समय कथाचक्र / मधुकर सिंह / पृष्ठ 2

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सबसे बड़ा छल

पत्नी की चिट्ठियाँ बराबर आती हैं। इधर एक महीने से वह बहुत तेज लिखने लगी है। पहले तो चिट्ठियाँ दबाये रखता या फाड़कर फेंक देता, मगर इधर उस गँवार औरत पर उसे बड़े जोर का गुस्सा आता है। साली औरत है या कसाई ? ऐसी ही औरतें पुरुषों के भविष्य पर कालिख पोत डालती हैं। उसके भविष्य पर एटम बम गिरा तो वह औरत भी मेकार्थी की तरह पागल होकर मरेगी। कलकत्ते में अपनी जिन्दगी कितनी व्यस्त हो गई है। कितने बड़े-बड़े काम हैं, जिम्मेदारियाँ हैं, क्षुद्र घरेलू जीवन से ऊपर और भी बड़ा एक फर्ज है।

तीन हजार मजदूरों को मालिकों के भरोसे कहीं भी छोड़कर जाना मुश्किल काम है ! वह गँवार इन तमाम मजदूरों के बीच जी सकती तो समझ जाती कि जिस छोटे स्वार्थ में उसे वह घसीटना चाहती है उससे अलग और अनभिज्ञ होकर यह वर्ग एकता की डोर में किस प्रकार हँसते हुए क्रूर मालिकों से लड़ता है। मालिक-मजदूरों का विवाद, महँगाई भत्ता, बोनस, छँटनी जैसी तमाम समस्याओं को दरकिनार कर उसे गाँव जाना पड़ रहा हो यह सच्चाई की कितनी बड़ी हत्या है। वैसे एक हजार गँवार औरतें कुर्बान कर दी जाएँ तब भी क्या पाप लगता है ?

हरामजादी औरत ने तो उसे आश्चर्य में डाल दिया है। (इतनी दया उस औरत ने जरूर दिखलाई थी कि जब गाँव छोड़कर कलकत्ता नौकरी के लिए चला था तो उसने शरीर के गहने उतारकर दिए थे।) उस मूर्ख औरत को क्या मालूम की उसका पति कितना बड़ा आदमी है। मजदूर से लेकर मालिक तक, पब्लिक से लेकर मंत्री तक-तमाम लोग उससे भय खाते हैं। फैक्टरियों में तो उसके बिना पत्ता भी नहीं डोलता। (वह पढ़ा-लिखा ही क्या है ? मैट्रिक तक भी नहीं पढ़ सका था। मगर आज तो बड़े लोग सामने झुकने के लिए मजबूर हैं। यही किसी नौकरी में होता तो पिसता रहता। ज्यादा-से-ज्यादा दरबान रहता या चपरासी) उसने जब से अपने विरोधी यूनियन के मन्त्री को मरवा डाला है तब से पूरे शहर में उसका शोर है। किसी साले ने आँख दिखलाई कि फौरन आँखें काढ़ ली जाती हैं। इधर विरोधी यूनियन के प्रभाव में मजदूरों की चेतना दूसरे किस्म की दिखलाई पड़ने लगी है। उन पर धौंस काम नहीं कर सकता। यह वर्ग बड़ी तेजी से सामने रहा है। (लोग कहते हैं, मजदूरों के लिए राजनीतिक शिक्षा बहुत जरूरी हो जाती है; परन्तु अपने लिए उसने ऐसा कभी महसूस नहीं किया है।) यूनियन के नाम पर उसने अच्छा पैसा अर्जित किया। कलकत्ता में ठाठ की जिन्दगी चलती है। किसी भी फैक्टरी में चरण पहुँचे कि मैंनेजर से लेकर मजदूर तक-एक साथ टकटकी बाँधे खड़े रह जाते हैं। क्या मजाल जो कोई उपेक्षा कर जाए।

पत्नी को यह सब कहाँ मालूम है ! वह तो बस गाँव के घरेलू और छोटे संघर्ष से ही ऊब गई है। कभी उसे चाचा सताते हैं, कभी गाँव वाले। चाचा हरवंश सिंह कितने भले आदमी हैं, उस औरत को नहीं मालूम। जब कलकत्ता में दरबानी ढूँढ़ रहा था, तब चाचा ने ही उसे शरण दी थी। यह चाचा का ही आशीर्वाद था कि उन्होंने अपने चटकल के मजदूरों से परिचय करा दिया था। चाचा और उसकी उम्र में कोई ज्यादा अन्तर नहीं है। मगर चाचा मुंशी से आगे नहीं गए और उसकी तरक्की यहाँ तक बढ़ गई कि वह पिछले सात साल से अपनी यूनियन का मंत्री है। नौकरी छोड़े सात साल हो गए। (अब तो नौकरी करना भी हराम लगता है।) चुनाव में हर साल जीत उसी की होती है। (मगर विरोधी यूनियन से टक्कर लेना अब आसान नहीं है। अपनी साख धीरे-धीरे खत्म हो रही है।) अभी तक यही होता रहा है कि उसके विरोध में खड़े होनेवाले कई नामों के चर्चा के साथ चुनाव की सरगर्मी शुरू होती है और चुनाव के दिन तक सभी आत्मसमर्पण कर जाते हैं। ऐसे सौभाग्य को पत्नी गाँव में बुलाकर कालिख लगा देना चाहती है।

उसकी इच्छा है कि गाँव आकर वह चाचा और अन्य सगे-संबंधियों के साथ अपनी ताकत का दुरुपयोग कर दे। हरवंश चाचा का दुर्भाग्य कि वे चटकल की यातनाओं से बहुत जल्दी घबड़ा गए। उन्हें मालिकों से समझौता करना नहीं आया। घर की चिन्ता ने उन्हें जल्दी गाँव में वापस बुला लिया। (हाँ, इधर कई महीने से चाचा के पत्र नहीं आ रहे हैं। लगता है, चाचा गाँव के छोटे-छोटे दलदलों में जा फँसे हैं।) चाचा का अन्तिम पत्र पढ़कर आज भी हँसी आती है, कलकत्ता बड़ा लुटेरा शहर है। वहाँ आदमी बहुत जल्दी मशीन हो जाता है।

चाचा को यह एहसान नहीं भूलना चाहिए कि उसके बाप ने चाचा को बेटे की तरह पोसकर सयाना किया है। जब चाचा को जन्म देने के छ: महीने के बाद ही उनकी माँ एक पड़ोसी के साथ रंगून भागकर चली गई तो उसके बाप ने ही गोद ले लिया और माँ कलेजे से साटकर पालने लगी। चाचा के बाप तो उनके जन्म के चार माह पहले ही मर गए थे। उनका मकान, खेत, जमीन-सब कुछ रेहन हो गया था। मगर उसके बाप ने चाचा की सारी जमीन इसलिए छुडवा दी कि सयाना होने के बाद चाचा अपनी जिन्दगी बसर करेंगे। मगर उसके बाप के मरते ही एक दिन चाचा ने कहा, देवनाथ ! भैया की मृत्यु के बाद घर को सँभालने वाला कोई भी मरद नहीं रह गया है। मुझे गाँव लौटना ही होगा। वैसे भी कलकत्ता मुझे काटने के लिए दौड़ता है। चार-पाँच साल यहाँ न मालूम कैसे रह गया। अब तो चार-पाँच घण्टा यहाँ रुकना भी मुश्किल लग रहा है-उसने समझ लिया था, अब चाचा यहाँ एक दिन के लिए भी रुकने वाले नहीं हैं। सारी दुनिया उलट जाए, चाचा का वचन नहीं डोल सकता।

चाचा को इतना बड़ा नमकहराम नहीं होना चाहिए। उसे कलकत्ते में साथ-साथ जीने के दिन अच्छी तरह याद हैं। लोग यही कहाँ करते थे, दोनों चाचा-भतीजा नहीं, संसार में अजीबोगरीब और अलौकिक दोस्त हैं। (कई दिन दोनों साथ-साथ सोनागाछी टहलने गए थे और रिपन स्ट्रीट के होटलों में गश्त लगाते बगैर माँ-बाप के लड़के-लड़कियों को छेड़ने में उन्हें एक साथ बड़ा मजा आता था।) ऐसे निराले और दोस्त चाचा पर पत्नी को किसी प्रकार के संदेह होने लगे तो पत्नी की शैतानी को क्या कहाँ जाए ? छोटी बात के लिए तार पर तार ठोके जा रही है। चार-पाँच एकड़ जमीन चली ही गई तो उसमें क्या रखा है ? अब कौन खेती की तरफ ताकता है ! सब लोग तो शहर की ओर भाग गए हैं और होशियार लोगों के शहर में बड़े-बड़े बिजनेस हैं, सिनेमाघर हैं, ट्रक और बसें चलती हैं, ठेकेदारी और गाँजा का व्यापार है अथवा सहकारी समितियों, नगरपालिकाओं, विधान-सभाओं या लोकसभा के लगातार सदस्य और मन्त्रिमण्डल में भी हैं।

वह औरत उसे कुछ भी बनने नहीं देगी। उन लोगों के सामने उसका यूनियन में मन्त्री-पद क्या है ? वह तो उनके सामने बौना है, जिसकी कोई हैसियत नहीं। (काश ! वह थोड़ी भी पढ़ी-लिखी होती। कम-से-कम उसके बराबर ही। तब तो उसे निश्चय ही एम.एल.ए. बनवाकर बैठा देता। मजे में शहर रहती। गाँव की खेती पर किसी को भी आँख उठाने की हिम्मत नहीं होती।) मगर करम में तो ढेला है। चिट्ठी लिखने-भर ही पढ़ना जानती है।

लेकिन पत्नी उसे आश्चर्य में डाले हुए है। गाँव में अकेली जिम्मेदारियाँ सँभालती है। दस एकड़ जमीन, दो बैल, माँ और पाँच बच्चों की गृहस्थी को मजे से चला रही है। इसके बावजूद वह उसे बिलकुल बड़ी नहीं लगती है और न कभी उसकी चिट्ठी ही उसके सामने कोई सवाल बनी है। दिन-भर की थकान के बाद रात में जवाब देने के लिए एकाध बार सोचा है; परन्तु अखबारों, वक्तव्यों और किताबों से रात के वक्त भी एकदम फुर्सत नहीं मिलती। अब पत्नी के लिए सोचा जाए, या तीन हजार मजदूरों के लिए। सबसे बड़ी चीज तो यह है कि वह यूनियन का साप्ताहिक अकेले निकाल लेता है। कुल मिलाकर उसकी यही धंधा है। कभी मजदूरों की माँगों, बोनस अथवा छँटनी के विरुद्ध आवाज उठा दी या कभी अधिकारियों को धमाका दिया-फर्ज के नाम पर सप्ताहिक उसे जिन्दा ढोहे जा रहा है। (कभी–कभी बड़ा मजा आता है, मालिकों और सरकार को छेड़ने में। कोई-न-कोई कार अपने दरवाजे के सामने आकर लग ही जाती है। इस बीच अपनी भी कुछ धंधा हो ही जाता है। उधर मजदूरों में धाक दुगुनी हो जाती है।) ऐसी सारी जिम्मेदारियों के सामने तो पत्नी बहुत छोटी लगती है। कितने छोटे दिमाग की नारी है कि जेल को खौफ समझ जाती है और नेताओं तथा मन्त्रियों की तरह उसे भी सुविधा और भोग में देखना चाहती है।

इस बार के पत्र को देखकर उसे गुस्सा आता है। पत्नी ने बुलाया है, रेल या हवाई जहाज से जल्दी पहुँचना है। इतनी बातें अगर तार में अँटतीं तो वह तार भेजने वाली थीं। बड़ी होशियारी है और घर-गृहस्थी को उससे ज्यादा समझती है। मगर वह यह नहीं समझती कि देवनाथ शहर की कमाई को ही आदमी की सबसे बड़ी उपलब्धि समझता है। बँटाईदार हल्ला मचा रहे हैं, कब तक मचाएँगे ? ये सारी कागजी बातें हैं। सरकार में भी तो वैसे हजारों लोग पड़े हुए हैं जिन्हें अपनी जमीन के लिए दर्द है। इतनी आसानी से बँटाईदार को जमीन देने के लिए कोई तैयार नहीं है। वे जो जमीनों पर आँख गड़ाए हुए हैं उनकी आँखें फोड़ दी जाएँगी। (बेचारी पत्नी ने उसी की सलाह पर दोनों बँटाईदारों को अपनी जमीन पर बस जाने दिया था। अब पत्नी का कहना है कि वे इस जमीन को आसानी से छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टी कहती है कि उन्हें बेदखल कर देना गैर-कानूनी है। कम्युनिस्ट पार्टी के असर को बंगाल में अच्छी तरह जान गया है।) मगर हम सालों को मार भगाएँगे। उनके बाप की जमीन है ? देवनाथ दाँत किटकिटाता है और तब पत्नी और गाँव से सहानुभूति होने लगती है।