दौड़ / ममता कालिया / पृष्ठ 6

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6 (छठा भाग)

'पर हो सकता है पवन स्वादिष्ट खाना खाना चाहे। तो वह कुकिंग सीख ले। वैसे भी वह अब चैन्ने जाने वाला है। मैं राजकोट और अहमदाबाद के बीच चलती फिरती रहूँगी। फिर भी मैं तुम्हें थोड़ा बहुत सिखा दूँ। अब पवन ने हस्तक्षेप किया। वह यहाँ माता पिता का आशीर्वाद लेने आया था उपदेश नहीं। माँ जब से मैंने होश सँभाला, तुम्हें स्कूल और रसोई के बीच दौड़ते ही देखा। मुझे याद है जब मैं सो कर उठता तुम रसोई में होतीं और जब मैं सोने जाता, तब भी तुम रसोई में होतीं। तुम्हें चाहिए कि स्टैला के लिए जीवन भट्ठी न बने। जो तुमने सहा, वह क्यों सहे।?

रेखा की मुखाकृति तन गई। हालाँकि बेटे के तर्क की वह क़ायल थी। दोपहर में लेटे उसे लगा हर पीढ़ी का प्यार करने का ढंग अलग और अनोखा होता है। स्टैला भले ही कंप्यूटर पर आठ घंटे काम कर ले, रसोई में आध घंटे नहीं रहना चाहती। पवन भी नहीं चाहता कि वह रसोई में जाए। रेखा ने कहा, यह दाल रोटी तो बनानी सीख ले। पवन ने जवाब दिया खाना बनाने वाला पाँच सौ रुपये में मिल जाएगा माँ, इसे बावर्ची थोड़ी बनाना है। और मैं जो सारी उमर तुम लोगों की बावर्ची, धोबिन, जमादारनी बनी रहीं वह? ग़लत किया आपने और पापा ने। आप चाहती हैं वही गलतियाँ मैं भी करूँ। जो गुण है इस लड़की के उन्हें देखो। कंप्यूटर विज़र्ड है यह। इसके पास बिल गेट्स के हस्ताक्षर से चिट्ठी आती है। पर कुछ स्त्रियोचित गुण भी तो पैदा करने होंगे इसे। अरे माँ आज के ज़माने में स्त्री और पुरुष का उचित अलग-अलग नहीं रहा है। आप तो पढ़ी लिखी हो माँ समय की दस्तक पहचानो। इक्कीसवीं सदी में ये सड़े गले विचार ले कर नहीं चलना है हमें, इनका तर्पण कर डालो।

स्टैला की आदत थी जब माँ बेटे में कोई प्रतिवाद हो तो वह बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करती थी। उसकी ज़्यादा दिलचस्पी समस्याओं के ठोस निदान में थी। उसने पिता से कहा, मैं आपको ऑपरेट करना सिखा दूँगी। तब आप देखिएगा संपादन करना आपके लिए कितना सरल काम होगा। जहाँ मर्ज़ी संशोधन कर लें जहाँ मर्ज़ी मिटा दें। रेखा की कई कहानियाँ उसने कंप्यूटर पर उतार दीं। बताया, मैम इस एक फ्लॉपी में आपकी सौ कहानियाँ आ सकती हैं। बस यह डिस्कैट सँभाल लीजिए, आपका सारा साहित्य इसमें है। चमत्कृत रह गए वे दोनों। रेखा ने कहा, अब तुम हमारी हो गई हो। मैम न बोला करो। ओ.के. माम सही। स्टैला हँस दी।

बच्चों के वापस जाने में बहुत थोड़े दिन बचे थे। राकेश इस बात से उखड़े हुए थे कि शादी के तत्काल बाद पवन और स्टैला साथ नहीं रहेंगे बल्कि एक दूसरे से तीन हज़ार मील के फ़ासले पर होंगे। उन्होंने दोनों को समझाने की कोशिश की। पवन ने कहा, मैं तो वचन दे चुका हूँ मैल को। मेरा चेन्नई जाना तय है। और जो वचन जीवन साथी को दिये वे? पवन हँसा, पापा जुमलेबाज़ी में आपका जवाब नहीं। हमारी शादी में कोई भारी भरकम वचनों की अदला बदली नहीं हुई। बहू अकेली अनजान शहर में रहेगी? आजकल समय अच्छा नहीं है।

समय कभी भी अच्छा नहीं था पापा, मैं तो पच्चीस साल से देख रहा हूँ। फिर वह शहर स्टैला के लिए अनजान नहीं है। एक और बात, राजकोट में हिंसा, अपराध यहाँ का एक परसेंट भी नहीं है। रातों में लोग बिना ताला लगाए स्कूटर पार्क कर देते हैं, चोरी नहीं होती। फिर आपकी बहू कराटे, ताइक्वांडो में माहिर है। पर फिर भी शादी के बाद तुम्हारा फ़र्ज़ है साथ रहो। पापा आप भारी भरकम शब्दों से हमारा रिश्ता बोझिल बना रहे हैं। मैं अपना कैरियर, अपनी आज़ादी कभी नहीं छोडूँगा। स्टैला चाहे तो अपना बिज़नेस चेन्नई ले चले। तुम तो तरक्कीराम हो। मैं चेन्नई पहुँचूँ और तुम सिंगापुर चले जाओ तब! स्टैला हँसी। पता चला पवन के सिंगापुर या ताईवान जाने की भी बात चल रही थी। रेखा ने कहा, यह बार-बार अपने को डिस्टर्ब क्यों करती हो। अच्छी भली कट रही है सौराष्ट्र में। अब फिर एक नई जगह जाकर संघर्ष करोगे? वही तो माँ। मंज़िलों के लिए संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। मेरी लाइन में चलते रहना ही तरक्की है। अगर यहीं पड़ा रह गया तो लोग कहेंगे, देखा कैसा लद्धड़ है, कंपनी डूब रही है और यह कैसा बियांका की तरह उसमें फँसा हुआ है। बातें राकेश को बहुत चुभीं, तुम अपनी तरक्की के लिए पत्नी और कंपनी दोनों छोड़ दोगे? छोड़ कहाँ रहा हूँ पापा, यह कंपनी अब मेरे लायक नहीं रही। मेरी प्रतिभा का इस्तेमाल अब मैल' करेगी। रही स्टैला। तो यह इतनी व्यस्त रहती है कि इंटरनेट और फ़ोन पर मुझसे बात करने की फ़ुर्सत निकाल ले यही बहुत है। फिर जेट, सहारा, इंडियन एयरलाइंस का बिजनेस आप लोग चलने दोगे या नहीं। सिर्फ सात घंटे की उड़ान से हम लोग मिल सकते हैं। यानी सेटेलाइट और इंटरनेट से तुम लोगों का दांपत्य चलेगा? येस पापा। मैं तुम्हारी प्लानिंग से ज़रा भी खुश नहीं हूँ पुन्नू। एक अच्छी भली लड़की को अपना जीवन साथी बना कर कुछ ज़िम्मेदारी से जीना सीखो। और बेचारी जी.सी.सी.एल. ने तुम्हें इतने वर्षों में काम सिखा कर काबिल बनाया है। कल तक तुम इसके गुण गाते नहीं थकते थे। तुम्हारी एथिक्स को क्या होता जा रहा है? पवन चिढ़ गया, मेरे हर काम में आप यह क्या एथिक्स, मोरैलिटी जैसे भारी भरकम पत्थर मारते रहते है। मैं जिस दुनिया में हूँ वहाँ एथिक्स नहीं, प्रोफ़ेशनल एथिक्स का ज़रूरत है। चीज़ों को नई नज़र से देखना सीखिए नहीं तो आप पुराने अखबार की तरह रद्दी की टोकरी में फेंक दिये जाएँगे। आप जेनरेशन गैप पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे क्या होगा, आप ही दुखी रहेंगे। तुम हमारी पीढ़ी में पैदा हुए हो, बड़े हुए हो, फिर जेनरेशन गैप कहाँ से आ गया। असल में पवन हम और तुम साथ बड़े हुए हैं। 'ऐसा आपको लगता है। आपको आज भी के. एल. सहगल पसंद है, मुझे बाबा सहगल, इतना फासला है हमारे आपके बीच। आपको पुरानी चीज़ें, पुराने गीत, पुरानी फ़िल्में सब अच्छी लगती हैं। ढूँढ़-ढूँढ़ कर आप कबाड़ इकठ्ठा करते हैं। टी.वी. पर कोई पुरानी फ़िल्म आए आप उससे बँध जाते हैं। इतना फ़िल्म बोर नहीं करती जितना आपकी यादें बोर करती हैं- निम्मी ऐसे देखती थी, ऐसे भागती थी, उसके होठ अनकिस्ड लिप्स कहलाते थे। मेरे पास इन किस्से कहानियों का वक़्त नहीं है। तकनीकी दृष्टि से कितनी खराब फ़िल्में थीं वे। एक डायलाग बोलने में हीरोइन दो मिनट लगा देती थी। आप भी तो आधी फ़िल्म देखते न देखते ऊँघ जाते हैं।


रेखा ने कहा, बाप को इतना लंबा लेक्चर पिला दिया। यह नहीं देखा कि तेरे सुख की ही सोच रहे हैं वे। जब मैं यहाँ सुख से रहता था तब भी तो आप लोग दुखी थे। आपने कहा था माँ कि आपके बड़े बाबू के लड़के तक ने एम.बी.ए. प्रवेश पास कर ली। उस समय मुझे कैसा लगा था। सभी माँ बाप अपने बच्चों को भौतिक अर्थों में कामयाब बनाना चाहते हैं ताकि कोई उन्हें फिसड्डी न समझे। वही तो मैंने किया। आपके ऊपर इन तीन अक्षरों का कैसा जादू चढ़ा था, एम.बी.ए.। आपको उस वक़्त लगा था कि अगर आपके लड़के ने एम.बी.ए. नहीं किया तो आपकी नाक कट जाएगी। हमें तुम्हारी डिग्री पर गर्व है बेटा पर शादी के साथ कुछ तालमेल भी बैठाने पड़ते हैं। तालमेल बड़ा गड़बड़ शब्द है। इसके लिए न मैं स्टैला की बाधा बनूँगा न वह मेरी। हमने पहले ही यह बात साफ़ कर ली है। पर अकेलापन. . . यह अकेलापन तो आप सब के बीच रह कर भी मुझे हो रहा है। आप मेरे नज़रिए से चीज़ों को देखना नहीं चाहते। आपने मुझे ऐसे समुद्र में फेंक दिया है जहाँ मुझे तैरना ही तैरना है। तुम पढ़ लिख लिए, यह गलती भी हमारी थी क्यों? पढ़ तो मैं यहाँ भी रहा था पर आप सपने पूरे करना चाहते थे। आपके सपने मेरा संघर्ष बन गए। यह मत सोचिए कि संघर्ष अकेले आता है। वह सबक भी सिखाता चलता है।

राकेश निरुत्तर हो गए। उन्हें लगा जितना अपरिपक्व वह बेटे को मान रहे हैं, उतना वह नहीं है। स्टैला का रेल आरक्षण दो दिन पहले का था। उसके जाने के बाद पवन का सामान समेटना शुरू हुआ। उसने छोटे से 'ओडिसी' सूटकेस में करीने से अपने कपड़े जमा लिए। बैग में निहायत ज़रूरी चीज़ों के साथ लैपटॉप, मिनरल वॉटर और मोबाइल फ़ोन रख लिया।

जाने के दिन उसने माँ के नाम बीस हज़ार का चेक काटा, माँ हमारे आने से आपका बहुत खर्च हुआ है, यह मैं आपको पहली किस्त दे रहा हूँ। वेतन मिलने पर और दूँगा। रेखा का गला रूँध गया, बेटे हमें तुमसे किश्तें नहीं चाहिए। जो कुछ हमारा है सब तुम्हारा और छोटू का है। यह मकान तुम दोनों आधा-आधा बाँट लेना। और जो भी है उसमें बराबर का हिस्सा है। अब बताओ, हिसाब की बात तुम कर रही हो या मैं? इतने साल की नौकरी में मैंने कभी एक पैसा आप दोनों पर खर्च नहीं किया। रेखा ने चेक वापस करते हुए कहा, रख लो नई जगह पर काम आएगा। दो शहरों में गृहस्थी जमाओगे, दोहरा खर्च भी होगा। सोच लो माँ, लास्ट ऑफर। फिर न कहना पवन ने घर पर उधार चढ़ा दिया।

बच्चों के जाने के बाद घर एकबारगी भायं भायं करने लगा। सघन ने सॉफ्टवेयर की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर दिल्ली में डेढ़ साल का कोर्स ज्वायन कर लिया। रेखा और राकेश एक बार फिर अकेले रह गए। अकेलेपन के साथ सबसे जानलेवा होते हैं उदासी और पराजय बोध! वे दोनों सुबह की सैर पर जाते। इंजीनियरिंग कालेज के अहाते की साफ़ हवा कुछ देर को चित्त प्रफुल्लित करती कि कालोनी का कोई न कोई परिचित दिख जाता। बात स्वास्थ्य और मौसम से होती हुई अनिवार्यतः बच्चों पर आ जाती। कालेज की रेलिंग पर गठिया से गठियाये पैरों को तनिक आराम देते सिन्हा साहब बताते उनका अमित मुंबई में है, वहीं उसने क़िस्तों पर फ्लैट ख़रीद लिया है। सोनी साहब बताते उनका बेटा एच.सी.एल. की ओर से न्यूयार्क चला गया है। मजीठिया का छोटा भाई कैनेडा में हार्डवेयर का कोर्स करने गया था, वहीं बस गया है। ये सब कामयाब संतानों के माँ बाप थे। हर एक के चेहरे पर भय और आशंका के साये थे। बच्चों की सफलता इनके जीवन में सन्नाटा बुन रही थी। इतनी दूर चला गया है बेटा, पता नहीं हमारी क्रिया करने भी पहुँचेगा या नहीं? सोनी साहब कह कर चुप हो जाते। रेखा और राकेश इन सब से हट कर घूमने का अभ्यास करते। उन्हें लगता जो बेचैनी वे रात भर जीते हैं उसे सुबह-सुबह शब्दों का जामा पहना डालना इतना ज़रूरी तो नहीं। यों दिन भर बात में छोटू और पवन का ध्यान आता रहता। घर में पाव भर सब्ज़ी भी न खपती। माँ कहती, लो छोटू के नाम की बची है यह। पता नहीं क्या खाया होगा उसने? राकेश को पवन का ध्यान आ जाता, उसके जॉब में दौरा ही दौरा है। इतना बड़ा एरिया उसे दे दिया है क्या खाता होगा। वहाँ सब चावल के व्यंजन मिलते हैं, मेरी तरह उसे भी चावल बिल्कुल पसंद नहीं।

दोनों के कान फ़ोन पर लगे रहते। फ़ोन अब उनके लिए कोने में रखा एक यंत्र नहीं, संवादिया था। पवन जब अपने शहर में होता फ़ोन कर लेता। अगर चार पाँच दिन उसका फ़ोन न आए तो ये लोग उसका नंबर मिलाते। उस समय उन्हें छोटू की याद आती। फ़ोन मिलाने, उठाने, एस.टी.डी. का इलेक्ट्रानिक ताला खोलने, लगाने का काम छोटू ही किया करता था। अब वे फ़ोन मिलाते पर डरते-डरते। सही नंबर दबाने पर भी उन्हें लगता नंबर ग़लत लग गया है। कभी पवन फ़ोन उठाता पर ज़्यादातर उधर से यही यांत्रिक आवाज़ आती 'यू हैव रीच्ड द वायस मेल बॉक्स ऑफ नंबर ९८४४०१४९८८।

रेखा को वायस मेल की आवाज़ बड़ी मनहूस लगती। वह अक्सर पवन से कहती, तुम खुद तो बाहर चले जाते हो, इस चुड़ैल को लगा जाते हो। क्या करूँ माँ, मैं तो हफ्ता-हफ्ता बाहर रहता हूँ। लौट कर कम से कम यह तो पता चल जाता है कि कौन फ़ोन घर पर आया।

सघन के होस्टेल में फ़ोन नहीं था। वह बाहर से महीने में दो बार फ़ोन कर लेता। उसे हमेशा पैसों की तंगी सताती। महीने के शुरू में पैसे मिलते ही वह कंप्यूटर की महँगी पत्रिकाएँ खरीद लेता, फिर कभी नाश्ते में कटौती, कभी खाने में कंजूसी बरतता। दिल्ली इतना महँगा था कि बीस रुपये रोज़ आने-जाने में निकल जाते जबकि इसके बावजूद बस के लिए घंटों धूप में खड़ा होना पड़ता। एक सेमेस्टर पूरा कर जब वह घर आया माँ पापा उसे पहचान नहीं पाए। चेहरे पर हड्डियों के कोण निकल आए थे। शकल पर से पहले वाला छलकाता बचपना गायब हो गया था।

बैग और अटैची से उसके चीकट मैले कपड़े निकालते हुए रेखा ने कहा, क्यों कभी कपड़े धोते नहीं थे। उसने गर्दन हिला दी। क्यों? टाइम कहाँ है माँ। रोज़ रात तीन बजे तक कंप्यूटर पर पढ़ना होता है। दिन में क्लास। बाकी लड़के कैसे करते हैं? लांड्री में धुलवाते हैं। मेरे पास पैसे नहीं होते।

राकेश ने कहा, जितने तुम्हें भेजते हैं, उतने तो हम पवन को भी नहीं भेजते थे। एक तरह से तुम्हारी माँ का पूरा वेतन ही चला जाता है। उस ज़माने की बात पुरानी हो गई पापा। अब तो अकेली चिप सौ रुपये की होती है। क्या ज़रूरत है इतने चिप्स खाने की? रेखा ने भौंहें सिकोड़ी।

सघन हँस दिया, माँ पोटेटो चिप्स नहीं, पढ़ने के चिप की बात करो। यह तो एक मैगज़ीन है, और न जाने कितनी हैं जो मैं अफोर्ड नहीं कर पाता। मेरे कोर्स की एक-एक सी.डी. की कीमत ढाई सौ रुपये होती है।

नाश्ते के बाद वह बिना नहाए सो गया। उसकी मैली जीन्स रगड़ते हुए माँ सोचती रही, इसके कपड़ों से इसके संघर्ष का पता चल रहा है। जब तक वह घर पर था हमेशा साफ़ सुथरा रहता था। दोपहर में उसे खाने के लिए उठाया। बड़ी मुश्किल से वह उठा, चार कौर खा कर फिर सो गया। तभी उसके पुराने दोस्त योगी का फ़ोन आ गया। उसकी हार्ड डिस्क अटक रही थी। सघन ने कहा वह उसके यहाँ जा रहा है, मरम्मत कर देगा। तुम तो साफ्टवेयर प्रोग्रामिंग में हो। राकेश ने कहा। वहाँ मैंने हार्डवेयर का भी ईवनिंग कोर्स ले रखा है। सघन ने जाते-जाते कहा।

हम अपने बच्चों को कितना कम जानते हैं। उनके इरादे, उनका गंतव्य, उनका संघर्ष पथ सब एकाकी होता है। राकेश ने सोचा। उसकी स्मृति में वह अभी भी लीला दिखाने वाला छोटा-सा किशन कन्हैया था जबकि वह सूचना विज्ञान के ऐसे संसार में हाथ पैर फटकार रहा था जिसके ओर छोर समूचे विश्व में फैले थे।

रेखा ने कहा, जो मैं नहीं चाहती थी वह कर रहा है छोटू। हार्डवेयर का मतलब है मेकैनिक बन कर रह जाएगा। एक भाई मैनेजर दूसरा, मेकैनिक। राकेश ने डाँट दिया, जो बात नहीं समझती, उसे बोला मत करो। हार्डवेयर वालों को टैक्नीशियन कहते हैं, मेकैनिक नहीं। विदेश में सॉफ्टवेयर इंजीनियर से ज़्यादा हार्डवेयर इंजीनियर कमाते हैं। तुम्हें याद है जब यह छोटा-सा था, तीन साल का, मैंने इसे एक रूसी किताब ला कर दी थी 'मैं क्या बनूँगा?' सचित्र थी वह। रेखा का मूड बदल गया, हाँ मैं इसे पढ़ कर सुनाती थी तो यह बहुत खुश होता था। उसमें एक जगह लिखा था मैकेनिक अपने हाथ पैर कितने भी गंदे रखें उसकी माँ कभी नहीं मारती। इसे यह बात बड़ी अच्छी लगती। वह तस्वीर थी न बच्चे के दोनों हाथ ग्रीज से लिथड़े हैं और माँ उसे खाना खिला रही है। पर छोटू कमज़ोर बहुत हो गया है। कल से इसे विटामिन देना शुरू करो। मुझे लगता है यह खाने पीने के पैसे काट कर हार्डवेयर कोर्स की फीस भरता होगा। शुरू का चुप्पा है। अपनी ज़रूरतें बताता तो है ही नहीं।

अभी सघन को सुबह शाम दूध दलिया देना शुरू ही किया था कि हॉट मेल पर उसे ताइवान की सॉफ्टवेयर से नौकरी का बुलावा आ गया। फुर्र हो गई उसकी थकान और चुप्पी। कहने लगा, मुझे दस दिनों से इसका इंतज़ार था। सारे बैच ने एप्लाय किया था पर पोस्ट सिर्फ़ एक थी। माँ बाप के चेहरे फक पड़ गए। एक लड़का इतनी दूर मद्रास में बैठा है। दूसरा चला जाएगा एक ऐसे परदेस जिसके बारे में वे स्पेलिंग से ज़्यादा कुछ नहीं जानते। राकेश कहना चाहते थे सघन से, कोई ज़रूरत नहीं इतनी दूर जाने की, तुम्हारे क्षेत्र में यहाँ भी नौकरी है। पर सघन सहमति भेज चुका था। पासपोर्ट उसने पिछले साल ही बनवा लिया था। वह कह रहा था, पापा बस हवाई टिकट और पाँच हज़ार का इंतज़ाम आप कर दो, बाकी मैं मैनेज कर लूँगा। आपका खर्च मैं पहली पे में से चुका दूँगा। रेखा को लगा सघन में से पवन का चेहरा झाँक रहा है। वही महाजनी प्रस्ताव और प्रसंग। उसे यह भी लगा कि जवान बेटे ने एक मिनट को नहीं सोचा कि माता पिता यहाँ किसके सहारे ज़िंदा रहेंगे।

अनिवासी और प्रवासी केवल पर्यटक और पंछी नहीं होते, बच्चे भी होते हैं। वे दौड़-दौड़ कर दर्ज़ी के यहाँ से अपने नये सिले कपड़े लाते हैं, सूटकेस में अपना सामान और काग़ज़ात जमाते हैं, मनी बेल्ट में अपना पासपोर्ट, वीजा और चंद डॉलर रख, रवाना हो जाते हैं अनजान देश प्रदेश के सफ़र पर, माता पिता को सिर्फ़ स्टेशन पर हाथ हिलाते छोड़ कर।

प्लेटफॉर्म पर लड़खड़ाती रेखा को अपने थरथराते हाथ से संभालते हुए राकेश ने कहा, ठीक ही किया छोटू ने। जितनी तरक्की यहाँ दस साल में करता उतनी वह वहाँ दस महीनों में कर लेगा। जीनियस तो है ही। कॉलोनी के गुप्ता दंपत्ति भी उनके साथ स्टेशन आए हुए थे। मिसेज गुप्ता ने कहा, वायरल फीवर की तरह विदेश वायरस भी बहुत फैला हुआ है आजकल। खुद कुछ भी कह लो, हमारा छोटू ऐसा नहीं है। उसके विषय में यहाँ कुछ ज़्यादा है ही नहीं। कह कर गया है कि ट्रिक्स ऑफ द ट्रेड सीखते ही मैं लौट आऊँगा। यही रह कर बिजनेस करूँगा। अजी राम कहो। गुप्ता जी बोले, जब वहाँ के ऐश ओ आराम में रह लेगा तब लौटने की सोचेगा? यह मुल्क, यह शहर, यह घर सब जेल लगेगा जेल। लेट्स होप फॉर द बेस्ट। राकेश ने सबको चुप किया।

घर वही था, दर ओ दीवार वही थे, घऱ का सामान वही था, यहाँ तक कि रूटीन भी वही था पर पवन और सघन के माता पिता को मानो वनवास मिल गया। अपने ही घर में वे आकुल पंछी की तरह कमरे कमरे फड़फड़ाते डोलते। पहले दो दिन तो उन्हें बिस्तर पर लगता रहा जैसे कोई उन्हें हवा में उड़ाता हुआ ले जा रहा है। जब तक सघन का वहाँ से फ़ोन नहीं आ गया, उनके पैरों की थरथराहट नहीं थमी।

छोटे बेटे के चले जाने से बड़े बेटे की अनुपस्थिति भी नये सिरे से खलने लगी। दिन भर की अवधि में छोटे-छोटे करिश्मे और कारनामे, बच्चों को पुकार कर दिखाने का मन करता, कभी पुस्तक में पढ़ा बढ़िया-सा वाक्य, कभी अखबार में छपा कोई मौलिक समाचार, कभी बगिया में खिला नया गुलाब, इस सब को बाँटने के लिए वे आपस में पूरे होते हुए भी आधे थे। प्रकट राकेश सुबह उठते ही अपने छोटे से साप्ताहिक पत्र के संपादन में व्यस्त हो जाते, रेखा कुकर चढ़ाने के साथ कॉपियाँ भी जाँचती रहती पर घर भायं-भायं करता रहता। सुबह आठ बजे ही जैसे दोपहर हो जाती।

बच्चे घर के तंतु जाल में किस कदर समाए होते हैं यह उनकी ग़ैर मौजूदगी में ही पता चलता है। दफ्तर जाने के लिए राकेश स्कूटर निकालते। सुबह के समय स्कूटर को किक लगाना उन्हें नागवार लगता। वे पहली कोशिश करते कि उन्हें लगता सघन का पैर स्कूटर की किक पर रखा है। लाओ पापा मैं स्टार्ट कर दूँ। चकित दृष्टि दायें बायें उठती फिर अड़ियल स्कूटर पर बेमन से ठहर जाती।

रसोई में ताक बहुत ऊँचे लगे थे। रेखा का कद सिर्फ़ पाँच फुट था। ऊपर के ताकों पर कई ऐसे सामान रखे थे जिनकी ज़रूरत रोज़ न पड़ती। पर पड़ती तो सही। रेखा एक पैर पट्टे पर उचक कर मर्तबान उतारने की कोशिश करती पर कामयाब न हो पाती। स्टूल पर चढ़ना फ्रेक्चर को खुला बुलावा देना था।