विरासत / सुकेश साहनी

Gadya Kosh से
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बरसों से डॉक्टरों की देख-रेख में 'कोमा' में पड़े दादा जी को अचानक आँखें मिचमिचाते देख बच्चे ने उत्तेजित होकर पूरे घर में दौड़ लगा दी, "दादू जाग पड़े! दादू को होश आ गया।"

सुनकर घर के सभी सदस्य उनके इर्द-गिर्द जमा हो गए। खुशी से सभी की आँखें चमकने लगीं।

वह मिचमिचाती आँखों से इधर-उधर देखने का प्रयास कर रहे थे। घनी दाढ़ी के बीच चेहरे पर बेचैनी के भाव साफ दिखाई दे रहे थे। वर्ष 2060 को स्वतंत्रता दिवस के दिन झण्डारोहण से लौटते हुए उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया था, वे 'कोमा' में चले गए थे। उनके सभी अंग ठीक-ठाक काम कर रहे थे; इसलिए डाक्टर आशावान थे और उनके 'बेहोशी' से बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

"पानी!" वे बुदबुदाए।

एक बारगी सभी बुत बन गए, उनको सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करें। उनकी मूर्छा के दौरान पर्यावरण की दृष्टि से हालात बद से बदतर हो गए थे। बरसों से जल संकट की मार झेल रही पृथ्वी के सभी जल भण्डार समाप्त हो गए थे। मनुष्य ने इस संकट से निजात पाने के लिए आक्सीजन की तरह अपने शरीर की जल की आवश्यकता को सीधे वातावरण से खींचने की तकनीक विकसित कर ली थी। चूँकि अब पानी भौतिक अवस्था में उपलब्ध ही नहीं था, अतः बीमार को पानी देना संभव नहीं था।

"पानी!" वृद्ध ने फिर पुकारा।

इस बार पुत्र ने फ्रिज से प्रयोगशाला में तैयार किया गया अति दुर्लभ 'जूस क्यूब' निकाला और पिता के होठों पर धीरे से रख दिया, ताकि जूस उन्हें पानी का अहसास करा सके।

जूस का स्वाद महसूस करते ही वृद्ध ने बुरा-सा मुँह बनाया और पिघलते क्यूब को जीभ से बाहर धकेलकर होंठ बंद कर लिये। उनके चेहरे पर खीझ ओर गुस्से के मिले-जुले भाव दिखाई देने लगे।

अपने पति को इस हाल में देखकर वृद्धा रोने लगी। बेटे से बोली, "वर्षों बाद ईश्वर ने यह दिन दिखाया है। बेटा कुछ कर...! इनके मुँह में वही बरसों पहले वाले पानी का स्वाद है।"

बेटे के हाथ पैर ढीले पड़ गए। माँ को ढाँढस बधाने के अलावा उसे कुछ सूझा ही नहीं।

तभी वृद्धा की आँखों में चमक आ गई, पुत्र से बोली, "बेटा, बरसों पहले गंगाजल का जो नमूना सम्हालकर रखा था, वही पिला दे इन्हें और कब काम आएगा वो।"

माँ के याद दिलाते ही पुत्र ने लपककर फ्रिज से छोटी-सी शीशी निकाली, जिसमें 2 मि।ली। जल जमी हुई अवस्था में था। फ्रिज से बाहर निकालते ही गंगाजल द्रव के रूप में आ गया। हड़बड़ाहट में बिना कमरे के तापमान का आकलन किए उसने जल वाली शीशी उनके होठों पर लगा दी।

उसका दिल धक् से रह गया। सभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। पिता के होठों तक पहुँचने से पहले जल भाप बनकर वातावरण में विलीन हो गया।

पिता के चेहरे पर गुस्से की लपट—सी दिखी वे फिर 'कोमा' में चले गए।

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