आया डर काफी हद तक कम हो चुका था।

'जानता हूँ।"वह अनुमान लगाने में मशगूल हो गयी कि वह उसे कैसे जानता है? ।" जब भी किसी किताब या अन्य सहायता की जरुरत हो आप बेहिचक हमसे कह सकती है।' उसने अपनी सहायता का हाथ बढ़ाया।

"नहीं...ऐसे ही...कोई खास नहीं...नहीं।क्या।जरुरत।? ।" वह हड़बड़हट में थी।उसका हाथ अब भी फैला हुआ था उससे मिलाने को बेताब।तोषी ने उसके बढे हाथ में अपना हाथ हड़बड़हट दे दिया, ठंडा और निर्जीव।उसका हाथ ठंडा हो आया था उसके हाथ के भीतर गर्म होने लगा।फिर कुछ देर तक यही परिचय का सिलसिला चलता रहा।अचानक तोषी ने अपना हाथ खीच लिया।

"आप, बैठे मैं अपने सीट पर जाता हूँ।"

"हाँ, यह ठीक रहेगा।मै यह किताब देख पाऊँगी और कुछ नोट भी कर पाऊँगी।" वह स्पष्ट बोलती है।उसने एक पल उसकी ओर देखा।झेप गया।और अपने केबिन में चला गया।

वह उसे अक्सर उसके केबिन में देखा करती थी, अपने कंप्यूटर से नज़रे लड़ाते हुए उससे उलझते हुए.उसका ध्यान कभी उस पर नहीं गया क्योकि उसे अपने रिसर्च के अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं थी।परन्तु वह कब से उसकी गतिबिधियों पर नज़र रखे हुए है, उसे मार्क करता रहा था, आज से पहले वह कभी भी जान नहीं पायी।

लायब्रेरी में वे अक्क्सर मिल जाते थे।कबीर का शुक्रवार को वीकली ऑफ रहता था।और तोषी ज्यादातर रविवार को नहीं आती थी।परन्तु वह हफ्ते के दो या तीन दिन जरुर आती थी।तोषी लायब्रेरी के एक एकांत कोने में बैठी रहती और-और किताबो के नोट्स लेती रहती थी।वह किताबों के बीच इतनी दत्तचित होती कि उसे वह जीती जागती गुड़िया नज़र आती।जब कई दिन निकल जाते और वह उसे देख नहीं पाता तो वह शुक्रवार को आकर उससे मिलता और उसके नोट्स बनाने में मदद करता।वह किताबों में लगाये गए निशानों के आधार पर अपने कम्प्यूटर प्रिंट आउट निकाल देता।

कबीर ने उससे अच्छी खासी दोस्ती गांठ ली थी।पहले एक दुसरे को अनजाने में छूतें और मन ही मन खुश होते।अब वे जानबूझकर छूने लगे थे और खुश होते रहते।कबीर अक्सर भटक जाता था परन्तु तोषी उसे हद में रखती थी।अब वह उसे नोट्स नहीं बनाने देता था बल्कि प्रिंटआउट निकाल के दे दिया करता बचे समय में वे साथ रहते और धीमे धीरे बात करते।

कुछ दिनों बाद।उसने कहा, "क्या हम बाहर नहीं मिल सकते?"

"क्यों...!" तोषी को बाहर का ख्याल आते ही जी घबराने लगता।

"इस तरह हम यहाँ कितना मिल सकते है?"

"नहीं...नहीं...यही ठीक है..." वह चुप रहा।उसने कभी सोचा नहीं था कि अब वह मना कर सकती है।उसने जल्दी से अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया।उसके स्पर्श में एक आश्वासन था, विश्वास था।उसकी नहीं पिघल कर बह गयी।तोषी का चेहरा हल्का-सा सुर्ख हो आया।बाहर मिलने के नाम से ही वह आतंकित हो जाती।लायब्रेरी के निपट अकेले स्थान में उसने उसे पहली बार चूमा था, और उसकी वह हरकत उसे बहुत नागवार गुजरी थी।उसने उसे हिकारत की दृष्टि से देखा और उसका चेह्ररा विकृत हो आया था।परन्तु वह उससे ज्यादा समय नाराज नहीं रह पाई थी।उसे हरदम शक रहता कि वह उसकी कमजोरी का फायदा ना उठा ले, क्योकि इसमें उसे सुख नहीं मिलता था।जिस दिन वह नहीं जाती पूछतांछ की घंटी बज जाती थी।

शुक्रवार का दिन था।उस दिन सर्दी ज्यादा थी।सुबह रिंग सुनाई दी।वह अलसाईं अभी तक बिस्तर में थी।वह समझ गयी।वे बाहर भी मिलने लगे थे।पार्कों में, सिनेमाहाल या माल्स में और निश्चय ही लायब्रेरी तो थी ही।उसने महसूस किया था कि वह बाहर ज्यादा सय्यत था।परन्तु वह हरदम ऐसे जगह का चुनाव करता था जहाँ तोषी से अकेले में मिल सके.

"हेल्लो।"

"यह मैं हूँ।" उसने बहुत मंद स्वर में कहा।

"कहिये!" वह धीरे से हंसी.

" आज, हुमायूँ के मकबरे पर मिलते है।क्या तुम वहाँ दो बजे तक आ सकती हो?

"सुनिए, आज मैं नहीं आ सकुंगी।" मैं दिन भर लायब्रेरी में रहूंगी।उसने धीमी आवाज में कहा।

"मुझे, तुमसे कुछ काम है। एक क्षण वह झिझका।-मुझे..." पर यहाँ वह चुप हो गया।शायद वह अपने काम कि बात बताने वाला था।

"लायब्रेरी में तुम किसी समय आ सकते हो।" उसने खिसियानी आवाज में कहा, "क्या कहा, काम? अभी तो कल कनाटप्लेस में मिले थे...मुझसे क्या काम हो सकता है?" वह सोचने लगी।

उस दिन विचित्र घटना हुई.वह लायब्रेरी में बैठी थी।अपनी किताबो और नोट्स बनाने में मशगूल।वह निश्चल खड़ा रहा जैसे गलत समय आ गया हो और वापस मुड़ना चाहता था कि उसने सिर उठाया तो वह दिखाई दिया।

"मैने तुम्हे डिस्टर्ब तो नहीं किया?" उसने कहा।

"नहीं।" वास्तव में वह खुद ऊब चुकी थी, लगातार पढ़ते लिखते।उसने सर हिलाया और जल्दी से अपने कागज समेत लिए जैसे वह उन्हें उससे बचाना चाहती हो।पर उसकी आँखे कबीर पर ही थीं।"क्या कुछ काम है?" उसमे उत्सुक्तता थी।उसने पूछा और मुस्कराने लगी।

वह थोड़ी देर असमंजस में रहा।परन्तु उसकी मुस्कराहट से उसे हौसला मिला।उसने उसे एक सादा सफ़ेद खुला लिफाफा रख दिया जिसके भीतर एक लैटर झांक रहा था।उसने तुरंत उसे पढ़ने के लिए लिफाफे से निकाला उसकी तरफ देखते हुए.लडके ने तुरंत उसके हाथ पर अपना हाथ छाप लिया।

"ठहरो...अभी नहीं। ईश्वर के लिए घर पर इत्मिनान से पढियेगा।" वह अब भी उसका हाथ छापे उस पर झुका खड़ा था।

"मुझे क्या करना होगा?" वह कभी अपने हाथ को देखती जो उसकी मुट्ठी में समाया था और कभी उसे।

"कुछ नहीं!" उसने कहा, "अगर आप इससे सहमत है तो उत्तर दीजियेगा।कोई जल्दी नहीं है।आप अपना समय ले सकती है।" अब उसने अपनी मुट्ठी खोल दी थी।

तोषी की आँखों में गहरा विस्मय झलक आया था और एक अनजाना डर भी।वह आजकल के समय के हिसाब से छोटी थी उसके आगे सारी उम्र पड़ी थी।उसका दिल धड़कने लगा था जैसे वह किसी बहुत नाजुक और कीमती चीज को पकड़े हुए हो।उसके छूने मात्र से इतनी घबराहट है, तो पढ़ने में कितनी होगी।

वे उठकर वापस अपने-अपने घरों में आ गए थें।इस बीच वे एक दुसरे से बोले नहीं थें।दोनों एक दुसरे के-के विषय में ही सोच रहे थे।परन्तु उनमे मौन पसरा था।

पर यह दूर की बात थी तोषी का सोचा कुछ नहीं था।बल्कि अद्भुत अविश्नीय अकल्पनीय उससे शादी का प्रस्ताव था।उसे स्वीकार या अस्वीकार करना था।वह कई दिनों तक प्रेम-प्यार, न्याय-अन्याय, सही-गलत, झूठ-सच, मान-अपमान, मान सम्मान के पचड़े में झूलती रही।तोषी को उसकी बात असंगत लगी किन्तु उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

उन्ही दिनों जोधा अकबर सीरियल दूरदर्शन पर आने लगा था।अनजाने ही सीरियल उसे अच्छा लगने लगा था। वह बड़ी लगन तन्मयता और चाव से उसे देखा करती।शायद ही कोई एपिसोड उससे छुटता था।पता नहीं क्यों उसे कबीर में अकबर नज़र आने लगा था।उसके बाते भी ऐसी ही होती थी धर्मो से परे मनुष्य और मानवता की।उसे लगता कि वह एक दुसरे के बगैर अपूर्ण है।वह एक ऐसा अवास्तविक तथ्य था जिसका उन दोनों से कोई वास्ता नहीं था।

कबीर के मन में उसकी उपेक्षित प्रतिक्रिया के बाद भी कोई निराशा, खीज या कटुता नहीं थी।वह वैसे ही मिलते रहे।वह एक दुसरे के आकर्षण में बधे थे। उसका व्यक्तित्व चुम्बकीय था।उसने उसे बताया था कि वह उसके प्यार में पागल है।यदि वह ना मिली तो या तो पागल हो जायेगा या आत्महत्या कर लेगा।

कुछ ही लमहों में यह मायावी क्षण टूट गया और वह फिर वापस अपने में लौट आई थी।उसकी खनखनाहट दिल की बेतरतीब धड़कन के तले दब गयी थी।वह टीस थी जो धडकनों के बीच एक फ़ांस की तरह रिसती थी।एक कुहाँसा-सा घिरने लगा था।

वह एक झटके से होश में आई.मन के जंगल में चलना कितना बीहड़ होता है।वह चुपचाप दम रोके बैठी रहती जैसे वह सो रही हो और सारी दुनिया से परे किसी और लोक में हो।शायद दु: स्वप्नलोक में, नहीं वह जग रही थी।

कबीर का अनुनय–विनय, उसका रूठना मनाना, उसका अहम् सब गायब हो गये थे।अब उसकी आवाज़ में आदेश होते थे।जितना वह अपनी तरफ खींचता वह इलास्टिक की तरह खींचती चली जाती परन्तु उसकी गंध में अपनी सुगंध एकसार होने के पहले ही खिचाव दम तोड़ देती और वापस अपनी जगह पर।वह उसी झूंठी गंध से घुलमिल नहीं पा रही थी जो प्यार का भुलावा देकर आती थी।उसका प्रेमी प्रेमिका रिश्ता जबसे पति पत्नी के रिश्ते में तब्दील हुआ, तबसे वह एक गिद्ध की तरह उसके मांस को नोच-नोच के खा रहा था और एक से एक, नए से नए जख्म दे रहा था।

हर बार वह लुटी पिटी दिखाई देती।वह अपने को दिलाशा देना चाहती है कि वह ऐसे नहीं है।किन्तु समय आने पर वह इतने आक्रामक हो जाते थे, पहले और अब में कोई तारतम्य नहीं बैठता था।वह मन ही मन इतनी भयभीत रहने लगी थी कि उसका कोई भी कदम उसे खुश कर पायेगा या नहीं, उसे संशय से भर देता था? वह अपने को भूल कर सिर्फ उसके खुसी तलाशने में जुट गयी थी।उसे संशय था। वह अपने संस्कारों की तिलांजलि देकर भी वह उसे खुश कर पायेगी? परन्तु उसमे बेहद बेताबी थी अपनी तरह कर लेने की।-

"यह कारवां चौथ का ढकोसला यहाँ नहीं चलेगा।" यह उस दिन शाम के सात बजे का समय था।उसने सब कुछ बिखरा दिया था लातों से।उसके बनाएँ देवी देवता।उसके अरमानो पर पानी फेर दिया।वह दिन भर की भूखी प्यासी अपना व्रत भी उसके हाथों ना तोड़ सकी।वह निकल गया था घर से बाहर।कहाँ? कुछ पता नहीं?

सुबह।वह भूखी प्यासी पड़ी थी।अधूरी अधलेटी सी, रोती-बिसूरती, जागी-जागी सी, सोई-सोई-सी सोफे पर पसरी थी।बाल खुलकर लुढ़क आए थे, सारी रात भर विरहिणी की तरह इंतज़ार करती रही।कबीर कब आया, उसे पता ना चल सका।

"तुम देखती नहीं, कितनी देर हो गयी है?" कबीर ने उलाहना दिया और हलके से मुस्कराया, जिसमे खुसी से ज्यादा बेचैनी थी..."अगली बार यह सब नहीं चलेगा? ...तोषी! यह सब..." उसने डरते हुए उसके बालों को सहलाया।कुछ देर तक उसकि अंगुलियाँ उसके बालों के जंगल में बिचरती रहीं फिर ठहर गयी।क्योकि तोषी ने अपनी मुट्ठी में उन्हें भींच लिया था।वह उठ खड़ी हुई.दिन के उजाले में उसका रंग जो सफ़ेद चमकीला था अब धूमिल पड़ चुका था।

कितनी देर वह ऐसे ही रहा।फिर वह सतर्क हो गया।वह उसे कोई आभास नहीं देना चाहता था जिससे यह प्रतीत हो कि उसे अपने कृत्य पर अफ्सोस है।सम्वेदनशीलता के अभाव और मनुष्य होने की पहचान उसने खो दी थी।परन्तु उसने उम्मीद नहीं खोयी थी अपने रंग में रंग लेने की।

दोपहर की नींद हलके फुल्के झोकों से भरी होती है।आभास होना मुश्किल होता है कि जग रहे है कि सो रहे है...तोषी अकबका कर जग गयी।पसीने की बूंदें सब जगह चिपक गयी थीं।शायद गर्मी से जगी होगी।उसने ऊपर देखा पंखा खाली लटका पड़ा था, कुछ हिल डुल भी नहीं रहा था।बिजली चली गयी थी।पसीने से उसके बाल चिपक गए थे।उसने पानी से अपना मुंह धोया ही था कि माँ की आवाज सुनाई पड़ी।

"तोषी देख, बाबू जी क्या कर रहे है? अभी तक खाने के लिए नहीं आये, जा उंहें बुला ला।वे खाए तो मुझे खाने को मिले।" कैसे माँ सबका ध्यान रख पाती है?

तोषी के पांव आगे बढ़े, बाबूजी को बुलाने के लिए.सुन उन्होंने भी लिया था। परन्तु कुछ ना कहकर चुप बैठे थे।उनमे सहज, स्वाभविक बाप बेटी का सम्बन्ध जो था उसे ग्रहण लग चुका था।जबसे तोषी मिस तृषिता अवस्थी से अपनी मन मर्जी से मिसेस तृषिता खान बन गयी थीं।वह दोनों दो सीधी सामानांतर रेखाओं में परवर्तित हो गए थे।उन दोनों के बीच आई दरार तोषी के वापस घर आ जाने के बाद भी भर नहीं पायी थी।अलबत्ता माँ जरुर उन दोनों के बीच खुदी खाई को पाटने का भरसक प्रयास किया करती थीं।माँ वह पात्र बनकर उभर रही थी जो दोनों किनारों को मिलाने का प्रयास इन्हीं छोटी-छोटी बातों से किया करती थीं।उस खाई में दलदल थी जिसमे कोई गिरना नहीं चाहता था क्योकि फिर सम्बंधों का रहा सहा ताना बाना भी टूट जायेगा।बाप बेटी के बीच अकथनीय प्यार, ममता, स्नेह के बावजूद उसकी कबीर से असफल प्रेम विवाह की परिणिति ने उन्हें हिला कर रख दिया था।

तोषी बाबू जी के कमरे आकर ठिठक गयी।कुछ देर तक दरवाजे पर मौन खड़ी रही।उन्होंने देख लिया था और बिना उसके कहे खाने के लिए चल दिए थे।

जब से वह कबीर के पास से आई है एक निर्भेद मौन जो सारे घर में छाया है उसे कभी-कभी माँ की आवाज ही तोड़ती है।घर से उठती आवाजें पराई, अपरचित और भयावह जान पड़ती थी।

उसके कमरे में सब कुछ है, टी.वी., कम्प्यूटर, लैपटॉप, ऑडियो-वीडियो और ढेर सारी किताबे परन्तु सब धूल खा रहे थें।उसका मोबाइल बिना आवाज किये चलता रहता था, कभी कोई रिंग नहीं आती थी और जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था।वह एक स्पन्दन्हीन काला कीड़ा बनकर रह गया था, अपनी मालकिन की तरह।एक बार बाबू जी ने उसके सामने माँ के माध्यम से उसकी किसी विद्यालय में टीचरी का प्रस्ताव रखा था जिसे उसने नकार दिया था।उसे किसी से दिलचस्पी नहीं थी।सूनी सूनी आँखों से सब कुछ देखती और निरपेक्ष्य भाव से उपेक्षित कर देती।अभी पच्चीस की ही हुई थी कि उसने सारी दुनिया देख ली थी।वह अपने से बेजार नज़र आती थी।वह किसी भी छोटे बड़े जेंट्स को देखकर घबरा जाती थी।

ऊँघती हुई तोषी को अचानक माँ की आवाज सुनाई पड़ी।ख्खारती हुई आवाज़ जैसे नीरसता भंग करने को सप्रयास की गयी हो।

"कुछ दिनों के लिए कोई धार्मिक स्थान चलते है, हरिद्वार-ऋषिकेश या फिर घुमने फिरने को किसी हिल स्टेशन।क्यों बाबू जी? तोषी का मन बदल जायेगा।दिन रात अकेले पड़े-पड़े क्या बोर नहीं हो जाती होगी?" बाबूजी कोई उत्तर नहीं देते।एक नज़र माँ पर डाल कर और दूसरी नज़र तोषी पर डाल कर चुपचाप अपने कमरे में चले जाते है।उसे भी माँ पर ताज्जुब होता है। उसे याद नहीं आता है कभी माँ ने कोई मांग रखी हो।

शुरू में वह कबीर के साथ घुमती थी।प्रेमप्रसंग के दौरान और विवाहोपरांत भी।परन्तु शनैः, शनैः यह सिलसिला धीमा पड़ता चला गया।और बाद के दिनों में तो यह बिलकुल समाप्त हो गया था।अकेले तो जाना जबसे बंद हो गया जबसे उसकी नौकरी छुटवा दी गयी यह कहकर कि इसकी क्या जरुरत है।फिर प्रेमिका पत्नी घर में बैठकर पति के ऑफिस से आने का इंतजार करें उससे बड़ा सुख कोई नहीं है, दोनों के लिए.प्रतीक्षा बड़ी ही आनंददायक वस्तु होती है।फिर बीबी के हाथ का खाने का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।उसने काफी विरोध किया उसे पुराने कसमे वादें याद दिलाये परन्तु सब कुछ निरर्थक रहा।उसने प्यार और शादी को बचाए रखने के लिए यह भी किया।

शाम होते ही वह उसकी याद में घिर जाती और आँखे अनायास ही खिड़की की ओर जम जाती कि कबीर आयेगा और वह दोनों पुराने दिनों की तरह प्रेमी प्रेमिका की तरह घूमेंगे-फिरेंगे सिनेमा-पिक्चर देखेगे परन्तु यह भी ना हो सका।वह आता और प्रेम प्रदर्शन किये या ना किये थकावट से चूर दिखता और सोफे या बिस्तेर में ढेर हो जाता जैसे ढेरों काम किया हो।छुट्टी के दिनों में उसे अक्सर कोई ना कोई काम पड़ जाता था नहीं तो बड़ा निरुत्साहित होकर जाता जैसे कोई गुनाह कर रहा हो।

शाम को बाबूजी अक्सर बैठक में तैयार होकर बैठते थे। क्योकि शाम के समय उनके मित्र मिलने आते थे, बतकही करने। उंसे बातचीत में भी बाबू जी को कभी हंसते या मुस्कराते नहीं देखा था।उनकी हंसी खुसी समाप्त हो चुकी थी।जब कभी बाबूजी के मित्र नहीं आते और वे अकेले होते, तो वह एकदम गंभीर मुद्रा में होते और अक्सर सोचते विचारते रहते थे।उन क्षणों में तोषी सोचती वह बाबूजी के पास जाये कुछ इधर उधर की बाते करे अपना और उनका अकेलापन दूर करे।परन्तु लाख प्रयाश के बाद भी उसके पाँव नहीं उठते, सिर्फ दूर से ही उन्हें देखती रहती।उनका दुःख और अपना दुःख एक से होते लगते और आपस में उलझते, उमड़ते घुमड़ते चुपचाप देखती और महसूस करती।

उसकी शादी के तुरंत बाद ईद पड़ी थी।वह कबीर के साथ उसके घर मुरादाबाद गयी थी।त्यौहार उसने सबके साथ जोशो-खरोश और अत्यधिक प्रसन्नता से मनाया था।उसने सभी विधिविधान का पालन किया था जैसा कि अम्मी ने बताया था।सब खुस थे वह भी खुस थी।

वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी, उसकी रोजमर्या की प्रेम भरी जिंदगी से परे कबीर की कोई अलग जिंदगी की राह थी जिसमे वह सतत संघर्षशील आगे बढेगा और उसे मजबूर करेंगा, उस तरह चलने को...जिससे उसकी अस्मिता को निरंतर गहरा अघात लगेगा और वह उसे समझौताविहीन कर देगा।

दीपावली की छुट्टियो में वह मुरादाबाद नहीं गये।क्योकि उसके घर में यह त्यौहार मनाया नहीं जाता।उसने यही दिल्ली में कबीर के साथ मनाने की सोची।यह कबीर भी अजीब है उसने इस के प्रति कोई रूचि नहीं दिखाई न ही किसी प्रकार का सहयोग किया।वह खुद जाकर बाज़ार से सारा समान खरीद लायी।उसने बड़े चाव से बहुत ही ख़ूबसूरत लक्ष्मी-गणेश कि मूर्ति खरीदी।उन्हें ससम्मान स्थापित किया और समयानुसार उनकी पूजा अर्चना की।उसने कबीर से भी ऐसा करने को कहा।उसने विकृत-सा मुंह बनाया और इस त्यौहार का बुरी तरह मजाक उड़ाया।

"इस पूजा से क्या होगा? यह तो सारा भारतवर्ष कर-कर रहा है।तो क्या सारा भारत धनवान हो जायेगा? ... अभी तक तो हुआ नहीं...तो लक्ष्मी सभी को धनवान बना देंगी? ...फिर भारत में इतनी गरीबी भुखमरी क्यों है? ...आखिर में इनकी पूजा तो अमीर गरीब सभी करते है फिर तो सबको रहीस हो जाना चाहिए.वास्तव में यह त्यौहार अमीरों को और अमीर तथा गरीबों को और गरीब बनाता है।भ्रष्टाचार और गरीबी में गहरा सम्बन्ध है।जहाँ लुक्षमी पूजा होगी वही भ्रष्टाचार होगा।" उसका लम्बा, तीखा, झुझलाया और उसे प्रताणित करने वाला भाषण तीब्र आवाज में गूंज रहा था वह तो और भी जारी रहता कि अचानक तोषी चीख उठी थी।

"चुप रहो...! भगवान के वास्ते चुप हो जाओ" और उसने अपने कानों में हाथ रख लिए.वह अवाक् हतप्रभ देखती रह गयी।उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे और वह निष्ठुरता से हंस रहा था।उसका इतना बड़ा त्यौहार नष्ट-भ्रष्ट हो गया था।

अक्सर कहा गया है कि प्रेम में कोई दुराव-छिपाव नहीं होता है।वह आईने की तरह साफ़ होता है।परन्तु उसके साथ ऐसा नहीं था। पहले के कबीर और आज के कबीर में स्पष्ट अंतर था।प्रेम करने का अर्थ आजकल के समय में बदल गया है।अब प्रेम करने का अर्थ अपने को खोलना ही नहीं बल्कि बहुत कुछ अपने को छिपाना भी है। खोलना छिपाना उतना ही जितना आवश्यक हो, प्रेम पनपाने में और एक दुसरे को कब्जाने में। यह पृवत्ति आदमी में अपेक्षा से अधिक होती है।

उस दिन कुछ अधिक ही विचित्र हुआ था।तोषी को वही नाम याद है, बकरीद। जो कॉकरोच से डर जाया करती है, उसे यह बड़ा यह विचित्र लगता है किसी को मार दिया जाय।फिर सहसा उसकी आँखें आतंकग्रस्त हो गयी जब उसने देखा सुबह मंहगे दामों में खरीद कर लाया गया बकरा शाम को होते-होते गायब था।जब तक आप किसी को मरते न देख ले आपको विश्वास नहीं होता है कि अब वह जीवित नहीं है।परन्तु डिनर टेबल पर सबके साथ उसे भी वही परोस दिया गया तो उसे उलटी हो आई.

वे सब गुस्से में थे।फुफकारती-सी आवाज में सब चिल्ला पड़े।"हटाओ हटाओ इसे यहाँ से दूर करो!" और सब अप्रत्याशित रूप से कबीर और उस पर-पर बरस पड़े।

"इस बदजात ने सारा मजा किरकिरा कर दिया।" अब्बा गरजे.

कबीर उसकी तरफ लपका।हड़बड़ाहट में वह उठी और कुर्सी से गिर पड़ी।वह उसका हाथ पकड़ कर घसीटता है।उसने झटके से अपने को छूटा लिया और अपने कमरे में चली जाती है।

यही नहीं कमरे में हद हो गयी।जब अप्रत्याशित रूप से कबीर उसके लिए वही मीट के शोरबे के साथ रोटियाँ ले आ आया उसके खाने के लिए.

"तोषी! इस शोरबे के साथ रोटी खाने में कोई हर्ज नहीं है।आखिर सुबह से भूखी प्यासी बैठी हो।" उसने पुचकारते हुए कहा।

"नहीं...नहीं..." वह बिफर पड़ी, "तुम नशे में हो...? पागल हो...?"

कबीर जबरदस्ती उसे शोरबा पिलाने की कोशिश करता है।वह विक्षिप्त होकर उस पर टूट पड़ती है।वह इस पर विश्वास नहीं कर सका।इस बार वह एकदम से भभक उठा।उसने उसे एक बहुत ही भद्दी गाली दी और उसे बेहद बेहूदा ढंग से पीटने लगा।वह काँप रही थी और भयग्रस्त आँखों से उसे देखती है और बिना किसी प्रतिरोध के पिटती रहती है।

वह कुछ देर उसे घूरता रहा जब उसे यकीन हो गया कि उसने उसे पूर्णरूप से लुंज-पुंज कर परास्त कर लिया है तो वह उसे छोड़कर चल दिया।

उसे अपने पर कोई नियंत्रण नहीं रहा था।घनीभूत पीड़ा की लहर उसके हर अंग से उठ रही थी।उसके शरीर में कई जगह से खून के धब्बे थे।सारा शरीर नील और खून के धब्बों से अटा पड़ा था...एक टूटती साँस...और अँधेरा।वह संज्ञाहीन कब तक ऐसे ही पड़ी रही उसे होश नहीं था।वह आकारहीन हो गयी थी।सिर्फ चेतना थी।एक उत्कट भयंकर आकांक्षा थी यहाँ से जाने की।वह अपने को समेटती है।उसकी टांगों में, बाँहों में, छाती में और सिर में भयानक दर्द है।

कितनी देर ऐसे ही रहा।फिर वह सतर्क हो गयी।सब सो रहे थे।वह वैसे ही बाहर सड़क पर आ गयी, किसी तरह अपने को घसीटते हुए.वह स्टेशन आ गयी थी।टिकेट खरीद कर उसने अपने को कुछ हद तक ठीक किया।

वह दिल्ली आ गयी थी।

कभी कभी आकर्षक इतना जानलेवा होता है कि हम उसमें अजगर के गुंजलक के तरह फस जाते है।चुम्बकीय, मंत्रमुग्ध करने वाला। हम मूर्छित से उसके आगोश में लपटते चले जाते है, जब तक उसके गाल में समां नहीं जाते।कबीर से वह ऐसे ही लिपटती चली गयी थी एकदम सहज भाव से।उस समय उसके सेक्युलर विचार उसके धार्मिक विचारों को रौदते चले गए थे।हाँलाकि वह अनिश्चित और कमजोर लहजे में उसका प्रतिवाद किया करती थी परन्तु वह उसमे स्मोहित होती चली गयी।यह क्रिया इतनी स्वाभाविक ढंग से उसमे प्रवेश कर रही थी कि वह शब्दहीन हो गयी थी।

वह उसके प्रति आतुर और विह्वल थी।

अब उसे उस दिन, उस घटना के बाद ही उससे जबरदस्त विकर्षण पैदा हो गया।एक ऐसा विकर्षण जो उसमे नफरत और घृणा भर रहा था।वह बहुत चाहती थी वह उसके प्रति तटस्थ और उदासीन बन जाये परन्तु ऐसा नहीं हो सका। वह उससे सदैव के लिए छुटकारा चाहती थी ऐसे जैसे वह उसकी जिंदगी में आया ही न हो।एक दम अनजान अपरचित ठूंठ सा।उसे लगा था कि वह ज्यादा दिन रही तो उसकी जिंदगी की स्लेट पूरी तरह साफ़ हो जाएगी और एक अन्य ईमारत लिखी जाएगी।स्लेट उसकी होगी और लेखक होगा कबीर।उसे जीवन की पच्चीस साला खड़ी खूबसूरत ईमारत को ढहने से बचाना था।अपने अस्तित्व को धूलधूसरित होने से बचाना था।पुराणी नीव खोद कर नयी बुनियाद डालने के कबीर के कुत्सित प्रयास को रोकना था।

वहाँ से आने के बाद, आज तक कई बार आत्महत्या के विषय में सोचती रही थी।कभी कभी वह सोचती है कि यदि उसे कबीर या उसके घर वालें आने ना देते तो शर्तिया वह आत्महत्या कर लेती।कभी यह अजीब-सा विचार तंग करने लगत कि यदि उसे बाबूजी या माँ वापस न स्वीकारती तो अवश्य ही वह यह कोशिश यहाँ करती।उसे कभी-कभी लगता कि वह जीवित तो है परन्तु मरने की सीमा तक।मर भी नहीं रही है और जिन्दा भी नहीं है।

उसे लगता था कि वे एक सुखी दम्पति बनेगे, क्योकि वह एक दुसरे को बहुत चाहते है।उस समय तोषी को लगता था कि कबीर दुनिया का सबसे अच्छा लड़का है, यह नहीं तो कोई नहीं।उस समय उसकि आंखों में एक गहरा विष्मय छलकता रहता था और एक दबा-दबा-सा डर भी कि कोई इतना अच्छा भी हो सकता है? यह उसी किस्म का डर था जैसे कोई नाजुक कीमती चीज पकड़े रहने पर होती है कि कही यह छूटकर, गिरकर टूट ना जाएँ।वह उसे कसकर जकड़े रहना चाहती थी।

उसे लगता है कि प्रेम या प्यार सिर्फ एक दिखावा है, एक दुसरे के प्रति या एक दुसरे को प्रभावित करने का शगल।कभी कभी उसे लगता कि प्रेम बहुत महत्त्वपूर्ण वाकया है जो महत्त्वपूर्ण कारणों से समाप्त भी हो जाता है।प्रेम का उत्थान और प्रस्थान ज्वार-भाटा की तरह है।पुरुष के लिए आवेग और स्त्री के लिए भावना जो समयानुसार बदलता रहता है।

काफी लम्बे अन्तराल के बाद भी, न कबीर आया न उसका कोई फ़ोन कॉल या कोई पत्र आदि।वह समझता है कि वह घर परिवार और समाज से ब्रहिस्कृति हो चुकी है। अब कौन उसको अंगीकार करेंगा? विकल्पहीनता की स्थिति में उसे देर सबेर लौट ही आना है।उसके लिए कबीर का कोई विकल्प नहीं है।

चैन की एक साँस लेने के लिए स्त्री अपने एकांत को चुनती है, सम्वाद करती है, निर्णय लेती है।तोषी ने एकांत चुना।

वर्षों बाद आज माँ, बाबूजी और वह इकट्ठे कही साथ चले है।वे फॅमिली कोर्ट में थे।वे कबीर से विवाह विच्छेद हेतु थे।आज अंतिम सुनवाई है।वह भी आया था।वह एकटक उसे देखती है परन्तु वह नज़रे बचा रहा है।तोषी का चेहरा पत्थर की तरह भावहीन और निश्चेष्ट था।वह जानती है जिसे वह सच्चे दिल से चाहती थी आज उसने मजबूर कर दिया था उससे किनारा करने को।उसने उसकी चाहतों, कामनाओं, समर्पित प्यार और अस्मिता की धज्जियाँ उड़ा दी है।

तोषी आज फिर आई थी।एक बार तब आई जब उसे कबीर से मैरिज करनी थी, कोर्ट मैरिज।उसे अच्छी तरह याद है वह दिन।उसके साथ चार गवाह या दोस्त थे और वह निपट अकेली थी।उसका अपना कोई नहीं था।वह कातरता की मूर्ति थी।उसे अपना यह अभियान पूर्णरूपेण गुप्त रखना था जबकि उसके घर के और सभी परिचितों को जानकारी थी।मजिस्ट्रेट के आते ही सारी औपचारिकताएँ पूर्ण की गयी।रजिस्टर में तृषिता अवस्थी और कबीर खान के दस्खत के साथ, चारों गवाहों के दस्स्खत के साथ ही विवाह संपन्न हो गया।कबीर का कोई दोस्त दो माला और मिठाई ले आया था।वर वधु ने एक दुसरे के गले में फूलों के मालाएँ पहनाई. लोगों ने मिठाई खायी और दोनों को बधाई दी।मिनटों में विवाह संपन्न हो गया।

तुरंत-फुरंत तोषी कबीर सीधे मुरादाबाद प्रस्थान कर गये।

समय के अन्तराल पर आज वही कोर्ट रूम था, वही मजिस्ट्रेट, वही क्लर्क वही वर वधु।सिर्फ कारण बदला था।पहले विवाह था अब तलाक।गवाह की जगह दोनों के अपने थे, अम्मी-अब्बू और माँ-बाबूजी.उस कमरे में घुसते ही तोषी का चेहरा पीला पड़ गया। वह हतबुद्धि-सी कोर्ट रूम को देख रही थी। वह गुमसुम-सी निस्तब्ध, हवा में उड़ती बदलती परस्थितियाँ देख रही थी।

कबीर आश्चर्य से भरा यकीन नहीं कर पा रहा था कि ऐसा भी हो सकता है! आज उसे पता नहीं क्यों यह अहसास हो रहा था-कौन लड़की अपनी इच्छा से उस लड़के को छोड़ेगी जिसे वह तहे दिल से चाहती हो, जबकि वह मजबूर न हो जाएँ! बशर्ते वह पागल या सनकी न हो।सबकी जिंदगी में यह क्षण आता है जब मन यह फैसला कर लेता है कि एनफ इज एनफ, अब और नहीं और जिंदगी ख़तम हो जाती है।

कोर्ट का वह प्यार भरा कमरा, उस क्लर्क की मुस्कराहट और मजिस्ट्रेट की कार्य संतुष्टि की अभिव्यक्ति।आज बदलकर अजीब भयानक कमरा, क्लर्क की मनहूस मुस्कराहट और मजिस्ट्रेट की व्यंग्यात्मक विस्मय संवेदना भरा कार्य।सबको हैरानी थी कैसे?

तलाक के कोर्ट आर्डर होते ही एक क्षण के लिए सब कुछ ठहर-सा गया।किन्तु दुसरे ही क्षण सब उस कोर्ट रूम से बाहर आ रहे थे फुसफुसाते हुए, भिनभिनाते हुए.कबीर की आँखें सुर्ख थीं, क्रोध और अपमान से।निश्चय ही उसके लिए यह अकल्पनीय और अविश्वनीय था।तोषी की आँखों में अजीब-सी तसल्ली थी।