सिनेमा और समाज का बीमार दृष्टिकोण / जयप्रकाश चौकसे

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सिनेमा और समाज में बीमार दृष्टिकोण

प्रकाशन तिथि : 05 फरवरी 2011

हमारे सिनेमा में प्राय: बीमारियों और कुदरती कमतरियों का प्रस्तुतीकरण सतही और हास्यास्पद होता है। समाज और सिनेमा दोनों में ही बीमारी से जुड़ी लोकप्रिय कुरीतियों को बढ़ावा दिया जाता है और पूरा दृष्टिकोण ही गैरवैज्ञानिक और भ्रामक होता है। कई बार अंदाजे बयां इस कदर रूमानी होता है कि व्याधि ही गरिमा मंडित हो जाती है। ऋषिकेश मुखर्जी की 'आनंद' में मनुष्य मन में आह्लाद की कथा है, परंतु कैंसर पीडि़त व्यक्ति की व्यथा का यथार्थ चित्रण नहीं है। सीवी श्रीधर की 'दिल एक मंदिर' में कैंसरग्रस्त राज कुमार स्वस्थ हो जाते हैं और इलाज की प्रक्रिया में स्वस्थ डॉक्टर राजेंद्र कुमार मर जाते हैं।

बंगाल के एक उपन्यास 'स्वयं सिद्धा' में पैदाइशी मनोरोगी को पत्नी अपनी सेवा से निरोग करती है और दौलत के लालची रिश्तेदारों के षड्यंत्र को विफल करती है। इस कथा पर अनेक भाषाओं में फिल्में और सीरियल बने हैं। यह सावित्री कथा की ही प्रेरणा है। संजीव कुमार-मुमताज अभिनीत 'खिलौना' में तो मरीज की सेवा के लिए वैश्या की सेवाएं ली गई हैं। बीमारियों पर पश्चिम में विश्वसनीय फिल्में बनी हैं और प्राय: ऑस्कर से सम्मानित भी की गई हैं। अंगे्रजी में भी सम्मानजनक ढंग से उन्हें 'चिल्ड्रन ऑफ लैसर गॉड' कहा गया है।

भारतीय समाज में एक मान्यता यह है कि लाइलाज बीमारियां विगत जन्म या इसी जन्म के बुरे कर्मों का परिणाम हैं और इसे ईश्वरीय दंड के रूप में प्रस्तुत किए जाने के कारण ही हमारा दृष्टिकोण दूषित हो गया है। अत: पैदाइशी व्याधियों के प्रति हमारी उदासीनता हमारे सदियों से जमे हुए पूर्वग्रह हैं। हमारे गं्रथों की व्याख्या में दंड का विवरण है, परंतु दया को नजरअंदाज किया गया है और मानवीय प्रेम को श्रेष्ठतम उपचार के रूप में हम केवल उसकी नाटकीयता को ग्रहण करते हैं।

बहरहाल असित सेन की 'खामोशी' में नर्स वहीदा रहमान दिमागी खलल वाले रोगियों को प्यार से स्वस्थ करती हैं और ठीक होते ही रोगी उनके प्यार को विस्मृत कर देता है। सेवा का प्रयोग स्वयं वहीदा को मनोरोगी बना देता है। इसमें किशोर कुमार का गीत 'वो शाम कुछ अजीब थी...' अत्यंत मधुर था और मन्ना डे ने भी 'रम से भागे गम, जिन से भागे भूत प्रेत...' में कमाल किया था। खाकसार की शायद मर्सी किलिंग पर पहली फिल्म थी, परंतु सेंसर की जिद के कारण क्लाइमैक्स बदलना पड़ा था। हमारे समाज में शारीरिक कमतरियों का प्राय: मखौल उड़ाया जाता है और लंगड़ा, बौना, पागल इत्यादि संबोधनों से उन्हें पुकारा जाता है।

प्राय: मिर्गी के रोगी को जूता सुंघाया जाता है और हिकारत से देखते हुए उसे पागल ही समझा जाता है। मिर्गी अर्थात एपिलेप्सी के कई कारण हो सकते हैं, मस्तिष्क पर चोट भी हो सकती है। कई बार किसी इंफेक्शन का लंबे समय तक इलाज न होने के कारण भी यह हो सकता है। कई बार इसके सूक्ष्म कारण अज्ञात ही रह जाते हैं और सीटी स्कैन से भी कोई मदद नहीं मिलती। इसके 70 प्रतिशत रोगी दवाएं लेने से ठीक हो जाते हैं। दरअसल हर मनुष्य के शरीर में बिजली प्रवाहित रहती है, परंतु इसकी अधिकता के कारण मिर्गी का दौरा आता है और दवाएं इस इलेक्ट्रिसिटी को संतुलित करती हैं।

महान विचारक एवं संपादक राजेंद्र माथुर के स्पर्श से कभी-कभी बिजली का झटका लगता था, परंतु उनका मस्तिष्क इससे सर्वथा अछूता था। शायद यह अतिरिक्त बिजली ही उनके लेखों में कौंध जाती थी। डॉ. ऑलिवर सैक्स ने न्यूरोलॉजिक व्याधियों पर कई किताबें लिखी हैं। अनेक व्याधियों की वैज्ञानिक जानकारी देना मीडिया का कत्र्तव्य है। इंदौर के डॉक्टर अपूर्व पौराणिक सिनेमा, समाज और मीडिया में एपिलेप्सी के बारे में प्रचारित चीजों का अध्ययन कर रहे हैं। उनसे apauranik@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।