सब्र / महेश दर्पण

Gadya Kosh से
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वह सबसे पिछली सीट पर कंडक्टर के साथ बैठा हुआ था। बस रुकने को हुई तो कुछ लोगों के साथ वह भी उठ खड़ा हुआ।

राजधानी में बस जिस तरह रुकती है, ठीक वैसे ही रुकी और लोग एक के बाद एक, एक-दूसरे को धकियाते हुए उतरने लगे।

उतरने की कोशिश में मैंने उसे भी देखा तो हैरान रह गया। कोहनी से ऊपर उसके दोनों हाथ कटे हुए थे। उन पर पट्टी बंधी थी। दाएँ कंधे पर थैले की बद्दी टंगी थी। कपड़े के उस थैले से उसके कुछ अस्पताली कागज झाँक रहे थे। लुंगी और हवाई चप्पल में अपनी कहानी वह ख़ुद बयान कर रहा था।

जब तक वह एक क़दम बढ़ाने को होता, पीछे से अचानक उसे धकियाता हुआ कोई आगे निकल जाता। आख़िरकार बस चल दी। उसे रास्ता देने के चक्कर में मैं भी नहीं उतर पाया। आवेश में मेरे मुँह से निकला-- "बड़े शहर के बेहद छोटे लोग हैं ये। इतना भी नहीं हुआ इनसे कि एक मुसीबतज़दा इंसान को पहले उतर लेने देते।"

जाने यह सुन कर क्या हुआ कि उसने एक बार मुड़कर मेरी तरफ देखा और फिर कटे हाथ से एक सीट का सहारा लेते हुए बैठ गया। ऐसे जैसे कुछ ख़ास हुआ ही न हो-- “कोई बात नईं जी, अगले स्टैंड पे उतर जाऊंगा।"