‘झुंड’ में अमिताभ और नागराज का खेल / जयप्रकाश चौकसे

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‘झुंड’ में अमिताभ और नागराज का खेल
प्रकाशन तिथि : 09 फरवरी 2022


गौरतलब है कि अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘झुंड’ का निर्देशन नागराज मंजुले कर रहे हैं। ये वही नागराज हैं जिनकी फिल्म ‘सैराट’ ने कई पुरस्कार प्राप्त किए थे। ‘झुंड’ एक शिक्षक की कहानी है। फुटबॉल की पृष्ठभूमि पर बनने वाली इस फिल्म में किशोरवय के खिलाड़ियों की भूमिकाओं के लिए चयन, झोपड़पट्टी में रहने वाले साधनहीनों में से किया गया है। डैनी बॉयल की फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के लिए भी ऐसा ही किया गया था। क्रिकेट में प्रायोजकों को इस खेल से लाभ मिलता है। हॉकी और फुटबॉल इसीलिए हाशिए पर फेंक दिए गए हैं। भारत की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को देखते हुए कबड्डी और फुटबॉल को प्राथमिकता देनी चाहिए। बाजार की शक्तियों द्वारा संचालित जीवन में फुटबॉल और कबड्डी उन्हें लाभप्रद नजर नहीं आते। फिल्म निर्देशक का कहना है कि अमिताभ बच्चन हर सीन कई तरह से अभिनीत करके दिखाते हैं। निर्देशक चुनाव करता है कि उसकी फिल्म के संपूर्ण प्रभाव के लिए कौन सा दृश्य अधिक प्रभावोत्पादक होगा। भारत में बंगाल और गोवा में फुटबॉल लोकप्रिय है। अन्य स्थानों पर क्रिकेट के लिए दीवानगी है। बोनी कपूर की एक अंडर प्रोडक्शन फिल्म भी फुटबॉल कोच के जीवन से प्रेरित है। कोरोना के कारण उनके विदेश से आए खिलाड़ी लौट गए हैं। समुद्र के किनारे बसे द्वीप पर सेट लगाया तो तूफान उसे बहाकर ले गया परंतु बोनी कपूर हार मानने वालों में से नहीं हैं।

गोया की एक फुटबॉल कथा में साधन संपन्न परिवार के किशोर को गहरी चोट लग जाती है। इलाज प्रक्रिया में डीएनए की जांच आवश्यक हो जाती है। मां-बाप से खिलाड़ी का डीएनए मैच नहीं करता। किशोर की जान बचाने के लिए असली माता-पिता में से कम से कम एक का डीएनए मैच करना चाहिए। दरअसल उस लड़के को जन्म देने वाली महिला साधन संपन्न व्यक्ति से शादी कर चुकी है। उसकी दुविधा यह है कि सत्य बताने पर उसका पति उसे छोड़ देगा क्योंकि उसने विगत जीवन का तथ्य उसे बताया नहीं था। मानसिक द्वंद्व में मातृत्व जोर मारता है और वह सब कुछ स्वीकार कर लेती है कि एक व्यक्ति ने उससे प्रेम का दिखावा मात्र किया था। इस रोमांचक कथा में प्रेम में छल करने वाले व्यक्ति की खोज की जाती है। एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी उसे खोज लेती है। वह मौके का लाभ उठाना चाहता है। महिला का साधन संपन्न पिता उसे खूब धन देता है। किशोर के प्राण बचा लिए जाते हैं। इतने बरस तक एक अनाथ को सुविधा-संपन्न जीवन देने वाले अपार दुख झेल रहे हैं। किशोर को जन्म देने वाले उनके दुख को समझते हैं और उस किशोर पर पूरा हक देकर अपने लिए नए रास्ते खोजते हैं। अरसे पहले नसीरुद्दीन शाह अभिनीत फुटबॉल केंद्रित फिल्म ‘सितम’ बनी थी। फिल्म में गोलकीपर का पात्र अपने सीने पर एक करारी किक झेलता है। जिस वजह से उसकी मृत्यु हो जाती है। किक मारने वाला खिलाड़ी अपराध बोध से दबा हुआ है और श्वास लेने में भी कठिनाई पा रहा है। मर जाने वाले गोलकीपर की पत्नी उसे अपराध बोध से मुक्त कराती है।

विज्ञान की एक अलग शाखा है, जो खेल के दौरान खिलाड़ियों को लगने वाली चोटों को ठीक करती है। ज्ञातव्य है कि कुछ समय पूर्व अक्षय कुमार अभिनीत ‘गोल्ड’ एक रोचक फिल्म बनी थी। महिला हॉकी प्रेरित शाहरुख खान अभिनीत फिल्म ‘चक दे इंडिया’ भी अत्यंत रोचक फिल्म रही है। गुजरे हुए दौर में एक स्कूल खोलने के लिए कम से कम 4 एकड़ जमीन जरूरी होती थी। खेलने के मैदान स्कूल में आवश्यक माने जाते थे। आज तो महानगरों में बहुमंजिला इमारतों में तीन शिफ्ट में स्कूल लगते हैं। स्कूलों में खेलने के मैदान ही नहीं हैं, जबकि खेलना शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दरअसल, लगभग सभी क्षेत्रों में हमने साधन को साध्य बना दिया है।