दंगे का षड्यंत्र / भाग-3 / राजनारायण बोहरे

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विजय सिंह ने भी लड़कों को इशारे से अपने पास बुलाया और दो चार इकट्ठे होते ही वहाँ अच्छी खासी भीड़ सिमटने लगी।

वैसी ही स्थिति जैसी कि नफर के साथ थी।

विजय ने भी छात्रों के बीच खड़े होकर एक भढ़काऊ सा भाषण दिया और शाम को गोपाल मंदिर में इकट्ठा होने का निवेदन किया। इसके बाद विजयसिंह अपने साथियों के साथ चला गया तो अजय अपनी क्लास में लौंटा

उसने अपने टेबिल में लगी दराज का ताला खोला तो उछल पड़ा उसमें जफर का लिखा एक लिफाफा रखा था।

अजय ने भी लिखना शुरू किया और जब वह घर लौट रहा था तब उसके पास दो लिफाफे थे, जिन पर उसके पापा का नाम लिखा था।

घर पर दोनों लिफाफे अजय ने पापा को दिये उन्होंने वह तत्काल पुलिस कोतवाल को भेज दिये अब सभी को शाम की प्रतीक्षा थी।

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कॉलेज और स्कूलों के तमाम छात्र अपने घरों से निकल चुके थे।

स्कूली बच्चे भी सड़कों पर नजर आ रहे थे। केवल दो जगह यह लोग इकट्ठा हो रहे थे। मुसलमान लड़के ईदगाह के पास चले जा रहे थे। हिन्दु लड़के गोपाल मन्दिर में पहुंच रहे थे। जफर ईदगाह की तरफ बढ़ रहा थां। नफर को देख कर जफर ने झुक कर आदाब किया और उसके कान में बोला ‘‘ भाई जान मैं भी बोलना चाहता हूं आज !”

अब सभी लोग इक्ट्ठे हुए तो नफर ने फिर मंच पकड़ लिया वह हिन्दुओं के खिलाफ जमकर बोलता रहा और अंत में कहने लगा-”दोस्तों इन काफिरों को सबक सिखाने के लिए जरूरी है कि हम अपनी ताकत को बढ़ाकर रखे। आज हमारे कुछ बुजुर्ग मुसलमानों ने हम लोगों पर दया करके कुछ ऐसी ही चीजें हमें दी है। हम लोग अभी उन्हें आपस में बांट लेते हैं, ताकि जरूरत होने पर हम लोग खाली हाथ न हों।

नफर ने जफर को इशारा किया तो वह मंच पर खड़ा हो गया। दिन भर की मेहनत से उसने एक छोटा भाषण तैयार किया था उसने बोलना शुरू किया।

-”दोस्तों इन काफिरों की जाति सचमुच बड़ी एहसान फरामोस होती है, अब यहीं देखिये कि मेरे दो दोस्त थे अजय और अभय, लेकिन जब से यह दंगा हुआ है वह दोनों मुझे ऐसे देखते हैं जैसे कच्चा चबा जायेंगे। मुझे तो डर लगता है कि किसी दिन वह दोनों मुझ पर हमला न कर दें।”

“तुम बेफिकर रहो भाई हम तुम्हारे साथ है” नफर बीच में ही बोल पड़ा था।

“शुक्रिया नफर भाई, दरअसल बात कुछ ऐसी है कि आज हरेक मुसलमान भाई को अपने पास कुछ हथियार रखना चाहिये, क्यों कि हम लोगों की बजाय हिन्दुओं की तादाद काफी है।

जफर के भाषण के बाद खूब तालियां बजी।

इसके बाद नफर के साथियों ने कुछ भरे हुए बोरे वहाँ आकर रखें।

उन बोरों का मुंह खोला गया तो सब चौंक उठे। उन बोरों में भरे थे चाकू, छुरी, बरछे बगैरह। एक-एक छात्र आगे आता और उसे कोई भी हथियार दे दिया जाता। किसी किसी को पास के थैलांे में रखे बमों में से भी एकाध बम उठाकर दे दिया जाता था।

हथियार लेकर छात्रों ने अपने कपड़ों में छुपाना शुरू किया था।

इसके बाद चार-चार, छै-छैः छात्रों के गुटों ने खिसकना शुरू कर दिया। अब एक और बोरा लाया गया था उसमें रखी थी ढेर सारी पिस्तौलें।

जफर को एक पिस्तौल और पचास गोलियां दी गई।

अब शेष लोगों ने भी घर की ओर अपने कदम बढ़ाये।

ईदगाह पर हो रही घटना से मिलती जुलती घटना गोपाल मंदिर पर हो रही थी। वहां भी विजय सिंह के भाषण के बाद तालियां बजी और अंत में वहाँ भी हथियार बांटे गये थे, हां इसके पहले अजय ने भी एक झूठमूठ सा छोटा सा भाषण दिया था।

अजय के चुप होते ही विजयसिंह ने ब्लेड से अपने अंगूठे को चीर कर रक्त निकाल लिया था- और वह सभी छात्रों को माथे पर खून का टीका लगाता जा रहा था । तिलक लगवा कर हर छात्र अपनी पसंद का हथियार उठा कर मंदिर के बाहर निकल रहा था।

अमावस्या की रात थी।

नगर की दो जगहों पर ऐसी खौफनाक घटनाएं घट रही थी और लोगों को पता न था।

तो क्या पुलिस सो रही थी ?

नहीं ! जफर और अजय के लिफाफों ने अपने कमाल दिखाये थे। शाम को पुलिस दफ्तर से माल ढोने वाले दो ट्रक रवाना हुए थे, उनमें भरे हुये थे सादे कपड़ों में पुलिस के सिपाही जिनकी वर्दी दफ्तर में जमा करा दी गई थी।

ठीक उसी वक्त, जब कि हथियार बंट रहे थे, दोनों ट्रक अपनी मंजिलों पर पहुँच चुके थे। एक ट्रक गोपाल मंदिर और दूसरा ईदगाह पर था।

छात्रों का बाहर निकलना शुरू हुआ। सिपाही हरकत में आगये।

ज्यों ही कोई ग्रुप बाहर निकलता, सादे कपड़े वाले पुलिस मेन झपट कर उन्हें एक ओर ले जाते, और उनके हाथ से हथियार छींन लिए जाते। बेचारे डर के मारे अपने हाथ का हथियार दे देते क्योंकि उनके सामने बन्दूक भी तान दी जाती थी।

हथियार तब तक छीनें जाते रहे, जब तक कि हथियार बांटने वाले खुद भी बाहर न निकल आये। संभलने का किसी को मौका भी नहीं दिया गया, सब छीन लिया गया।

नफर हतप्रभ था उसी वक्त जफर ने उसके कान में कुछ कहने का इशारा किया , नफर ने हाथ दबाकर जफर को चुप रहने का संकेत किया।

यही हाल विजयसिंह का था वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सब कैसे हुआ।

जबकि सारे कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता उन लोगों के बिल्कुल पास खड़े मन ही मन मुस्करा रहे थे।

पुलिस खूब प्रसन्न थी।

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नगर में एक शांति समिति बनी थी।

हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों के खास लोगों को इसमें सम्मिलित किया गया था। कलेक्टर ने समिति के लोगों से निवेदन किया कि नगर में शांति स्थापित करायें।

हिन्दुओं के प्रतिनिधि के रूप में पुराने विधायक पंडित चतुर्भुज का भाषण हुआ जिसमें उन्होंने मुसलमान भाई-बहिनों के प्रति सहानुभूति प्रगट की। मुसलमानों के नेता थे शेख जमाल, उन्होंने नुकसान सहन करने वाले हिन्दुओं के प्रति सहानुभूति प्रगट की।

बाद में यह समिति नगर के दौरे पर निकली।

सब जगह शांति थी। समिति के लोग खूब सन्तुष्ट थे।

पुलिस भी कुछ लापरवाह हो गई थी। लेकिन अचाक ही सांझ समय तनाव फिर बढ़ने की शंका पैदा हुई।

कॉलेज होस्टल में कुछ लड़कों में आपस में फिर से कहा सुनी हो गई और वह बात अफवाहों के साथ शहर में आ गई। लोग फिर विचलित हो उठे। पुलिस के लोग तैयार बैठे थे , वे आनन फानन में होस्टल पहुंचे ओर झगड़ने वालों को अपनी हिरासत में ले आये।

पुलिस ने झगड़ने वाले छात्रों को ठीक ढंग से समझाया और जब उन लोगों ने आपस में एक दूसरे से दुबारा दोस्ती करली तो पुलिस ने उन्हे अपने साथ जीप में बैठाकर उन्हे सारे नगर में घुमाया और उन्हीं के मुंह से लोगों से शांति की अपील कराई, और इस प्रकार बिगड़ती हुई स्थिति को संभाल लिया गया।

सबने राहत की सांस ली।

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आधी रात हो चुकी थी।

अंधेरा खूब घना था।

वह पांच लोग थे जो अंधेरे में अपने आपको छिपाये बढ़े जा रहे थे। उनका लक्ष्य नगर के बाहर बनी निर्जन भुतहा कोठी थी।

इस कोठी से हमेशा से लोग डरते थे। सबका विश्वास था कि इसमें भूत प्रेत रहते हैं।लेकिन बड़ी निडरता से वे पांचों लोग कोठी की तरफ बढ़े जा रहे थे।

अचानक अंधेरे में डूबी कोठी से एक टॉर्च चमक उठी और तत्काल बुझ गई।

आने वालों में से भी एक ने अपने हाथ में ली गई टॉर्च निकाली और सामने मुंह कर एक बार जला कर बुझा दी।

कोठी के अंदर एक उल्लू बोला तो इन पांचों का नेता भी चिमगादड़ की आवाज में चिचिंया उठा।

अंधेरे में से एक साया प्रगट हुआ और इन की ओर बढ़ा।

“नफर” साये की आवाज गूंजी।

“हां चाचा” आने वालों में से आगे वाला बोला जो वास्तव में नफर था।

“चलो वह तुम्हारे इंतजार में हैं।

“चलिये”

“वह पांच भीतर पहंुचे।

मोमबत्ती की धुंधलाती रोशनी में दो आदमी बैठे थे। जिनमें से एक आदमी ठीक से पहचाना जा सकता था वह था “शेख जमाल”

नगर में शांति समिति का सदस्य शेख जमाल दूसरा व्यक्ति कोई अरबी था।

“लानत है तुम पर” शेख जमाल चिल्लाया।

“मुझे कुछ भी पता ..............” .नफर घिघयाया।

’क्या पता ? कैसे पता? तुम सोते हो क्या ? हमारा कितना पैसा लगा था इसमें। जानते हो ? “अब की बार अरबी वेशभूषा बाला व्यक्ति बोला।