“व्हेन वी लीव” एक स्त्री का संघर्ष / राकेश मित्तल

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“व्हेन वी लीव” एक स्त्री का संघर्ष
प्रकाशन तिथि : 22 नवम्बर 2014


ऑस्ट्रिया मूल की युवा फिल्म निर्देशिका, लेखिका और अभिनेत्री फिओ अलादाग अत्यंत विदुषी महिला हैं । लंदन और विएना में बाकायदा अभिनय का प्रशिक्षण लेने के साथ साथ उन्होंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर एवं मनोविज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है । अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत उन्होंने एक अभिनेत्री के रूप में की । इसी दौरान टर्किश मूल के जर्मन फिल्म निर्देशक ज़ुली अलादाग से उनका विवाह हुआ किन्तु दस साल बाद उनमें तलाक हो गया । इस बीच उन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल संस्था के साथ जुड़कर महिला हिंसा विरोधी अभियान में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। उनपीड़ित महिलाओं को देख कर उन्हें अपनी पहली फिल्म “व्हेन वी लीव” की कहानी लिखने की प्रेरणा मिली । वर्ष २०१० में प्रदर्शित इस फिल्म की वे निर्मात्री एवं निर्देशिका भी हैं । इस फिल्म में उन्होंने एक युवा मुस्लिम महिला के अस्तित्व और अस्मिता के संघर्ष को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है । यह एक स्त्री के स्वाभिमान, आत्मसम्मान और सहिष्णुता की लड़ाई के साथ साथ उसके सामंजस्यपूर्ण सहस्तित्व में अडिग विश्वास की कहानी है ।

फिल्म की कहानी नई नहीं है । इस तरह की घटनाएं हमारे आसपास बिखरी पड़ी हैं और हम शायद इनके प्रति इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि ये हमें सामान्य जीवन का हिस्सा लगने लगी हैं । लगभग हर समाज में मर्यादा और नैतिकता का पैमाना स्त्री के समर्पण भाव से आँका जाता है । अपने मायके और ससुराल से नाता तोड़कर एक स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार स्त्री को नहीं होता । यदि कोई स्त्री यह प्रयत्न करती है तो समाज की भोहें तन जाती है । फिर शुरू होता है कटाक्ष और व्यंजनाओं का अंतहीन सिलसिला । यह फिल्म उसी संघर्ष की कहानी है ।

फिल्म की नायिका उमय (सिबेल केकिली) एक जर्मन टर्किश मुस्लिम परिवार की संतान है जो अपने पति कमाल (उफ़क बरख्तार) औरआठ वर्षीय पुत्र सेम (निज़ाम शिलर) के साथ इस्ताम्बुल में रहती है । कमाल बेहद उग्र स्वभाव का है और लगभग रोज अपनी पत्नी और बच्चे को बुरी तरह पीटता है । इससे तंग आकर एक दिन उमय अपना सामान समेट कर बच्चे के साथ पिता कादर (सत्तार तरिओजन)के घर बर्लिन लौट आती है । उसे उम्मीद थी की वहां उसे सहारा मिलेगा लेकिन जैसे ही उसके घरवालों को यह पता चलता है की वह हमेशा के लिए वहां रहने आ गई है तो वे आग बबूला हो जाते हैं । हर सदस्य उसे समझाने लगता है की वह गलत कर रही है । मार पिटाईऔर हिंसा पुरुष का सहज स्वभाव है । जो हाथ पीटते हैं वही सहारा भी देते हैं । इन छोटी बातों के लिए घर नहीं छोड़ा जाता । शादी के बाद स्त्री को हर परिस्थिति में पति के साथ ही रहना चाहिए । लेकिन लाख समझाने पर भी उमय वापस जाने को तैयार नहीं होती । इसके पहले की घरवाले उसे जबरन भेज दें, वह पुलिस की मदद से अपने घर से निकल जाती है और अलग रहने लगती है । लेकिन उसका यह निर्णय परिवार और समाज नामक इकाई के लिए चुनौती है और वे हर तरह से उसे अपमानित करने की कोशिश करते हैं । उसी के भाई, पिता और पति उसकी जान के दुश्मन बन जाते हैं ।

उमयमुस्लिम होकर भी एक जर्मन नागरिक है, वहीँ पली बढ़ी है । उसके लिए यह सब सहन कर पाना मुश्किल है । वह सोचती है की आखिर उसकी अपनी कोई जिंदगी है या नहीं ? क्या उसे सिर्फ दूसरों के लिए ही जीना है ? अपने परिवार से वह बहुत प्यार करती है किन्तु उनके लिए उसका वापस लौटना परिवार की इज्ज़त को खाक में मिला देना है । वे किसी भी कीमत पर इस अपमान को सहन करने को तैयार नहीं है ।

फिल्म के कई दृश्य झझकोर कर रख देते हैं । उमय की छोटी बहन एक लड़के से प्रेम करती है और उस लड़के के साथ उसकी शादी होने वाली है । एक रात बहन के साथ सोते हुए वह उससे वादा करती है की वह कहीं भी रहे, उसकी शादी में जरूर आएगी । बाद में उमय की हरकत के कारण छोटी बहन की सगाई टूटने की कगार पर आ जाती है किन्तु माता पिता के बहुत प्रयास के बाद अंततः वह शादी हो जाती है । उमय सिर्फ अपने किये हुए वादे के कारण बिन बुलाये भी बहन की शादी में सम्मिलित होने के लिए आती है किन्तु उसका भाई खुद हाथ पकड़ कर उसे समारोह से बाहर धकेल देता है । जब वह कहती है की मैंने तुम्हें गोद में खिलाया है और रात रात भर जागकर तुम्हारे डायपर बदले हैं फिर भी तुम मुझे यह सिला दे रहे हो तो वह उसके गाल पर जोरदार तमाचा जड़ देता है । एक अन्य दृश्य में किसी विशेष अवसर पर वह अपने हाथ से बनाई मिठाई पिता को खिलाने आती है किन्तु पिता उससे नहीं मिलते और उसे धक्के मार कर घर से भगा दिया जाता है । उसके ससुराल के साथ साथ मायके के लोग भी पूरी ताकत से इस मुहीम में लगे रहते हैं कि उसका बच्चा ससुराल वालों को सौंप दिया जाए ।

फिल्म अंत तक आते आते हमें निःशब्द कर देती है । अच्छी फिल्मों की यही विशेषता है कि वह आपको दृश्य सौंपती है और शब्द छीन लेती है । उमय की भूमिका में सिबेल केकिली ने कमाल किया है । उनकी आँखें इतनी भावपूर्ण है की किसी भी दृश्य में उन्हें शब्दों के सहारे की जरूरत नहीं है ।

इस फिल्म को ढेरों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं । इसका वर्ल्ड प्रीमियर बर्लिन के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में हुआ जहाँ इसे सर्वश्रेष्ठ यूरोपीय फिल्म का पुरस्कार दिया गया । ट्रिबेका फिल्म फेस्टिवल वर्ल्ड नेरेटिव फीचर प्रतियोगिता में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सिबेल केकिली को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला । उस वर्ष यह विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के आस्कर पुरस्कार हेतु जर्मनी की अधिकारिक प्रविष्टि थी ।