विद्रोही के चरणों पर / जनार्दन प्रसाद झा

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आप चुप क्यों हो मन्त्री जी?'

'उत्तर सोच रहा हूँ श्रीमन्'

'उत्तर सोचना भी अभी बाकी ही था,' राजा ने कुछ उदास होकर पूछा--'मालूम होता है आप इससे सहमत नहीं हैं, क्यों?'

'मेरा यह चुप रहना असहमति का सूचक नहीं है श्रीमन्,' मन्त्री ने हाथ जोड़ कर बड़ी दीनता से उत्तर दिया--'मैं अपने को इतने बड़े सौभाग्य का विद्रोही नहीं बना सकता।'

'फिर बात क्या है?'

'केवल यही कि न जाने क्यों मैं इसे एक सपना सा समझ रहा हूँ।'

'आपका आशय ठीक-ठीक मेरी समझ में नहीं आ रहा है। क्या आपके कहने का मतलब यह है कि मेरी इस बात पर आप अपना विश्वास नहीं टिका सकते?'

'नहीं श्रीमन्' मन्त्री ने उसी तरह नम्र होकर जवाब दिया-'आपकी इस बात पर नहीं, अपने इतने बड़े सौभाग्य पर...मैं अब भी समझ रहा हूँ कि राजकुमारी शीलादेवी को अपनी पुत्र-वधू बनाने वाला भाग्यशाली पुरुष मेरे जैसा नहीं हुआ करता। इसी से आपकी दी हुई यह अयाचित कृपा भीख, राज-सम्मान की यह महिमामयी माधुरी मुझे आनन्द-विभोर और विस्मय-विमुग्ध बनाए जा रही है। मैं समझ नहीं रहा हूँ, इस अवसर पर मुझे आपकी सेवा में क्या निवेदन करना चाहिए।'

अपने मन्त्री की इस विनयशीलता पर प्रसन्न होकर राजा ने कहा -- 'वैभव की विषमता ही सब कुछ नहीं है मन्त्री जी, और-और बातें भी ध्यान में लाई जानी चाहिए। कुँवर कमलेन्द्र जैसा रूपवान, गुणवान और विद्वान पुत्र पाकर कोई भी पिता अपने को उस वैभवशाली सम्राट से बढ़ कर भाग्यवान समझ सकता है, जिसके भाग्य में बेटे का मुँह देखना बदा ही न हो।'

राजा की अन्तिम वाणी में एक अभाव-जन्य वेदना की करुण अभिव्यक्ति थी, अपमान की ज्वाला में झुलसते हुए हृदय की एक मार्मिक पुकार थी। मन्त्री ने उसको सुना और समझा। राजा का वह कारुणिक संकेत किसी की सहानुभूति और सान्त्वना की भीख माँग रहा था। मन्त्री का हृदय द्रवीभूत हो गया। आर्द्रवाणी में उसने कहा -- 'स्वामिन्, करुणेन्द्र आपके पुत्र हैं और शीला मेरी पुत्री, आपकी जो आज्ञा होगी, यह दास सिर झुका कर उसका पालन करेगा।'

'इस विनिमय से मुझे बड़ा ही सुख मिल रहा है मन्त्री जी...' राजा ने एक प्रकार का कृतज्ञता-ज्ञापन का भाव दिखलाते हुए कहा--'यदि मेरा अनुमान गलत नहीं है तो मै आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि राजकुमारी शीला और कुँवर करुणेन्द्र एक-दूसरे को चाहते भी बहुत हैं। राजकुमारी की माँ भी इस विवाह-सम्बन्ध के लिए बहुत लालायित हो रही हैं। वे किसी राजघराने में अपनी बेटी का ब्याह नहीं करना चाहतीं, उनकी आँखों में आपके कुँवर साहब समा गए हैं। इन्हीं बातों पर विचार करते हुए मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि राजकुमारी को आप अपनी पुत्र-वधू के नाते अंगीकार करने की कृपा करें। वर-कन्या दोनों ही को अपनी-अपनी रुचि की चीज मिल जाएगी। वे लोग सदैव सुखी रहेंगे और उनके सहयोग से दिनोंदिन यह राज्य समृद्धिशाली होता जाएगा।'

'मुझे अपने इस सौभाग्य पर गर्व हो रहा है प्रभो...' मन्त्री ने गदगद होकर कहा -- 'परमात्मा आपकी यह इच्छा शीघ्र ही पूरी करें -- वह दिन शीघ्र ही आवे जब राजकुमारी की रूप-किरणों से मैं अपनी वैभवहीन कुटिया को जगमगाती हुई देखूँ।'

राजा कुछ बोलने ही वाले थे कि नौकर ने आकर निवेदन किया -- 'कुँवर साहब बहुत देर से बाहर खड़े हैं, श्रीमान् से मिलने की आज्ञा चाहते हैं।'

'आदरपूर्वक उन्हें यहाँ लिवा लाओ...' कह कर राजा ने नौकर को विदा किया और मन्त्री की ओर देख कर चकित भाव से पूछा -- 'बात क्या है? इस समय उन्हें मुझसे मिलने की कौन सी जरूरत आ पड़ी?'

'कह नहीं सकता श्रीमन्...' कहकर मन्त्री ने सिर झुका लिया। उनका हृदय धड़क रहा था।

'कहिए कुँवर साहब...अरे, आज तुम्हारा चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है बेटा?' कुँवर करुणेन्द्र के पहुँचते ही राजा ने प्यार के शब्दों में उतावली से पूछा।

'आप यदि इस महल से बाहर निकल कर एक बार अपने राज्य में घूमने का कष्ट करें...' कुँवर करुणेन्द्र ने निर्भीक भाव से अपनी काँपती हुई वाणी में उत्तर दिया --'तो आप देख सकेंगे कि आपके सुव्यवस्थित शासन ने कितने चेहरों की नूर लूट ली है। मेरा चेहरा तो सौभाग्यवश आपको केवल उतरा हुआ ही नज़र आता है, किन्तु औरों के चेहरे पर तो आपको धधकती हुई चिताएँ भी दीख पड़ेंगी। आप देखेंगे कि आपकी प्रजा के वे दमकते हुए मुख-प्रदेश आज श्मशान की तरह काले और भयंकर हो रहे हैं।'

मन्त्री की आँखों के आगे अन्धेरा छा गया। वे उसी तरह चुपचाप सिर झुकाए बैठे रहे।

राजा ने इन बातों का मर्म जान कर भी अनजान की तरह मन्त्री से पूछा -- 'पता नहीं, कुँवर साहब क्या-क्या कह गए...आप कुछ समझ सके मन्त्री जी?'

'क्षमा कीजिएगा श्रीमन्...' मन्त्री के कुछ कहने से पहले ही मन्त्री-पुत्र ने कहा --'मैं आज आपकी सेवा में कुँवर के नाते नहीं आया, आज मैं एक साधारण प्रजा के नाते, उन अभागों के अपार कष्टों का सन्देशा लेकर आपके आगे खड़ा हूँ, जिनका खून चूस-चूस कर राज-कर्मचारी मोटे हुए जा रहे हैं, जिनकी गाढ़ी कमाई से आपका राजकोष भरा जा रहा है, जिनकी आकांक्षाएँ और आवश्यकताएँ उपेक्षा और अत्याचार के चरणों से कुचली जा रही हैं, जो आप लोगों को खिलाकर स्वयं भूखों मर रहे हैं और जिनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि मेरी ये बातें आप और आपके मन्त्री महोदय खूब अच्छी तरह समझ रहे हैं। मैं इनके उत्तर में सन्तोष की झलक देखना चाहता हूँ।'

युवक की इस निर्भीक गर्जना से राजप्रासाद का वह कमरा गूँज उठा। मालूम होता था, उसकी दीवारें काँप रही हों। मन्त्री के बोलने की शक्ति जैसी किसी ने छीन ली। अपनी शिकायत सुन कर राजा का अहंकार सजग हो उठा। उन्होंने दर्प के साथ अपने स्वर को कुछ कठोर बना कर कहा -- 'तुमसे इस प्रकार की धृष्टताभरी बातें सुनकर मुझे क्रोध आ रहा है कुँवर... मैं तुम्हें अपने पुत्र की तरह अपना चुका हूँ, इसीलिए इस उभड़े हुए क्रोध पर मुझे शासन करना पड़ रहा है। और कोई होता तो उसे दिखला देता कि मेरी राज-व्यवस्था की झूठी निन्दा करने का परिणाम कितना भयंकर हुआ करता है।'

'किन्तु मैं कोई झूठी निन्दा नहीं कर रहा हूँ...' करुणेन्द्र ने दृढ़ता के साथ कहा--'जो कुछ कह रहा हूँ उसका एक-एक अक्षर सत्य है, वह सत्य जिसे आप जान कर भी नहीं जानते और जिसके लिए मेरा नम्र निवेदन है कि आप उसे जानें -- और शीघ्र ही जानें -- नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।'

'सहनशीलता की भी एक सीमा होती है करुणेन्द्र...' राजा ने क्रोध से तमतमाते हुए चेहरे पर रोष चढा कर कहा -- 'मुझे भय है, अब मैं तुम्हारी ये विद्रोह-पूर्ण बातें शान्ति और धैर्य के साथ न सुन सकूँगा। अतएव आशा करता हूँ, इसके आगे अगर तुम्हें कुछ बोलना हो, तो होश में आकर, बड़ी सावधानी के साथ, शब्दों का उच्चारण करना, नहीं तो अनर्थ की पहली भेंट तुम्हारे ही साथ होगी।'

'इसके लिए तो मैं सब तरह से तैयार होकर आया हूँ श्रीमन्...' कुँवर साहब ने बड़ी गम्भीरता के साथ जवाब दिया -- 'और आपको यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि इस समय, जब मैं आपके साथ बातें कर रहा हूँ, मेरा होश मेरे साथ है। मैं बड़ी सावधानी के साथ अपने शब्दों को सँभाल-सँभाल कर आपके आगे रख रहा हूँ, जिससे सत्य का असली रूप आपकी आँखों के सामने आ जाय।'

'बस बहुत हो चुका...' राजा ने जोर से कड़कते हुए कहा -- 'मैं इस सम्बन्ध में अब कुछ नहीं सुनना चाहता। आज न जाने तुम क्यों इस तरह बढ़-चढ़ कर बातें कर रहे हो? मैं तुम्हें जैसा समझता था, तुम ठीक उसके विपरीत निकले। तुम क्या जानो राज्य की शासन-व्यवस्था किस चिड़िया का नाम है? मालूम होता है, किसी राज-विद्रोही ने तुम्हें भड़का दिया है। याद कर लो, ये सब विनाश के लक्षण हैं।'

'हाँ भगवन्...' युवक ने उत्तर दिया -- 'मैं भी तो यही निवेदन कर रहा हूँ कि ये सब (राज के) विनाश के लक्षण हैं, आपको इन्हें दूर करने का उचित उपाय सोचना चाहिए।'

क्रोध की भभकती हुई ज्वाला ने राजा की नस-नस में आग लगा दी। भूखे शेर की तरह गुर्राते हुए उन्होंने कहा -- 'तुम इसी समय मेरे सामने से हट जाओ। तुम्हारी सूरत से मुझे घृणा हो गई है। अभी एक क्षण पहले मैं राजकुमारी के साथ तुम्हारे विवाह की बात सोच रहा था, किन्तु अब देखता हूँ तुम्हारे लिए, जहाँ तक जल्दी हो सके, मुझे हथकड़ियों और बेड़ियों का प्रबन्ध करना पड़ेगा।'

'राजकुमारी के साथ मेरा ब्याह कराके...' कुँवर साहब ने वीर-दर्प के साथ उत्तर दिया -- 'अथवा मुझे अपने राज्य का अधिकारी बना कर आप वह सुख और शान्ति नहीं पा सकेंगे स्वामिन्, जो सुख और शान्ति मुझे हथकड़ियाँ-बेड़ियाँ पहनाकर या फाँसी पर लटकाकर आप पा सकते हैं। अच्छी बात है, मैं आपके सामने से दूर हट जाता हूँ। अब यदि भाग्य में बदा होगा तो उसी दिन फिर सेवा में उपस्थित हो सकूँगा, जब आप मेरे लिए हथकड़ियों और बेड़ियों का प्रबन्ध कर चुकेंगे।'

इतना कह कर युवक तेजी के साथ कमरे से बाहर निकल गया। राजा ने रोष-भरी आँखें गुड़ेर कर मन्त्री की ओर देखा और उनसे पूछा -- 'सुन लीं इस छोकरे की बातें?'

'हाँ स्वामिन्...' अपराधी की तरह अपनी रोनी सूरत बना कर मन्त्री ने जवाब दिया -- 'सुन लीं, ठीक उसी तरह जैसे कोई अबोध बालक किसी बेहोश रोगी का बड़बड़ाना सुन लेता है।'

'मैंने उसे पहचानने में भूल की थी। वह एक विषैला साँप है, जो आज तक फूलों के नीचे छिपा था। उसका यह पहला ही फुँफकार मुझे राज्य के अमंगल की सूचना दे रहा है। इसको कुचले बिना काम न चलेगा।'

मन्त्री के होश हवा हो गए। कहाँ तो अभी कुँवर को उपहार में राजकुमारी दी जा रही थी और कहाँ अब उसे कुचल देने की बात सोची जाने लगी।

भयभीत होकर उन्होंने कहा -- 'श्रीमन्, उसकी ओर से मैं क्षमा की भीख माँग रहा हूँ। अभी पल भर पहले ही आप उसे अपना पुत्र अंगीकार कर चुके हैं। मेरा विश्वास है, आपके इस प्रेम का असर खाली न जाने पाएगा। वह बड़ा ही सहृदय युवक है। मालूम होता है, किसी दुष्ट ने उसे बहका दिया है।'

'मैं जानता हूँ मन्त्री जी...' राजा ने कहा -- 'हमारे राज में भी अब दुष्टों की संख्या बढ़ती जा रही है। कुँवर करुणेन्द्र भी अगर उन्हीं का साथी बन गया हो तो मुझे अपने कठोर कर्त्तव्य का पालन करना पड़ेगा। अच्छा हो, अगर आप समझा-बुझा कर उसे ठीक रास्ते पर ला सकें, नहीं तो आप मुफ्त में बरबाद हो जाएँगे। अगर वह मान जाय तो मैं, जहाँ तक जल्दी हो सके, राजकुमारी के साथ उसका ब्याह करा दूँ। सम्भव है, शीलादेवी को पत्नी-रूप में पाकर वह अपने दायित्व को समझ ले और व्यर्थ ही इधर-उघर दृष्टि दौड़ाने का उसे अवसर ही न मिले।'

'मैं शीघ्र ही उसे आपके चरणों पर लोटता हुआ देखूँगा श्रीमन्...' कह कर मन्त्री ने सिर झुका दिया और घर जाने की आज्ञा माँगी।

राजा ने मन्त्री को विदा किया और एक ऐसा लम्बा उसास काढ़ा जिसमें उनके जीवन-भर की वेदना लबलबा रही थी। वे व्यथित हो कर उसी जगह कौच पर लेट गए। उनकी आँखों के आगे राज्य भर के अत्याचारों की तस्वीरें नाच रही थीं, कानों में कुँवर करुणेन्द्र के वे करुणा और रोष-भरे शब्द गूँज रहे थे, हृदय में बेचैनी की लहरें दौड़ रही थीं।

2


'मेरा क्या अपराध है करुण?' राजकुमारी शीला ने आँखों में आँसू भर कर पूछा --'मेरे जन्म-जन्मान्तर के संचित प्यार को तुम इस निर्दयता से क्यों ठुकरा रहे हो?'

'तुम्हारा अपराध राजकुमारी...' कुँवर करुणेन्द्र ने अपनी विह्वल भावनाओं को बलपूर्वक दबाते हुए उत्तर दिया -- 'केवल इतना ही कि तुम मेरे जैसे अभागों के लिए नहीं बनाई गई हो। मैं तुम्हारे प्यार को ठुकराने वाला अन्तिम पुरुष होऊँगा। किन्तु वह मेरे भोग की वस्तु नहीं है, उसकी तो मैं उपासना किया करता हूँ और चाहता हूँ कि तुम मुझे आशीर्वाद दो जिससे जीवन भर मैं ऐसा ही कर सकूँ।'

'मुझे भय है, यही आशीर्वाद मेरे लिए अभिशाप का काम करेगा।'

'नहीं, यह भय मिथ्या है। आशीर्वाद कभी अभिशाप नहीं हुआ करता। अभिशाप को आमन्त्रित करने वाली चीज़ तो है आकांक्षा।'

'किन्तु आकांक्षा से दूर हट कर जीवन में कोई स्वाद भी रह जाता है?'

'अपनी-अपनी रुचि के अनुसार लोग जीवन में स्वाद ढूँढा करते हैं राजकुमारी...किसी को त्यागमय, कष्टमय, तपस्यामय जीवन ही स्वादिष्ट मालूम होता है और किसी को वह जीवन जो सुख, भोग, विलास और वासना की धाराओं में, बिना केवट की नाव की तरह, लापरवाही से बहता चला जा रहा हो। मैं नहीं जानता, तुम्हारी आकांक्षा क्या है, और तुम अपने जीवन में कैसा स्वाद बनाए रखना चाहती हो।'

'मेरी आकांक्षा और कुछ नहीं है प्रियतम...' राजकुमारी घुटने टेक कर हाथ जोड़ती हुई सजल स्वर में बोली -- 'मैं केवल इतना ही चाहती हूँ कि तुम्हारी चरण-सीमा से कभी दूर न हटाई जाऊँ। चाहे मेरी यह आकांक्षा अभिशाप ही न बन जाय, मैं इससे अपने को कभी अलग न कर सकूँगी। ऐसा करने से मेरे जीवन का सारा स्वाद जाता रहेगा।'

कुँवर करुणेन्द्र का छिपा हुआ प्यार आँखों की राह से बाहर छलक पड़ा। रुँधे हुए स्वर में उसने कहा -- 'मुझे विचलित न करो राजकुमारी...उठो, इस तरह मुझ अभागे के सामने घुटने टेक कर न बैठो। मेरा मन अधीर हुआ जा रहा है। मेरी रक्षा करो।'

'मैं तो अबला हूँ नाथ...मेरे रक्षक तो आप ही हैं।'

'तुम्हारी यह दीनता मुझे पागल बना रही है राजकुमारी...' कुँवर ने बड़ी बेचैनी से कहा -- 'उठो मेरे ऊपर दया करो।'

'और तुम भी मेरे ऊपर दया करो देव...' राजकुमारी खड़ी हो कर बोली--'मुझे अब से राजकुमारी कह कर लज्जित न किया करो, मैं तुम्हारे चरणों की दासी हूँ।'

'नहीं, तुम राजकन्या हो'

'हाँ, किन्तु केवल पिता जी के राजप्रासाद में, तुम्हारे आगे नहीं'

'यह क्यों?'

'नहीं जानती।'

'इसी को बनना कहते हैं।'

'इसी को बनना कहते हैं?' राजकुमारी का नारी-दर्प सजग हो उठा। वेदना-विह्वल वाणी को कम्पित करती हुई वह बोली -- 'कहते होंगे, तुम्हारे ही जैसे हृदयहीन पुरुष, नारी-जीवन के इस इकलौते सत्य को बनना कहते होंगे। बचपन से लेकर आज तक साथ रहते हुए भी जो एक अबला के हृदय की भूख नहीं पहचान सका, उसे यह अधिकार है कि वह मेरी बिलखती हुई आकांक्षा का अपमान करे, मेरे तड़पने को बनना समझे।'

'क्रोध न करो शीला...' कुँवर ने उसके दोनों हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा -- 'मैं क्रोध का पात्र नहीं, तुम्हारी करुणा का भिखारी हूँ, तुम्हारे प्यार का भूखा हूँ, किन्तु....'

'किन्तु क्या करुण?'

'किन्तु हम दोनों के बीच जो बाधा आ खड़ी हुई है, उसे दूर होते अभी कुछ दिन और लगेंगे। तब तक अपनी-अपनी अधीरता पर हमें कठोर अधिकार रखना पड़ेगा।'

'यह बाधा तो तुम्हारी ही खड़ी की हुई है। तुम चाहो तो पल भर में दूर हो सकती है।'

'यह तो तुम सुनी बातें दोहरा रही हो शीला...' राजकुमारी के मुखड़े पर अपनी जीवनमयी आँखों से पुरुषत्व की आभा बिखेरते हुए कुँवर करुणेन्द्र ने जवाब दिया--'तुम्हें क्या मालूम कि इस बाधा का निर्माण करने वाला मैं हूँ या वह, जिसके अत्याचारपूर्ण शासन से आज सारे राज्य में हाहाकार मच रहा है, मेरे लिये यह हाहाकार असह्य हो उठा है। मैं प्राण देकर भी प्रजा की पीड़ाओं का प्रतिकार करूँगा।'

'किन्तु दो-चार दिनों के बाद भी तुम इस काम को शुरू कर सकते हो, और मैं समझती हूँ उस समय तुम बड़ी आसानी से सफलता प्राप्त कर सकोगे।'

'मैं इस काम में बहुत पहले ही से हाथ डाल चुका हूँ शीला...' कुँवर ने गम्भीर भाव से उत्तर दिया -- 'बहुत देर हो गई, अब पीछे नहीं लौट सकता। जिस काम के लिए तुम मुझे दो-चार दिनों तक ठहरने को कह रही हो वह इस महान् कार्य के आगे अपना कोई महत्व नहीं रखता।'

'मगर मेरी ओर भी तुम देख रहे हो या नहीं?'

'मेरी आँखें तुम्हारी ओर से फिर न सकेंगी, किन्तु हृदय इस समय प्रेम की मदिरा पी कर बेहोश नहीं होना चाहता, वह कर्त्तव्य की वेदी पर बलिदान होकर अमरत्व की धारा बहाना चाहता है।'

'तुम बड़े ही कठोर हो प्रियतम...'

'ठीक उसी तरह प्रिये...' कुँवर ने उसका हाथ चूमते हुए कहा -- 'जिस तरह वह शिला-खण्ड, जिसके नीचे सदैव निर्मल जल का स्रोत उमड़ता रहता है। अच्छा हो, अगर तुम मुझ निष्ठुर को बिलकुल भूल जाओ।'

'कोशिश करूँगी।'

'कोशिश ही नहीं, पूरी तपस्या करनी होगी।'

'करूँगी, अब मैं सब कुछ करूँगी, और केवल इसीलिए कि तुम्हारी मनोकामना पूरी हो, तुम्हारा यह अनुष्ठान सफल हो।'

'ईश्वर तुम्हारी इस इच्छा-शक्ति को अमर बनाएँ।'

'आशीर्वाद दो' कह कर राजकुमारी उसके पैरों पर माथा टेकती हुई बोली -- 'इन चरणों की धूलि मेरे सुहाग की रखवाली करे।'


3


'मैं तुम्हारा अन्तिम निर्णय सुनना चाहता हूँ करुण...'

'मुझे बहुत ही दुःख है पिताजी...' करुणेन्द्र ने विनीत भाव से उत्तर दिया -- 'मेरे विचार तब तक दूसरे नहीं हो सकते जब तक भूख की ज्वाला से तड़पने वाले उन करोड़ों निरीह प्राणियों की पीड़ा का पूर्ण प्रतिकार न हो जाय--जब तक राजकीय अत्याचारों की इति न हो जाय और जब तक मैं राज्य-व्यवस्था के साथ जनता की उमंग-भरी सहानुभूति का मेल न देख लूँ।'

'किन्तु क्या तुम समझते हो' मन्त्री ने राजदर्प दिखलाते हुए कहा -- 'कि तुम इतनी बड़ी राजसत्ता के विरुद्ध घड़ी भर भी खड़े रह सकोगे? तुम अपने को इतना महान् कब से समझने लगे?'

'उसी दिन से' करुणेन्द्र ने कहा -- 'जिस दिन मुझे मालूम हुआ कि आप लोग केवल गरीब प्रजाओं का रक्त ही चूसना जानते हैं -- उनकी सूखी हुई रसहीन हड्डियों में रुधिर की सृष्टि करना बिलकुल नहीं जानते, उसी दिन से, जिस दिन देखा कि जिनकी कमाई के बल पर राजप्रासादों में मदिरा की नदियाँ बहाई जा रही हैं, उन बेचारों को कहीं पानी पीने का ठिकाना नहीं है, और पिता जी, उसी दिन से, जिस दिन मुझे मालूम हुआ कि महानता का आधार ऐश्वर्य अथवा राजपद नहीं, बल्कि मनुष्यता और मनुष्यता के प्रति प्रेम है। मैं नहीं जानता, इतनी बड़ी राजसत्ता के विरुद्ध मैं घड़ी भर भी खड़ा रह सकूँगा या नहीं, हाँ, इतना अवश्य जानता हूँ कि सत्य और न्याय की उपासना करने जा रहा हूँ और परमात्मा मेरी सहायता करेंगे।'

'सम्भव है परमात्मा तुम्हारी सहायता करें किन्तु तुम्हारे पिता होने के नाते मेरा भी कर्त्तव्य है कि मैं तुम्हें उचित राह पर ले जाने की चेष्टा करूँ, तुम्हें आग में कूदने से रोकूँ और तुम्हारे कल्याण की चिन्ता करूँ...' कहते-कहते मन्त्री की आँखें डबडबा आईं।

'सच है पिताजी...' करुणेन्द्र ने अविचलित भाव से कहा--'आप अपना कर्त्तव्य कीजिए, मैं अपने कर्त्तव्य को पहचानता हूँ।'

'और अपने माँ-बाप को अपार कष्ट में डालना ही शायद तुम इस समय अपना कर्त्तव्य समझ रहे हो?' मन्त्री ने व्यंग्य किया।

'नहीं, माँ-बाप के माया-मोह की परवा न करते हुए सारे देश को क्लेश-मुक्त करना।'

'नरक मिलेगा -- कहे देता हूँ, मुझे रुला कर सुख न पा सकोगे।'

'पिता का आशीर्वाद सिर-आँखों पर, किन्तु देश-सेवा के नाते यही नरक मेरे लिए स्वर्ग होगा। आपको रोते देख मैं कभी सुखी नहीं हो सकता, मगर देखता हूँ आपके रोने का कोई कारण नहीं है।'

'इससे बढ़ कर और कौन सा कारण होगा...' मन्त्री ने विदग्ध वाणी में कहा -- 'कि कल ही मैं जिस बेटे को राज-सिंहासन पर बैठाने की बात कर रहा था, उसी को शायद जेल की नरक में सड़ता हुआ देखूँगा। तुम नहीं जानते राज-धर्म कितना कठोर और निर्मम होता है।'

'जानता हूँ' करुणेन्द्र ने उत्तर दिया--'राज-धर्म बड़ा ही कोमल और सहृदय होता है। कठोरता और निर्ममता तो स्वार्थ-पूजा के निमित्त काम में लाई जाती है।'

'अभागे हो' मन्त्री ने कहा--'राजकुमारी शीला देवी के साथ-साथ इतना बड़ा समृद्धिशाली राज्य खोने जा रहे हो।'

'इतना ही या और कुछ...'

'बहुत कुछ' मन्त्री ने आँखों में रोष की लालिमा जगाकर उत्तर दिया--'यदि तुम चौबीस घन्टे के अन्दर अपनी विचार-धारा न बदल सके तो मुझे राजाज्ञा का पालन करना पड़ेगा, तुम्हें पुत्र के रूप में नहीं, राज-द्रोही के रूप में देखने को विवश होना पड़ेगा और मुझे भय है, तुम इस नगर में नहीं रहने दिए जाओगे।'

'बहुत अच्छा', कुँवर अपने शरीर का वस्त्र उतारता हुआ बोला--'राजाज्ञा का पालन करने के लिए आपको चौबीस घण्टे की लम्बी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। लीजिए, मैं इसी वक्त यहाँ से चला जाता हूँ। अब मुझे दीन-दुखियों के हृदय में अपना वैकुण्ठ बसाना है, आपके इन मूल्यवान वस्त्रों की आवश्यकता नहीं रह गई। इन्हें भी मैं छोड़े जाता हूँ, मेरे लिए गाढ़े का यह एक टुकड़ा ही बहुत है। प्रणाम...'

देखते ही देखते, ऐश्वर्य की गोद में पला हुआ वह युवक केवल एक लँगोटी पहन कर उस महल से बाहर निकल गया।

मन्त्री माथा ठोंक कर रह गए।


4


'ज्यो-ज्यों विप्लव बढ़ता जा रहा है, त्यों-त्यों आप ढीले होते जा रहे हैं, मन्त्री जी...'

'हो सकता है श्रीमन्'

'क्यों? क्या मैं इसका कारण जान सकता हूँ?' राजा ने अपनी भौंहें टेढ़ी करके पूछा

'मैं स्वयं नहीं जानता, क्या कारण हो सकता है।'

'क्या आप यह भी नहीं जानते कि आप ही का पुत्र इस विप्लव का प्राण है?'

'इस विप्लव के प्राण को तो मैं पहचानता हूँ किन्तु उस पर मेरा अब कोई अधिकार नहीं, वह जनता की चीज हो गया है।'

'किन्तु उसे राजदण्ड देते हुए आपका हृदय तो काँप रहा है न?'

'इसे मैं अस्वीकार नहीं कर सकता श्रीमन्...' मन्त्री ने गम्भीर हो कर निवेदन किया -- 'मेरी छाती के भीतर हृदय नाम की एक ऐसी वस्तु है जो मुझे स्नेह और ममता की ओर खींच लेती है। मैं सब तरह से लाचार हूँ।'

'आपको जैसे भी हो, यह विद्रोह दबाना पड़ेगा' राजा ने क्रोध से काँपते हुए कहा -- 'नहीं तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।'

'यह तो मैं भी देख रहा हूँ श्रीमन्...' मन्त्री ने नम्रता से उत्तर दिया--'किन्तु इसकी दवा मेरे पास नहीं है। दमन-चक्र चला कर यह प्रलयंकर विद्रोह शान्त नहीं किया जा सकता। आपको जनता के सामने झुकना पड़ेगा।'

'मुझे जनता के सामने झुकना पड़ेगा?' राजा क्रोध से पागल होकर चिल्ला उठे --'मैं सब समझ गया मन्त्री, इस विद्रोह संचालन में तुम्हारा भी हाथ है। तुम्ही यह सब करवा रहे हो।'

'मैं इसका विरोध करता हूँ', मन्त्री ने शेर की तरह गरज कर प्रतिवाद किया -- 'मैं इस राज्य का सबसे बड़ा हितेच्छु हूँ। मैं वही कह रहा हूँ जो आपके लिए कल्याण-प्रद समझता हूँ। मगर आपकी आँखें फूट गई हैं, आपके सिर पर विनाश मँडरा रहा है। अत्याचार करने पर आप तुले हुए हैं, यही अत्याचार आपको ले बैठेगा। अब भी समय है, सँभल जाइए।'

'अच्छी बात है' कह कर राजा ने सीटी बजा दी। बजाते ही पचीस-तीस हथियारबन्द सैनिक वहाँ आ खड़े हुए।

राजा ने क्रोध से काँपते हुए कहा- सेनापति.,.मन्त्री को गिरफ्तार करो। यह विद्रोहियों का सरदार है।

सैनिकों की तलवारें झनझना उठीं। मन्त्री के हाथों में हथकड़ियाँ डाल दी गईं।

राजा ने मन्त्री की ओर देख कर रोष भरे शब्दों में कहा -- जाओ, तुम्हारी नमकहरामी का यही पुरस्कार है।

मन्त्री ने हँस कर कहा -- नमक-हलाली का कहिए श्रीमन्...अब भी तो सत्य से प्रेम करना सीख लीजिए। मुझे तो अपना पुरस्कार मिल गया, अब आप अपना पाने के लिए तैयार रहिए।

'बस, अब तुम अधिक नहीं बोल सकते', राजा ने तलवार खींच कर कहा--'बन्दी के मुख से मैं कोई बात नहीं सुनना चाहता।'

'ईश्वर आपको सत्पथ दिखाएँ।' कहकर मन्त्री ने तलवार के आगे अपना सिर झुका दिया।


5


'तुम यहाँ कैसे राजकुमारी?'

'क्या अब भी मैं राजकुमारी ही हूँ? राजकुमारी भी क्या मेरी ही जैसी राह की भिखारिणी हुआ करती हैं?'

'वही तो पूछता हूँ, तुमने यह बाना क्यों धारण किया? राजप्रासाद का सुख छोड़ कर तुम हम विद्रोहियों की बीच क्योंकर आ गईं? पिता के विरुद्ध तुम्हारा यह आचरण मुझे आश्चर्यचकित कर रहा है।'

'सच है सरदार...' करुणेन्द्र को सम्बोधित करके राजकुमारी शीला ने कहा--(करुणेन्द्र को विद्रोही दल के लोग सरदार कहकर पुकारा करते थे) 'आज मुझे अपने अत्याचारी पिता के विरुद्ध ऐसा आचरण करते देख आपको आश्चर्य हो रहा है, किन्तु उस दिन अपने ऊपर आपको आश्चर्य न हुआ होगा, जब आप स्वयं अपने पिता का विरोध करके घर से निकल गए थे। आपके हृदय में आज जो आग धधक रही है, उसी ने मेरे अन्तर में भी अब घर कर लिया है। राजा के इस नारकीय अत्याचार का उत्तर देना मैंने भी अपना धर्म समझा और इसी कारण यह बाना धारण कर, आपकी सेवा में आ खड़ी हुई। सरदार...मैं और किसी लायक नहीं हूँ, केवल आपकी सेविका के नाते इस विप्लव की आराधना करने आई हूँ, मेरी पूजा स्वीकार हो।'

'प्रिये...' विद्रोहियों का सरदार प्रेमार्द्र होकर कह उठा -- 'तुम मुझे सरदार और आप कह कर न पुकारो, मैं तुम्हारा वही करुण हूँ जो जीवन के इस दारुण संग्राम में लिपटा रह कर भी, तुम्हें एक क्षण के लिए भी अपनी स्मृति से दूर नहीं हटा सका, कदाचित् उसी के प्रभाव से इस समय तुम मेरे सामने आ पहुँची हो। आओ, पहले तुम्हें एक बार गले लगा कर विप्लव के इस कंकटाकीर्ण आँगन में तुम्हारा स्वागत करूँ।'

सरदार ने अपनी बाहें फैला दीं, किन्तु शीला उससे दो कदम दूर हटकर बोली --

' सरदार...होश में आ जाओ। तुम इस समय एक बड़े भारी यज्ञ के पुरोहित बने हुए हो। यह विह्वलता तुम्हें शोभा नहीं देती। यह यज्ञ समाप्त कर लो, फिर मुझे गले लगाना। तुम्हारे प्रेम की भीख मेरे कलेजे के भीतर है, उसे इस समय निकाल कर दिखाने की मुझे जरूरत नहीं। आज तो मैं तुम्हें अपने कर्त्तव्य की छवि पर रिझाने आई हूँ। अभी मुझे मत छुओ, पिता के शोणित से मैं अपनी माँ का तर्पण कर लूँ, एक सच्ची क्षत्री बालिका की तरह माता के ऋण से उऋण हो लूँ, फिर मेरा कोई काम नहीं रह जाएगा, मैं तुम्हारे छूने लायक हो जाऊँगी।'

'इसका क्या अर्थ शीला?' सरदार ने संभल कर, चौंक कर और कुछ लजा कर पूछा।

'इसके अर्थ में अनर्थ की गाथा है', राजकुमारी ने क्रोध से काँपते हुए जवाब दिया -- 'पिता जी...नहीं, इस राज्य के अत्याचारी राजा के मन में सन्देह हुआ कि मेरी माँ का भी हाथ इस राज-विप्लव में था, वे तुम्हारे साथ हमदर्दी दिखाने के अपराध में चुपके से मार डाली गईं...मेरे लिए भी षड्यन्त्र रचा जा रहा था, किन्तु मुझे मालूम हो गया और मैं चुपके से यहाँ चली आई।'

सरदार तड़प उठा। 'क्या माता जी के साथ भी उस पापी ने यही सुलूक किया?'

'केवल मेरी माता जी के साथ ही नहीं', राजकुमारी ने कहा--'तुम्हारे पिता जी भी जेल के भीतर सड़ रहे हैं और तुम्हारी माता जी इसी शोक में चल बसीं।'

'माँ मेरी चल बसीं और पिता जी बन्दी बना कर जेल में डाल दिए गए हैं, यह तो मैं तुम्हारे आने के घण्टे भर पहले ही सुन चुका था, किन्तु इससे मैं विचलित नहीं होने का। राष्ट्रीय यज्ञ में कितनी ही प्यारी और मूल्यवान वस्तुओं की आहुति देनी पड़ती है। कौन जाने किस समय हमारे प्राण भी कर्त्तव्य की इसी वेदी पर चढ़ जाएँ...'

'अब बिलकुल देर नहीं है', कह कर इसी समय अचानक राज्य का प्रधान सेनापति उन दोनों के आगे तलवार खीँच कर खड़ा हो गया। उसके साथ सशस्त्र सैनिकों की एक टोली भी थी।

'खबरदार सेनापति...' राजकुमारी ने डपट कर कहा -- 'एक पग भी अगर आगे बढ़ाया तो कुशल नहीं है। राजकुमारी शीलादेवी तुम्हें आज्ञा दे रही है कि तुम इसी समय यहाँ से दूर हट जाओ।'

'खेद है राजकुमारी...' सेनापति ने क्रूरता की हँसी हँस कर जवाब दिया -- 'अब आपकी आज्ञा का कोई मूल्य नहीं रह गया है। मैं राजाज्ञा पाकर आपको और इस विद्रोही को गिरफ्तार करने आया हूँ। भला चाहें, तो शान्तिपूर्वक आप लोग आत्म-समर्पण कर दें। व्यर्थ की बातें बघारने से अब कोई लाभ नहीं होगा।'

'अच्छी बात है सेनापति...' करुणेन्द्र (सरदार) ने धीरता के साथ कहा -- 'इस समय हम लोग फँस गए। यहाँ हमारी सहायता करने वाला कोई है नहीं, इसलिए बड़ी आसानी से तुम हमें गिरफ्तार कर लो। मगर अपने राजा से कह देना कि हमारी गिरफ्तारी से यह विप्लव समाप्त नहीं होगा, लोग राजमद को चूर करके ही दम लेंगे।'

'कोई चिन्ता नहीं', सेनापति ने कड़ककर कहा--'आगे की बात फिर देखी जाएगी, इस समय राजमद तुम्हारे खून का प्यासा है, चुपचाप चल कर उसकी प्यास बुझाओ।'

'चलो', कह कर शीला और करुणेन्द्र ने एक साथ ही अपने हाथ बढ़ा दिए।


6


'तुम्हारे ही कारण राज्यभर में मार-काट मची हुई है, इसे स्वीकार करते हो?' राजा ने डपट कर पूछा

'मेरे कारण नहीं, आपके कारण -- आपके इन नारकीय अत्याचारों के कारण'--विद्रोही करुणेन्द्र ने उत्तर दिया।

'तुम्हारी इस गुस्ताखी की क्या सजा है, जानते हो?'

'गुस्ताखी नहीं जानता, सजा जानता हूँ और उससे मैं डरता नहीं।'

'अब डर कर भी तुम उससे छुटकारा नहीं पा सकते...' कह कर राजा ने अमानुषिक रूप से चिल्ला कर आज्ञा दी -- 'कहाँ है जल्लाद... ले जाओ, इस नमकहराम कुत्ते को फाँसी पर लटका दो।'

इसी समय हाँफता हुआ सेनापति राजा के सामने आ खड़ा हुआ और बोला -- आप कहीं जाकर छिप रहें हुजूर...बागियों की सेना ने जेल की दीवारें तोड़ दीं...अब वे महल की ओर दौड़ी आ रही हैं।

'और तुम्हारी सेना कहाँ गई?' राजा ने भयभीत हो कर पूछा।

'मेरी सेना के सभी लोग उसी दल में जा मिले', सेनापति ने भय-विह्वल होकर कहा -- 'मैं आपको कहीं छिपा रखने के लिए वहाँ से भाग आया हूँ। अब मेरे हाथ में एक भी सैनिक नहीं रह गया। आप जल्दी करें, कहीं जाकर छिप रहें। वह देखिये, सेना का समुद्र उमड़ा आ रहा है। भागिए, छिपिए, अपने प्राणों की रक्षा कीजिए।'

'किले का दरवाजा बन्द करो", कह कर राजा रंग-महल की ओर भाग खड़े हुए।

वे अभी भीतर पहुँच भी नही सके थे कि विद्रोहियो की सेना किले मे घुस आई। बेचाऱा सेनापति पकड़ लिया गया।

'जल्दी बताओ', विद्रोहियों के एक मुखिया ने सेनापति से पूछा -- 'वह अत्याचारी, कायर और दगाबाज राजा कहाँ छिपा हुआ है, हमें उसके राजदर्प की प्यास बुझानी है।'

'मैं नहीं जानता' -- सेनापति ने कहा।

'नहीं जानते?' एक साथ ही बहुत से लोगों ने चिल्ला कर कहा -- 'झूठे हो, जल्दी बताओ, नहीं तो बोटी-बोटी अलग कर दी जाएगी।'

'जरूर कर दी जानी चाहिए', कुछ लोग चिल्ला उठे -- 'इसी राक्षस ने हमारे सरदार और कुमारी शीला देवी को धोखे से गिरफ्तार किया था।'

'वह हत्यारा महल में जा छिपा है', कह कर अचानक विद्रोहियों का खोया हुआ सरदार (करुणेन्द्र) उसी जगह आकर खड़ा हो गया।

उन्हें पाकर उनके हौसले और भी बढ़ गए। जेल में उन्होंने अपने सरदार को बहुत ढूँढा था, पर वे मिले नहीं। लोगों ने समझा, वे फाँसी पर लटका दिए गए। इससे उनकी उत्तेजना और भी बढ़ गई थी। अब अपने उसी सरदार को सामने देख कर वे चिल्ला उठे -- महल को मिट्टी में मिला दो। उस शैतान राजा को पकड़ कर उसी फाँसी की डोरी से लटका दो जो हम लोगों के लिए बनाई गई थी।

'अत्याचार का अन्त कर दो, इसके बाद ही हमें एक राम-राज्य कायम करना है'--कह कर सेना का दल महल की ओर टूट पड़ा।


7


जेल से निकलते ही शीला अपने सरदार (करुणेन्द्र) की खोज में लग गई। मगर उसे कहीं पता न चला। वह मूर्च्छित होकर एक जगह गिर पड़ी। विद्रोहियों का दल बहुत आगे निकल चुका था। करुणेन्द्र के पिता धीरे-धीरे आ रहे थे, उनकी नजर पड़ गई। उन्होंने उसे पहचान लिया। उन्हीं के प्रयास से उसकी बेहोशी दूर हो गई। आँखें खोलते ही उसने पूछा -- मन्त्री जी...कुँवर साहब का कुछ पता है?

'कह नहीं सकता बेटी...' उस बेचारे ने बड़े कष्ट से कहा -- 'जा कर देख आओ, शायद उसी दल में मिल जाएँ। मालूम होता है, सारा मामला शान्त हो गया। आकाश-मण्डल में हर्ष की ध्वनि गूँज रही है। अगर जा सको तो जाओ, करुणेन्द्र को खोज लो। मैं यहीं बैठता हूँ, उसे मेरे पास ले आना।'

शीला उठी और विद्युत-वेग से राजमहल की ओर दौड़ पड़ी।

'हटो, रास्ता साफ कर दो', पीछे की भीड़ में से आवाज उठी --'राजकुमारी शीलादेवी आ गईं, इन्हें सरदार (करुणेन्द्र) के पास जाने दो।'

'रास्ता अपने-आप खुलता चला जाएगा देवी जी...आप आगे बढ़ती जायँ', कह कर दो-चार आदमी लोगों को इधर-उधर हटाने में लग गए।

लोगों के हर्ष की सीमा नहीं थी। भीड़ को चीरती-फाड़ती शीला उस स्थान पर पहुँची जहाँ एक अत्याचारी राजा की वैभवहीन काया फाँसी पर झूल रही थी और उसका राजमुकुट लोट रहा था लँगोटी पहने हुए उस विद्रोही के चरणों पर...

शीला यह दृश्य देख कर खड़ी न रह सकी। लोगों ने आँखों में आँसू भर कर देखा, वह भी उन्हीं चरणों पर बेहोश होकर गिर पड़ी।