सिनेमा के कवि सत्यजीत रे की जन्म शती / जयप्रकाश चौकसे

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सिनेमा के कवि सत्यजीत रे की जन्म शती
प्रकाशन तिथि : 02 मई 2020


सत्यजीत रे का जन्म दो मई 1921 को हुआ था और अगले वर्ष उनकी जन्मशती दुनियाभर में मनाई जाएगी। सत्यजीत रे एक प्रकाशन संस्था में पुस्तक सज्जा का काम करते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के एक संस्करण का कवर उन्होंने डिजाइन किया था। यह किताब विदेशों के पाठ्यक्रम में शामिल है। प्रकाशन संस्था का हेड ऑफिस लंदन में था। सत्यजीत रे ने कुछ समय लंदन में काम किया। कलकत्ता में ‘द रिवर’ नामक फिल्म की शूटिंग सत्यजीत रे ने देखी और इस माध्यम के प्रति उनकी उत्सुकता जागी। उन्होंने फिल्म माध्यम पर लिखी हुई किताबें पढ़ीं। विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास ‘पाथेर पांचाली’ से प्रेरित पटकथा लिखी। उनकी लिखी पटकथाओं में शब्दों से अधिक रेखा चित्र बनाए जाते थे। उन्होंने नए कलाकारों और तकनीशियंस का चयन किया। सोमवार से शुक्रवार वे कंपनी के दफ्तर में काम करते थे। शनिवार और इतवार को ही शूटिंग करते थे। इस तरह वे सप्ताहांत फिल्मकार कहलाए। उनके सीमित साधनों से फिल्म की तीन चौथाई शूटिंग पूरी की गई। उनके पिता के मित्र बी.सी. रॉय तत्कालीन सीएम थे। बी.सी. रॉय की सिफारिश पर उन्हें बंगाल सरकार से ‘पाथेर पांचाली’ को पूरा करने का धन प्राप्त हुआ। पारंपरिक वितरण व्यवस्था में सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ के लिए कोई स्थान नहीं था। बंगाल सरकार की सिफारिश पर फिल्म को कान फिल्म महोत्सव में भेजा गया।

समारोह आयोजकों ने इस फिल्म का प्रदर्शन प्रात: 10 बजे रखा। जूरी सदस्य देर रात तक चली दावत के कारण उनींदे से फिल्म देखने महज रस्म अदायगी की खातिर गए। फिल्म शुरू होते ही सदस्य सो गए। जूरी सदस्य आन्द्रा वाजा जागते रहे। फिल्म समाप्त होने पर उन्होंने अपने साथियों को कॉफी पीकर तरोताजा होने की सलाह दी और फिल्म दोबारा चलाई गई। जूरी सदस्यों ने एकमत से ‘पाथेर पांचाली’ को सर्वकालिक महान फिल्म माना। इस तरह एक जागते रहने वाले मनुष्य आन्द्रा वाजा ने विश्व सिनेमा को एक अजर अमर फिल्म प्रदान की। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सत्यजीत रे से कहा कि वे पंडित नेहरू पर वृत्तचित्र बनाएं। सत्यजीत रे ने कहा कि उन्हें राजनीति में दिलचस्पी नहीं है। कुछ समय बाद सत्यजीत रे ने विदेशी मुद्रा के लिए आवेदन किया। पहली मुलाकात के समय मौजूद अफसर ने आवेदन अस्वीकृत किया, यह सोचकर कि इंदिरा गांधी को अच्छा लगेगा। फिल्म समीक्षक चिदानंद दासगुप्ता ने इंदिरा गांधी से बात की। इंदिराजी ने उस अफसर को लताड़ा और सत्यजीत रे को विदेशा मुद्रा उपलब्ध करा दी। ज्ञात हो कि इंदिरा गांधी के निकट रही नरगिस दत्त ने राज्यसभा में कहा कि सत्यजीत रे की फिल्मों में भारत की गरीबी का प्रदर्शन होता है और विदेशी वाह-वाह करते हैैं। इंदिरा गांधी ने नरगिस को अपना बयान वापस लेने का आदेश दिया। मुद्दा तो गरीबी दूर करने का है। फिल्म में उसे दिखाना कोई मुद्दा ही नहीं है।

यह एक रोचक जानकारी है कि ‘पाथेर पांचाली’ के निर्माण के लिए किशोर कुमार ने भी सत्यजीत रे को पांच हजार रुपए दिए थे। किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता के परिवार का सत्यजीत रे से दूरदराज का रिश्ता था। जब भी सत्यजीत रे ने पांच हजार रुपए लौटाने का प्रयास किया, किशोर कुमार ने इनकार कर दिया। वे इस महान फिल्म से इसी नाते जुड़े रहना चाहते थे। किशोर कुमार की ‘दूर गगन की छांव में’ सत्यजीत रे से प्रभावित व प्रेरित फिल्म है। राज कपूर ने सत्यजीत रे की ‘गोपी गायेन बाघा बायेन’ हिंदी में बनाना चाहा तो बात इसलिए नहीं बनी कि सत्यजीत रे अपनी बंगाली फिल्म के कलाकारों को लेना चाहते थे, परंतु राज कपूर चाहते थे कि मुंबई के कलाकारों के साथ फिल्म बनाई जाए। जीवनभर सिने इतिहास रचने वाले ने अपनी मृत्यु पूर्व भी ऑस्कर के इतिहास में पहली बार परिवर्तन कराया। सत्यजीत रे को ऑस्कर देने के लिए कमेटी के अध्यक्ष कलकत्ता आए। सत्यजीत रे बीमारी के कारण यात्रा नहीं कर सकते थे। मानवीय करुणा के गायक की जन्मशती तक संसार कोरोनामुक्त हो जाए। इदन्नमम्।