हिंदी पखवाड़ा: एक रस्म अदायगी / जयप्रकाश चौकसे

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हिंदी पखवाड़ा: एक रस्म अदायगी
प्रकाशन तिथि : 14 सितम्बर 2018


आज भारत में मनाए जा रहे हिंदी पखवाड़े का समापन है। राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के बाद भी आर्थिक गुलामी जारी है और इसी के साथ अंग्रेजी देश में महारानी की तरह आज भी तख्त पर विराजमान है। बस या कार से यात्रा करते समय छोटे कस्बों में भी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाली संस्थाओं के विज्ञापन देखे जा सकते हैं। संभवत: सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाले लोग भारतीय ही हैं। अधिकांश हिंदी अखबारों में एक या दो पृष्ठ अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होते हैं। विज्ञापनों में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 19 करोड़ लोग अखबार पढ़ते हैं। अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित पाठकों की संख्या से तीन गुनी अधिक संख्या भारतीय भाषाओं में प्रकाशित अखबारों की है परंतु विज्ञापन दरें अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित अखबारों को बहुत अधिक मिलती है। कॉर्पोरेट अंग्रेजी अखबारों को मंहगे विज्ञापन देते हैं, जबकि भारतीय भाषा के अखबारों की प्रसार संख्या कहीं अधिक है। हिंदी में लिखने वाले पत्रकारों से अधिक धन अंग्रेजी में लिखने वाले पत्रकारों को दिया जाता है। हिंदी प्रकाशन व्यवसाय का यह हाल है कि वे कवि और लेखक से कहते हैं कि 400 किताब उन्हें खरीदनी होंगी, जिसका मूल्य अग्रिम देना होगा। इस तरह कवि से धन लेकर उसकी किताब प्रकाशित की जाती है। प्रकाशक सरकारी पुस्तकालय को पुस्तक बेचते हैं और इसके लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है। इसी कारण पुस्तकों का मूल्य अधिक रखा जाता है। बहुत कम प्रकाशक अपने लेखकों को रॉयल्टी देते हैं। आज़ादी के पहले कवियों ने रॉयल्टी के सहारे ही अपने परिवार का खर्च प्राप्त किया है। आज कोई भी लेखक कवि केवल रॉयल्टी के दम पर जीवन यापन नहीं कर सकता। इसलिए पार्ट-टाइम लेखक हैं।

अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाली संस्थाओं में फीस बहुत अधिक है। इरफान खान अभिनीत फिल्म 'हिंदी मीडियम' का भाग दो भी बनने जा रहा है। पहले भाग में सुविधाहीन वर्ग के लिए कुछ आरक्षण है और नायक अपनी पत्नी सहित सुविधाहीन लोगों की बस्ती में रहने जाता है ताकि उसके बच्चे को दाखिला मिल सके। कुछ संस्थाओं में दाखिले के लिए भारी रकम कैपिटेशन फीस के रूप में दी जाती है। रिश्वत देकर दाखिला पाया छात्र शिक्षा ग्रहण करके रिश्वत ही लेता है। उसे अपनी शिक्षा पर खर्च की लागत वसूल करनी है। हिंदुस्तानी भाषा में बनी फिल्मों के मधुर गीत-संगीत ने हिंदी का प्रचार किया है। दक्षिण भारत के अधिकांश लोग फिल्मों के कारण ही हिंदी सीख जाते हैं परंतु सार्वजनिक रूप से इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते। भाषा के आधार पर कुछ दल राजनीति करते हैं।

विदेशों में बसे भारतीय अपने बच्चों को हिंदी सीखने के लिए हर इतवार को पढ़ने भेजते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे मात्र भाषा का ज्ञान प्राप्त करें। यह अपनी जड़ों से जुड़ने का प्रयास है। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने 'सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार' खाकसार को प्रदान किया है। संस्था के एक अफसर ने अपने अमेरिका में बसे पोते की इतवारिया हिंदी पाठशाला में लेख पढ़ाते देखा था। एक घटना इस तरह की है कि बादशाह अकबर यह जानना चाहते थे कि मुख्य स्वाभाविक भाषा कौन सी है। उनकी सोच थी कि कुछ लोग संस्कृत में प्रार्थना करते हैं, कुछ फारसी या उर्दू में प्रार्थना करते हैं। ऊपरवाला किस भाषा में की गई प्रार्थना स्वीकार करता है। उन्होंने आगरा से कुछ दूर जंगल में एक छोटा महल बनाया, जहां एक नवविवाहित दंपति को सेवकों के साथ रखा गया और सबको हिदायत दी गई थी कि वह एक शब्द भी न बोलें। जब वहां जन्मा शिशु तीन वर्ष का हुआ तो बादशाह वहां गए। बच्चे के मुंह से सियार की आवाज निकली। बादशाह जान गए कि बच्चा अपने आस-पास जो भाषा सुनता है वही भाषा वह बोलता है। इस प्रयोग के कारण उस महल को 'गूंगा महल' के नाम से जाना जाता था और विष्णु खरे ने इस पर एक कविता रची है। आजकल विष्णु खरे दिल्ली के अस्पताल में भर्ती हैं, उन्हें पक्षाघात हुआ है। अभी तक अचेत हैं। उनके जैसे विलक्षण प्रतिभा के धनी के लिए प्रार्थना की जानी चाहिए। हिंदी को लेकर नारेबाजी करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम पाठशाला में भेजते हैं। हमारे सोच-विचार में बसा दोगलापन ही इस क्षेत्र में भी नज़र आता है। एक रिपोर्ट कहती है कि विश्व में वे ही राष्ट्र खुशहाल है जहां मातृ भाषा में सारा कामकाज होता है। महाभारत में अर्जुन जब चक्रव्यूह से निकलने का तरीका बता रहे थे तब सुभद्रा सो गई थीं। उदरस्थ अभिमन्यु सीख नहीं पाए । मनुष्य पहले सुनना सीखता है, बाद में देखना। आजकल वह वही सुनता और देखता है जो व्यवस्था चाहती है।