विषाद / अन्तोन चेख़व / अनिल जनविजय

Gadya Kosh से
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’अपना दुख मैं किसे सुनाऊँ...’


चारों ओर शाम का धुन्धलका फैल गया था। सड़क पर लगी स्ट्रीट-लाइट की हलकी रोशनी में आसमान से गिर रही बर्फ़ के मोटे-मोटे फ़ाहे चमक रहे थे। घोड़ी की पीठ पर, सड़क पर आ-जा रहे लोगों की गर्म टोपियों पर और कन्धों पर बर्फ़ की एक पतली-सी परत जम गई थी, जो धीरे-धीरे मोटी होती जा रही थी। स्लेजचालक इओना पतअपोफ़ के बदन पर भी बर्फ़ इस तरह से जम गई थी कि वह भूत की तरह दिखाई देने लगा था। भारी ठण्ड की वजह से इओना ने अपना बदन इस तरह से सिकोड़ लिया था कि वह झुककर दोहरा हो गया था। इओना का शरीर स्लेज पर बैठे-बैठे अकड़ गया था और वह अपनी जगह पर चुपचाप बैठा हुआ किसी सवारी का इन्तज़ार कर रहा था। ऐसा लग रहा था कि यदि उसपर बर्फ़ का पहाड़ भी गिर पड़ेगा तो वह बिना हिले-डुले ऐसे ही चुपचाप बैठा रहेगा।

अब तक उसकी घोड़ी भी बर्फ से ढक चुकी थी और एकदम गतिहीन-सी खड़ी था। वह अपनी जगह पर ऐसे जम गई थी कि वह घोड़े के आकार का कोई बिस्कुट या घोड़े की तरह का कोई लॉलीपॉप लग रही थी। शायद वो भी इस तरह की किसी सोच में डूबी हुई थी कि उसे, जो पहले कभी खेतों में हल जोता करती थी, यहाँ शहर में लाकर स्लेज में जोत दिया गया है और सड़क के दोनों ओर जलती बत्तियों और दौड़ती-भागती भीड़ के बीच फँसकर उसकी ज़िन्दगी बरबाद हो रही है। इस बरबादी में कोई सोचने के सिवा और कर ही क्या सकता है।

इओना और उसकी घोड़ी, दोनों काफ़ी देर से एक ही जगह पर खड़े हुए थे। वे दोपहर के खाने से पहले ही अस्तबल से निकल पड़े थे, लेकिन अभी तक उन्हें एक भी सवारी नहीं मिली है। अब शहर पर अन्धेरा उतर आया है और लगातार गहरा होता जा रहा है। बढ़ते हुए अन्धेरे में स्ट्रीट-लाइट की रोशनियाँ तेज़ी से चमकने लगी हैं। सड़क पर भीड़ और शोर भी बढ़ता जा रहा है।

’ऐ स्लेजवाले, वीबर्ग चलोगे?’ —अचानक इओना को सुनाई दिया।

इओना चौंक उठा और उसने बर्फ़ से ढकी अपनी पलकें ऊपर उठाईं। उसकी नज़र एक फ़ौजी अफ़सर पर पड़ी, जिसने धूसर रंग का भारी ओवरकोट पहन रखा था।

’वीबर्ग चलना है क्या?’ — फ़ौजी ने अपना सवाल फिर से दोहराया — ’अरे, सो रहे हो क्या? सुनाई नहीं दे रहा। वीबर्ग जाना है, चलोगे?’

फ़ौजी का सवाल सुनकर इओना अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसके कन्धों पर जमी बर्फ़ झड़कर नीचे गिरने लगी। उसकी घोड़ी भी हिनहिनाई।

इओना ने फ़ौजी के सवाल पर सहमति दिखाते हुए अपनी घोड़ी की लगाम खींची। लगाम खिंचते ही घोड़ी सतर्क हो गई और उसके हिलने से उसकी गर्दन और पीठ पर जमी बर्फ की परतें नीचे गिरने लगीं। फ़ौजी अफ़सर स्लेज में बैठ गया। इओना ने अपने होंठ गोल करके अपनी घोड़ी को पुचकारते हुए हें-हें-हें की आवाज़ निकाली और अपनी आदत के अनुसार चाबुक फटकारते हुए उसे आगे बढ़ने को कहा। घोड़ी ने अपनी गर्दन सीधी की और लकड़ी की तरह ठस्स दिख रही अपनी टाँगों को मोड़ा और आगे बढ़ने के लिए क़दम उठाया। स्लेज अभी दो ही क़दम चली होगी कि अन्धेरे में उसकी स्लेज के पास से गुज़र रहा कोई राहगीर चीख़ पड़ता है — मियाँ, क्या कर रहे हो? हमारे ऊपर ही चढ़े आ रहे हो। कुछ दिखाई नहीं दे रहा? अन्धे हो क्या? जानवर कहीं के ! गाड़ी दूसरी ओर मोड़ो !'

'तुम गाड़ी चलाना नहीं जानते क्या? दाहिनी ओर चलो, बाबा !' — पीछे बैठी सवारी भी थोड़ा चिढ़कर गुस्से में बोली।

राहगीर ने नाराज़गी से इओना की तरफ़ देखा, फिर अपनी बाँह पर पड़ी बर्फ़ झाड़ी और घोड़े के सिर से अपने कन्धे को बचाते हुए सड़क पार करके दूसरी तरफ़ चला गया। इओना ने इन बेवकूफ़ राहगीरों को कोसते हुए नज़र घुमाकर आगे रास्ते को ताका। इस समय उसकी हालत किसी ऐसे अर्धविक्षिप्त आदमी की तरह थी, जो यह नहीं समझ पा रहा है कि उसे क्या करना है और कैसे करना है।

उधर फ़ौजी अफ़सर सड़क पर चलते राहगीरों को देखकर बड़बड़ा रहा है — इन बदमाशों को हो क्या गया है ... सब के सब जैसे आज तुम्हारी गाड़ी के नीचे जान देने की क़सम खाकर आए हैं !

इओना मुड़कर अपनी गाड़ी में बैठी सवारी की तरफ़ देखता है। उसके होंठ फड़फड़ाते हैं। शायद वह कुछ कहना चाह रहा है, लेकिन उसके गले से घुर-घुर की आवाज़ के अलावा कोई दूसरी आवाज़ नहीं सुनाई देती।

'क्या बात है? ' सवारी उसे बेचैन देखकर उससे पूछती है।

इओना के होठों पर एक टेढ़ी-सी मुस्कान आती है, फिर वह बड़ी कोशिश करके फटी आवाज़ में कहता है — 'मेरा इकलौता बेटा इसी हफ़्ते गुज़र गया, साहब !'

' अरे ! क्या हुआ? कैसे मर गया वह?'

इओना अपना पूरा बदन अपनी सवारी की तरफ़ मोड़कर कहता है,— 'मैं क्या बताऊँ, साहब। उसे बहुत तेज़ बुखार आया था। हम उसे अस्पताल ले गए। बेचारा तीन दिन तक अस्पताल में पड़ा रहा और फिर हमें छोड़कर चला गया... ख़ुदा की जैसी मर्जी ! हम क्या कर सकते हैं?'

'अरे, शैतान की औलाद, ठीक से मोड़!' — अचानक अन्धेरे में कोई चिल्लाया, — 'अबे कुत्ते, अन्धा है क्या? आँखें हैं या बटन?'

'अरे, चलो.... चलो...' — स्लेजगाड़ी में बैठा फ़ौजी अफ़सर बोला, — ’मियाँ, ज़रा तेज़ चलाओ। इस तरह तो हम कल तक भी नहीं पहुँचेंगे !'

इओना ने अपनी गर्दन सीधी की और थोड़ा-सा तनकर बैठ गया। फिर बड़ी रुखाई से उसने अपना चाबुक फटकारा। बीच-बीच में उसने कई बार पीछे मुड़कर अपनी सवारी की तरफ देखा, लेकिन उस अफ़सर ने अब अपनी आँखें बन्द कर रखी थीं। जाहिर है कि वह इस समय कुछ भी सुनने के मूड में नहीं है।

अफ़सर को वीबर्ग पहुंचाकर इओना ने वहीं बने एक ढाबे के पास अपनी स्लेजगाड़ी खड़ी कर दी और वह फिर से अपनी सीट पर बैठकर नीचे की ओर झुककर दोहरा हो गया। वह देर तक बिना हिले-डुले वैसे ही बैठा रहा। पहले की तरह बर्फ़ अभी भी गिर रही है। तेज़ी से हो रहे इस हिमपात की वजह से उसकी घोड़ी और स्लेजगाड़ी फिर से सफ़ेद बुराक़ बर्फ़ से ढके गए हैं और ऐसा लगने लगा है, जैसे वे बर्फ़ के ही बने हुए हों। धीरे-धीरे एक घण्टा बीत गया, फिर दूसरा घण्टा ... और फिर तीसरा भी ...।

तभी फुटपाथ पर अपने रबड़ के जूते चटकाते हुए तीन लड़के मस्ती और धमाल करते हुए वहाँ आते हैं। इनमें से दो नवयुवक लम्बे और दुबले-पतले हैं और तीसरा ठिगना-सा है और उसकी पीठ पर हलका सा कूबड़ निकला हुआ है।

'अरे, स्लेजवाले ! पुलिसिया चौकी तक चलोगे क्या?' — कुबड़ी पीठ वाले लड़के ने अपनी भौण्डी आवाज़ में पूछा — 'दस-दस कोपेक के सिर्फ़ तीन ही सिक्के हैं हमारे पास।'

हालाँकि पुलिसिया चौकी बहुत दूर है और इतनी दूर जाने के लिए तीस कोपेक बहुत कम किराया है, लेकिन इओना को इस समय कमाई से कोई लेना-देना नहीं है। तीस कोपेक मिले या पचास कोपेक, इससे क्या फ़र्क पड़ता है। गाड़ी में सवारी होनी चाहिए, बस्स !

इओना अपनी घोड़ी की लगाम खींचकर हें-हें-हें की आवाज़ निकालकर अपनी घोड़ी को चलने के लिए तैयार करता है। तीनों लड़के मस्ती करने के मूड में हैं। वे एक-दूसरे को ढकेलते हुए स्लेज पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। तीनों एक-दूसरे से पहले स्लेज में बैठ जाना चाहते हैं क्योंकि उसमें सीट सिर्फ़ दो ही लोगों के लिए है। किसी एक को पूरे रास्ते खड़े होकर जाना पड़ेगा। फिर वो आपस में बहस करना शुरू कर देते हैं कि कौन बैठकर जाएगा और किसे खड़ा रहना होगा। आख़िर में तीनों के बीच यह फ़ैसला हुआ कि कुबड़ा लड़का खड़ा होकर जाएगा क्योंकि क़द में वह सबसे छोटा है।

स्लेज चल पड़ती है। लेकिन उसकी रफ़्तार धीमी ही है।

'बाबा, घोड़े को भगाओ न !’ —कुबड़ा लड़का नकियाते हुए इओना से कहता है। वह स्लेज में कुछ इस तरह से खड़ा हुआ है कि उसकी सांस इओना की गर्दन पर पड़ रही है — 'क्या यह घोड़ा ऐसे ही घिसटता रहेगा? थोड़ा तेज़ नहीं चल सकते? इस घोड़े के सिर पर तो कलगी भी लगी हुई है, लेकिन फिर भी पित्चिरबूर्ग का सबसे आलसी घोड़ा लग रहा है...।

’हा-हा-हा’ —इयोना ज़ोर से हंसा — अब जैसा भी है ...!

’अरे, जैसा भी है... इसका क्या मतलब हुआ? थोड़ा तेज़ चलाओ न !

'दर्द के मारे मेरा सिर फटा जा रहा है,' — दो में से एक लम्बे लड़के ने कहा — 'कल रात दोकमा के ढाबे में बहुत पी गया था। मैंने और वास्का ने मिलकर कोनयाक की पूरी चार बोतलें चढ़ा ली थीं।'

'बेटा, झूठ मत बोल? बड़ा पियक्कड़ बनने चला है? चार बोतलें चढ़ा लीं...। एक बोतल पीने का तो दम है नहीं, लेकिन झूठ ज़रूर बोलेगा यह लड़का' —दूसरे लम्बे लड़के ने नाराज़गी से कहा।

'नहीं, नहीं,सच कह रहा हूँ ! ख़ुदा मेरा बेड़ा ग़र्क करे, अगर झूठ बोल रहा हूँ।’

'हां, हां, आप ही तो राजा हरिश्चन्द्र की औलाद हैं ! आज तक किसी ने कभी किसी जूँ को खाँसते हुए देखा है क्या? वैसे ही तू भी है। तुझे भी किसी ने कभी सच बोलते हुए नहीं देखा।'

'हा-हा-हा... आप सब लोग कितने मज़ाकिया हैं!' — इओना ने भी खीसें निपोरी।

'अरे, इसे चाबुक लगाओ न, बुढ़ऊ !' — कुबड़ा लड़का घोड़ी की धीमी चाल देखकर खिसियाया हुआ है — 'तुम हमें कब पहुँचाओगे? गाड़ी चलाने का यह कैसा तरीका है? ज़रा, ज़ोर से चाबुक चलाओ, भाई !'

इओना ने बड़ी बेचारगी से कुबड़े लड़के की ओर देखा। उसकी ज़िद देखकर इओना के मन में उदासी और ज़्यादा बढ़ गई तथा धीरे-धीरे अकेलापन उसे फिर घेरने लगा। उधर कुबड़ा फिर से अनाप-शनाप बकने लगा था।

इस बीच दोनों लम्बे लड़क आपस में नदेझदा पित्रोवना नाम की किसी औरत के बारे में बात करने लगे थे।

इओना ने उनकी ओर देखा। फिर वह थोड़ी देर तक चुपचाप कुछ सोचता रहा। फिर उन लड़कों की ओर मुड़कर बुदबुदाया,— 'मेरा बेटा... इसी हफ़्ते गुज़रा है।'

'हम सबको किसी न किसी दिन मरना है।' — कुबड़े लड़के ने खर्र-खर्र खाँसने के बाद अपने होठों को पोंछते हुए धीमे से कहा।

'अरे भाई, ज़रा जल्दी चलाओ न... रफ़्तार बढ़ाओ इसकी। इससे अच्छा तो हम पैदल ही चले जाएँगे।'

'ज़रा, घोड़े पर चाबुक चलाओ, तब वो भागेगा पूरी रफ़्तार से ! कितना सुस्त घोड़ा है।'

'सुन लिया... बूढ़े मियाँ! हम तुम्हारी ख़ुशामद कर रहे हैं और तुम पर कोई असर ही नहीं हो रहा। लगता है, आगे हमें पैदल ही जाना पड़ेगा! क्यों बुढ़ऊ, क्या सोच रहे हो? मेरी बात सुन रहे हो या नहीं?'

इओना इन लड़कों की बातें सुन तो रहा था पर वह अपने में नहीं था और उसका मन इन बातों का जवाब देने का नहीं हो रहा था। फिर भी कुछ तो कहना ही था। वह 'हो-हो' करके हंसा और बोला— 'आप लोग बहुत मज़ाक करते हैं। ख़ुदा आपकी सेहत बनाए रखे!'

'बुढ़ऊ, क्या घर पर बीवी तुम्हारा इन्तज़ार कर रही है?' — उनमें से एक लम्बे लड़के ने पूछा।

' हा-हा-हा... आप लोग बड़े मज़ाकिया हैं ! बेटा, अब, बस, मेरी बीवी ही ज़िन्दा है... वो भी क़ब्र में पैर लटकाए बैठी है। मौत का इन्तज़ार कर रही है... मेरा बेटा तो पहले ही मर चुका है और मैं अभी तक ज़िन्दा हूँ... कितनी अजीब बात है यह। मौत ग़लत दरवाज़े पर पहुँच गई... मेरे पास आने की बजाए वह मेरे बेटे के पास चली गई...'

इओना पीछे घूमकर उन्हें यह बताना चाहता है कि उसके बेटे की मौत कैसे हुई ! पर उसी समय कुबड़ा लड़का एक लम्बी साँस भरकर कहता है, — 'भगवान का शुक्र है! आखिर पहुँच ही गए !' और इओना ने अपनी स्लेजगाड़ी वहीं रोक दी। तीनों एक-एक करके स्लेज से उतर गए। इओना उन सबको सड़क के किनारे बने मकान के अन्धेरे फाटक के उस पार धीरे-धीरे गायब होते देखता रहा।

वह फिर बेहद अकेलापन महसूस करने लगा। चारों ओर सन्नाटा बिखरा पड़ा था...। थोड़ी देर के लिए वह अपना दुख भूल गया था। लेकिन दुख ने फिर से उसे अपनी धुन्ध में घेर लिया था। इओना बेचैन होकर सड़क पर चल रही भीड़ को देख रहा है। मानो वह किसी ऐसे आदमी की तलाश कर रहा हो जिसे वह अपने मन की बात सुना सके। पर सड़क पर आने-जाने वाले इतने सारे लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ नहीं है। इओना भारी दुख में डूबा हुआ है। उसे लग रहा है कि यह दुख जैसे सारी दुनिया को ही अपनी लपेट में ले रहा है। यह दुख दिखाई नहीं देता, लेकिन जैसे उसने एक खोल का रूप धारण करके उसे ऊपर से नीचे तक ढक लिया है। दुख उसके साथ इस तरह से घुलमिल गया है कि यदि भरे-पूरे दिन में रोशनी लेकर भी उसे ढूँढ़ा जाए तो वो कहीं दिखाई नहीं देगा।

तभी इओना को एक चौकीदार दिखाई दिया। 'क्या समय होगा, भाई?’ —उसने चौकीदार से पूछा।

'नौ से ज्यादा हो रहे होंगे इस समय। क्या तुम सवारी का इन्तज़ार कर रहे हो? जाओ, लौट जाओ, भाई, अब सवारी कहाँ मिलेगी।'

इओना कुछ दूर तक आगे बढ़ा, फिर अपना सिर झुकाकर दोहरा हो गया और अपने गम में डूब गया। वह समझ गया है कि शायद ही कोई दूसरा आदमी इस दुख में उसकी सहायता कर पाएगा। वह कुछ देर और उसी हालत में पड़ा रहा। लेकिन फिर वह अपनी हालत से उबर गया और उसने घोड़ी से कहा — ’चल, घर चल, अब लौट चलें !’ उसकी घोड़ी तुरन्त उसकी बात समझ गई और दुलकी चाल से चलने लगी।

लगभग डेढ़ घण्टे बाद इओना एक बहुत बड़े से गन्दे कमरे में आतिशदान के पास बैठा हुआ था। आतिशदान के आस-पास फ़र्श पर और बेंचों पर कई लोग खर्राटे भर रहे हैं। कमरे में बड़ी दमघोंटू गर्मी है। इओना सोए हुए लोगों की ओर देखता है और अपनी पीठ खुजलाता है... उसे अफ़सोस हो रहा है कि वह इतनी जल्दी वापिस लौट आया है।

आज तो घोड़ी के दाने के लिए भी पैसे नहीं मिले —वह सोच रहा है।

तभी कमरे में सो रहा एक जवान कोचवान उठकर बैठ जाता है और उनीन्दा सा कुछ बड़बड़ाता है। फिर वह पानी पीने के लिए बाल्टी की तरफ चला जाता है।

'क्या तुम्हें पानी पीना है?' —इओना उससे पूछता है।

'यह भी कोई पूछने की बात है?'

'अरे नहीं, भाई ! तुम्हारी सेहत बनी रहे! क्या तुम्हें मालूम है कि मेरा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा... तुमने सुना क्या? इसी हफ़्ते... अस्पताल में उसकी मौत हो गई... यह लम्बी कहानी है।'

इओना उस आदमी पर अपनी बात का असर देखना चाहता है, पर उसे कुछ दिखाई नहीं देता। उस आदमी ने अपना चेहरा अपनी बाँहों में छिपा लिया और फिर से गहरी नींद में डूब गया। इओना एक लम्बी सांस लेकर अपना सिर खुजलाता है। उसके बेटे को मरे एक हफ़्ता हो गया है, लेकिन वह अभी तक किसी के भी साथ इस बारे में ठीक से बात नहीं कर पाया है। वह किसी को बहुत धीरे-धीरे यह बताना चाहता है कि कैसे उसका बेटा बीमार पड़ा, कैसे उसने दुख झेला और मरने से पहले उसने क्या कहा और कैसे उसने दम तोड़ दिया। वह यह भी बताना चाहता है कि उसे कैसे दफ़नाया गया। उसने कैसे अस्पताल जाकर बेटे के कपड़े लिए। उस समय उसकी बेटी अनीसिया गांव में ही थी। उसके बारे में भी बताना ज़रूरी है। उसके पास बताने के लिए बहुत कुछ है। उसकी बातें सुनकर लोग ज़रूर गहरी सांस भरेंगे और उससे सहानुभूति जतलाएँगे। औरतों से बात करना बेहतर होता है, लेकिन वे बौड़म होती हैं। भावुकता भरे दो शब्द सुनकर ही वे टसुए बहाने लगती हैं।

चलो, ज़रा घॊड़ी को देखा जाए, इओना सोचता है, सोने का वक़्त तो हमेशा मिल ही जाता है। नीन्द की क्या चिन्ता करूँ!

वह अपना कोट पहनकर अस्तबल में अपने घोड़ी के पास जाता है। उस समय वह घोड़ी के लिए दाना-चना, चोकर और सूखी घास के बारे में सोच रहा है। उसे यह ख़याल भी आता है कि मौसम ख़राब हो गया है, लेकिन अपने बेटे के बारे में अकेले सोचने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाता।

'क्या खाने-चबाने के लिए कुछ है तुम्हारे पास?' — इओना अपनी घोड़ी से पूछता है... वह घोड़ी की चमकती हुई आँखें देखकर कहता है, ' चलो, घास तो है ही। आज घास से ही पेट भरो। आज तुम्हारे लिए दाने का इन्तज़ाम नहीं हुआ। पर कोई बात नहीं, हम सूखी घास खाकर भी ज़िन्दा रह सकते हैं। हाँ, सच बात तो यह है कि अब मैं गाड़ी चलाने लायक नहीं रहा। बूढ़ा हो गया हूँ... मेरा बेटा गाड़ी चला सकता था। कितना शानदार कोचवान था वो। काश, आज वह ज़िन्दा होता !'

इओना कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, — 'हाँ, मेरी प्यारी, मेरी दोस्त ! यही सच है। कुज़्मा इओनिच अब हमारे साथ नहीं है। वह हमें अपना जीवन जीने के लिए छोड़कर चला गया है। सोचो तो ज़रा, तुम्हारे एक बछड़ा हो... और तुम उसकी मां हो ... और अचानक वह बछड़ा तुम्हें छोड़कर चला जाए कि तुम उसके जाने के बाद भी आगे ज़िन्दगी जीती रहो...। कितना दुख पहुँचेगा तुम्हें, है न?'

घोड़ी अपने मुँह में दबी सूखी घास चबाती है। फिर गहरी सांस भरती है, मानो वह भी अपने मालिक के साथ दुखी हो। इसके बाद वह इओना के हाथ को चाटने लगती है, जैसे उसे सान्त्वना दे रही हो।

अपने दुख के बोझ से दबा इओना अपनी घोड़ी को प्यार से सहलाने लगता है। फिर उसे बाँहों में भरकर वह उसे ही अपनी कहानी सुनाने लगता है।

1886

मूल रूसी नाम — तसका (Тоска)