प्रियकांत / भाग - 23 / प्रताप सहगल

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प्रियकांत को अच्छा भी लगा और बुरा भी। अच्छा इसलिए कि जिस नितिन ने कभी उसे ब्रेक नहीं दिया, आज वही उसके जीवन की कहानी के राइट्स ख़रीदने आया है। बुरा इसलिए कि मैं तो फँसा हुआ हूँ पुलिस-क़ानून के चक्कर में और इस चूतिया को अपनी हिट फ़िल्म बनाने की पड़ी है।

प्रियकांत को यह उम्मीद भी नहीं थी कि नितिन इस काम के लिए उससे मिलने आया है। वह चुप रहा। माधव भी पहले प्रियकांत की प्रतिक्रिया जानना चाहता था।

ख़ामोशी को पंक्चर करते हुए नितिन ही बोला-”पैसे आप जो कहें...आप चाहें तो इस फ़िल्म में अपना संगीत भी दे सकते हैं और चाहें तो अभिनय भी कर सकते हैं-यह एक एक्सपेरिमेंटल फ़िल्म होगी। मनोरंजन भी होगा, मैसेज भी...एकदम हिट।” प्रियकांत के भावशून्य चेहरे को देखकर नितिन फिर ख़ामोश हो गया।

थोड़ी देर बाद प्रियकांत बोला-”ऐसा है नितिन जी! मैं अभी ऐसी मानसिकता में नहीं हूँ कि इस बारे में कुछ सोच भी सकूँ।”

“कोई बात नहीं...कुछ दिन बाद मिल लेते हैं।”

“नहीं...मेरी कहानी पर फ़िल्म बनानी होगी तो माधव बनाएँगे...जानते हो इन्हें, चाहें तो आज एक साथ दस फ़िल्में लॉन्च कर दें।”

नितिन का चेहरा फक हो गया। वह माधव के बारे में कुछ भी नहीं जानता था। बोला-”जी! मैंने पहचाना नहीं जी, सॉरी...आप यहीं बिज़नेस...”

“नहीं...यह मेरा बिज़नेस नहीं है...पर प्रियकांत...मेरा मतलब...आचार्य प्रियांशु चाहेंगे तो फ़िल्म बनेगी...”

नितिन किंकर्तव्यविमूढ़-सा थोड़ी देर बैठा रहा और फिर उठकर चला गया। जाती बार उसने प्रणाम नहीं किया।

स्वामी विद्यानंद प्रियकांत को दीक्षित करने और उसे एक काम सौंपने के बाद संसार से और भी निस्पृह हो गए थे। उन्होंने एक बार फिर देशाटन का मन बनाया और अकेले ही निकल पड़े। पहले वे माउंट आबू पहुँचे। वहाँ गोमुख में कुछ दिन रहे। हालाँकि वहाँ सगुण भक्ति का ही बोलबाला था, लेकिन उनके मूल्य उनके साथ थे। वे तलहटी में नीचे किसके साथ रहे, कोई नहीं जानता। वहाँ के आदिवासी ही उनके संगी-साथी थे। उन्होंने दो साल उन्हें पढ़ाया और फिर वहाँ से भी कूच कर गए।

कई स्थानों का भ्रमण करते हुए वे अंततः कैलास पहुँचे और दो साल वहाँ रहने के बाद दिल्ली लौट आए। दिल्ली पहुँचकर उन्हें आती हुई इक्कीसवीं शताब्दी का शोर सुनाई दिया। उन्होंने सोचा-‘हम अपनी पाँच हज़ार साल की सभ्यता को भूल दो हज़ार साल पहले जन्मे एक धर्म का जश्न क्यों मना रहे हैं ?’ सारे शोर के बीच ही उन्हें प्रियकांत बनाम आचार्य प्रियांशु की ख़बरें भी मिलीं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि प्रियकांत ऐसा कर सकता है। पर यह तमाम अख़बार, टी.वी. चैनल झूठ बोल रहे हैं क्या ? स्वामी विद्यानंद ने टाउन हॉल में ही डेरा डाला हुआ था। वहीं से उन्होंने प्रियकांत से फ़ोन पर संपर्क किया।

फ़ोन प्रियकांत के सचिव प्रकाश द्विवेदी ने उठाया-”हलो!”

‘प्रियकांत है ?” स्वामी विद्यानंद ने पूछा।

“प्रियकांत...समझा नहीं...आप कौन ?”

“आप कौन बोल रहे हो बेटा ?” विद्यानंद के स्वर में वत्सल भाव था।

“जी, मैं प्रकाश द्विवेदी...पी.ए. टु आचार्य प्रियांशु।”

“हाँ, वही आचार्य प्रियांशु, उसे कहना, स्वामी विद्यानंद का फ़ोन था...”

स्वामी विद्यानंद का नाम सुनते ही प्रकाश द्विवेदी के मस्तक पर स्वेद-कण चमकने लगे-”जी...जी...स्वामी जी, क्षमा चाहता हूँ, मैंने आपको पहचाना नहीं...मैं आचार्य जी को फ़ोन देता हूँ।”

“उसे कहना, मिले मुझे दीवान हॉल में।” कहकर स्वामी विद्यानंद ने फ़ोन बंद कर दिया।

प्रकाश द्विवेदी ने प्रियकांत को जब स्वामी विद्यानंद के फ़ोन के बारे में बताया तो प्रियकांत ने चाहा कि आश्रम में ही एक गहरा गड्ढा खोदकर उसे वहीं दफ़न कर दिया जाए। प्रियकांत मूल्यहीन जीवन जी रहा था। वह यह बात जानता भी था कि वह मूल्यहीन जीवन जी रहा है, लेकिन अभी इतना मूल्यहीन या कहें निर्लज्ज नहीं हुआ था कि वह स्वामी विद्यानंद का सामना कर पाता।

प्रियकांत को गहरे अवसाद ने घेर लिया। उसने माधव को बुलाया। माधव ने राय दी कि उसे स्वामी विद्यानंद से ज़रूर और तुरंत मिलना चाहिए। वही प्रियकांत को इस भटकाव से बाहर ला सकते हैं। वही प्रियकांत के टूटे हुए नैतिक बल को सहारा दे सकते हैं।

लेकिन प्रियकांत के आश्रम के बाहर तो पुलिस का पहरा था। और उसे आश्रम से बाहर निकलने की भी क़ानूनी मनाही थी।

“तो तुम यह बात उन्हें बताओ न...लो मिलाओ फ़ोन।” माधव ने प्रियकांत से आदेशात्मक लहजे में कहा।

प्रियकांत ने काँपते हाथों से फ़ोन मिलाया। उधर से कोई अपरिचित स्वर था। प्रियकांत ने कहा-”स्वामी विद्यानंद...” इससे पहले कि उसका वाक्य पूरा होता, उसी अपरिचित स्वर ने कहा-”हाँ, यहीं बैठे हैं, लीजिए बात कीजिए।”

स्वामी विद्यानंद ने फ़ोन कान से लगाया-”नमस्कार!”

प्रियकांत को काटो तो ख़ून नहीं। काँपते स्वर में बोला-‘गु...गुरु जी...मैं प्रियकांत...”

“कहो बेटा, कैसे हो...मैंने तो तुम्हें बुलाया था।”

“ज...जी...गुरुदेव...आश्रम से बाहर निकलने पर रोक है...पुलिस है बाहर...आप...आप...”

बीच में ही माधव ने फ़ोन पकड़ लिया-”स्वामी जी! प्रणाम। मैं माधव बोल रहा हूँ...प्रियकांत का पुराना दोस्त...आप अभी वहीं हैं न ?”

“हाँ।”

“मैं आ रहा हूँ, आपको लेने...सिर्फ़ आप ही अब इस मँझधार से बाहर निकाल सकते हैं...एक घंटे में ही पहुँचा।”

“ठीक है।” कहकर विद्यानंद ने फ़ोन सेवक को पकड़ाया और किसी गहरी सोच में डूब गए।

‘विश्व शांति मिशन’ के आश्रम में शाम ढल रही थी। पेड़ों पर पक्षी अपने-अपने आशियानों में बैठे चहचहा रहे थे। पक्षियों के उस कलरव में एक संगीत था। अमर्यादित पर आनंददायक।

प्रियकांत के शयनकक्ष में केवल तीन व्यक्ति मौजूद थे-प्रियकांत, स्वामी विद्यानंद और माधव। प्रियकांत बहुत शर्मसार था। स्वामी विद्यानंद कुछ असमंजस की स्थिति में और माधव किसी राह की तलाश में।

माधव ने ख़ामोशी तोड़ी-”हम ऐसे ख़ामोश बैठे रहेंगे तो...।”

“हाँ...ख़ामोश रहने से कुछ नहीं होगा...पर मैं अभी भी समझ नहीं पा रहा कि प्रियकांत जैसा शालीन, जिज्ञासु, कर्मठ और मूल्यधर्मी व्यक्ति राह कैसे भटक गया...क्या मेरी शिक्षा में कमी थी...मैंने तो इसे अच्छे संस्कार ही दिए थे...” फिर प्रियकांत को सीधे संबोधित किया-”प्रियकांत! तुम मेरे जीवन की सबसे बड़ी विफलता हो।”